फिल्म: उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक
कलाकार: विकी कौशल, मोहित रैना, परेश रावल और यामी गौतम
निर्देशक: आदित्य धर
रेटिंग: ***
नवोदित निर्देशक आदित्य धर की फिल्म उरी ऐसे समय पर आई है जब देश में आम चुनाव का माहौल बनना शुरू हो गया है। राफेल सौदा जीने मरने का सा सवाल बन चुका है। सेना प्रमुख की बयानबाजी और सरहद पर गोलीबारी कम भले हुई हो पर जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएगा, पाकिस्तान फिर सुर्खियों में आएगा। और, दो साल पहले की ऐसी ही सुर्खियों को समेटकर बनी है फिल्म, उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक। फिल्म सुर्खियों से आगे की कोई बात करती नहीं है। ऐसा कुछ दिखाती नहीं है जो दर्शकों को पहले से पता न हो। हां, फौज कैसे घर में घुसकर मारती है और सुर्खियों में रही बातें परदे पर कैसे दिखती हैं, इसे फिल्म जरूर कायदे से दिखाने में कामयाब रहती है।
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कहानी मेजर विहान सिंह शेरगिल की है। फिल्म की शुरूआत मणिपुर में हुए उग्रवादी हमले से होती है। विहान अपनी बीमार मां के पास दिल्ली में रहना चाहता है। वह तय तिथि से पहले अपना रिटायरमेंट भी चाहता है। सेना उसके लिए दिल्ली में नौकरी का जुगाड़ कर देती है। लेकिन, मर जाने या मार देने का रोमांच रगों में लेकर जीता रहा फौजी ज्यादा दिन डेस्क की नौकरी कर नहीं पाता। बुलावा आता है दुश्मन से बदला लेना का। विहान को जिम्मेदारी मिलती है भारतीय सेना के सबसे ज्यादा चर्चित और प्रसारित सर्जिकल स्ट्राइक की।
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युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी पिछले एक दो दशक की फिल्में मसलन बॉर्डर (1997), एलओसी कारगिल (2003), लक्ष्य (2004), रंगून (2017) और पलटन (2018) पर गौर करें तो इन सारी फिल्मों में एक बात खास रही और वह ये कि इसके लेखकों ने इन फिल्मों के किरदारों के संवादों में खूब लोहा भरा। उरी के लेखक भी आदित्य धर खुद ही है लिहाजा उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि उनके किरदार परदे पर अपने एक्शन के लिए दर्शकों के जेहन में जगह बनाएं न कि अपने संवादों के लिए। सारे किरदार बिना फिल्मी हुए बात करते हैं और यही उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक की सबसे बड़ी यूएसपी है। जॉन अब्राहम ने फिल्म मद्रास कैफे से इस जॉनर की फिल्मों के लिए एक अलग तरह की नजीर बनाई है, विकी कौशल की उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक उसी लीक को थोड़ा आगे बढ़ाती है।
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फिल्म को देखने का सबसे बड़ा आकर्षण है विकी कौशल का अभिनय। अपना वजन बढ़ाकर, चेहरे पर कुछ कर दिखाने की मजबूती जगाकर और अपने हौसलों में बारूद मिलाकर विकी ने मेजर विहान का जो किरदार किया है, वह राजी के उनके पाकिस्तानी फौजी किरदार से मीलों आगे है। विकी ने खुद को बतौर अभिनेता धीरे धीरे उस पोजीशन के लिए तैयार कर लिया है, जिस पर कोई भी फिल्म निर्माता या निर्देशक अब करोड़ों के दांव लगा सकता है। अदाकारी के लिहाज से फिल्म में यामी गौतम सबसे कमजोर कड़ी हैं, उनकी जगह तो गिनती के दृश्यों में झलक दिखाने वाली कीर्ति कुल्हाड़ी बेहतर साबित हो सकती थीं। यामी गौतम की मुस्कुराहट और अदाकारी दोनों फिल्म में बनावटी दिखती हैं। हां, परेश रावल की फ्रेम में मौजूदगी ही परदे पर जो भी हो रहा हो, उसमें करिश्माई करवट ले आती है और यहां भी उन्होंने निराश नहीं किया है।
फिल्म तकनीकी रूप से भी अच्छी बन पड़ी है। मीतेश मीरचंदानी की फोटोग्राफी कमाल की है। कम रोशनी वाले दृश्यों में उनके कैमरे ने कमाल किया है। शिवकुमार पैनिकर ने अपनी एडीटिंग की बदौलत फिल्म की गति बनाए रखी है और फैमिली ड्रामा वाले दृश्यों को छोड़ दें तो फिल्म कहीं बोर नहीं करती।
इस तरह की फिल्मों में एक संगीतकार के लिए काफी कुछ करने को होता नहीं लेकिन फिर भी शाश्वत सचदेव ने इतना काम तो कर ही दिया है कि लोग क्रेडिट्स में उनका नाम जरूर तलाशते हैं। फिल्म में थोड़ी और रिसर्च और थोड़ा कम मेलोड्रामा इसे बेहतर फिल्म बनाने में मदद कर सकता था। फिर भी, फिल्म उरी बहुचर्चित सर्जिकल स्ट्राइक के लिए एक बार तो देखी ही जा सकती है। अमर उजाला डॉट कॉम के रिव्यू में उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक को मिलते हैं तीन स्टार।