डिंपल कपाड़िया
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के के सिंह ने इशराक-सूजा की लिखी जिस कहानी के लिए इतने दमदार संवाद लिखे, वह कहानी बहुत ही साधारण किस्म की कहानी है। हालांकि फिल्मफेयर पुरस्कारों में कहानी और संवाद दोनों पुरस्कार उस साल क्रांतिवीर ने ही जीते थे। फिल्म ने बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड भी नाना के लिए जीता और बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का पुरस्कार इस फिल्म के लिए जीता था डिंपल कपाड़िया ने। ये और बात है कि डिंपल को इस रोल के लिए मनाने के लिए मेहुल को उनके घर के खूब चक्कर लगाने पड़े थे। हालांकि, मेहुल ने इस रोल के लिए श्रीदेवी को भी खूब समझाने की कोशिश की थी और ये दोनों कोशिशें वह बिना एक दूसरे को बताए कर रहे थे। श्रीदेवी ने तो बाद में इसके लिए इंकार कर दिया और फिर डिंपल को मनाने के लिए मेहुल ने अपने सारे दांव पेंच आजमाए और उन्हें फिल्म में मेघा का किरदार करने के लिए राजी करने में सफल रहे।
कहानी फिल्म की कुछ यूं है कि अपने बाबा की मौत का कुसूरवार ठहराया गया प्रताप तिलक गांव छोड़कर बंबई आता है। जिस चॉल में वह रहता है वहां बदमाशों का बसेरा है। चाल का मालिक लक्ष्मीनाथ अपनी जान बचान के एवज में प्रताप को अपने पास रख लेता। लक्ष्मीनाथ का बेटा जिस बिल्डर की बेटी से प्यार करता है, उसकी नजर इस चॉल पर है। कहानी में एक अहम किरदार है मेघा दीक्षित। मेघा और प्रताप के रिश्ते शुरू में तो बहुत खास नहीं होते लेकिन जब प्रताप को मेघा के संघर्ष का पता चलता है वह उसे शादी का प्रस्ताव देता है। प्रताप के भीतर का आम आदमी इसके बाद हिंसक होता है और तमाम कत्ल करके फांसी के फंदे तक जा पहुंचता है।
फिल्म के आखिरी सीन में प्रताप तिलक को बचते हुए दिखा दिया जाता है। फिल्म की याद भी लोगों को इसके इस सीन और इसके बाकी के संवादों की वजह से ही। फिल्म का संगीत समीर और आनंद मिलिंद से बड़ी मेहनत से बनाया जरूर लेकिन इसकी कोई खास मदद फिल्म को मिली नहीं, हां, ये गाना उस दौर में बड़ा चर्चित गाना रहा था, खास तौर से नाना पाटेकर के ठुमकों की वजह से..। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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