अपना पता मिले न खबर यार की मिले
दुश्मन को भी ना ऐसी सजा प्यार की मिले
उनको खुदा मिले, है खुदा की जिन्हें तलाश
मुझको बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले
ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं...मेरे काम की नहीं..
ये लाइनें आज से 50 साल पहले लिखी गईं। या उससे भी थोड़ा पहले क्योंकि 1970 में तो चेतन आनंद की फिल्म हीर रांझा रिलीज हो गई। इससे पहले निर्देशक वली भी 1948 में हीर रांझा बना चुके थे। बाद में अनिल कपूर और श्रीदेवी को लेकर हरमेश मल्होत्रा ने भी 1992 में हीर रांझा बनाई लेकिन अपनी रिलीज के आज 50 साल पूरे करने वाली हीर रांझा में अभिनेता राज कुमार ने जिस शिद्दत से ये गाना गाया, इस फिल्म की पहली झलक भी लोगों को वही याद है। दूरदर्शन शुरू ही शुरू हुआ था और चित्रहार में ही पहली बार मुझे ये गाना देखने का मौका मिला। इस गाने में राजकुमार के चेहरे पर जो बेख्याली और बेतकल्लुफी दुनियादारी से दिखती है, वही असल प्रेमी का रूप है। प्रेम जिसे फिल्म में काजी भगवान की सबसे बड़ी बाधा बताता है और जिसे हीर तुरंत वहां से चले जाने को कहती है। हीर रांझा हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। ये किस्सा इसके रचयिता वारिस शाह का खुद का है या कहीं का देखा हुआ, पता नहीं चलता लेकिन सवाल ये भी कि कोई दूसरा क्यों इतना गहराई तक जाकर प्रेम का ये पहलू उकेरेगा।