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Gunjan Saxena Review: रिश्तों को दिखाने का ये है असली मीडियम, भावुक कर देगी लखनऊ की बेटी की कहानी

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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल
कलाकार: जान्हवी कपूर, पंकज त्रिपाठी, अंगद बेदी, मानव विज, रीवा अरोरा, आयशा रजा मिश्रा, मनीष वर्मा और विनीत कुमार
निर्देशक: शरण शर्मा
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ***1/2


फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ के बारे में बात शुरू करने से पहले बात उस सर्कुलर की जो रक्षा मंत्रालय ने कुछ ही दिन पहले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को इस आशय से भेजा कि सेनाओं पर बनने वाली सारी फिल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले रक्षा मंत्रालय का अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी है। 
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ में ऐसा कुछ तो नहीं है जिस पर सेना को आपत्ति हो लेकिन फिल्म के निर्देशक शरण शर्मा का ये कहना कि भारत में उन्हें हेलीकॉप्टर मिलने में दिक्कत हो रही थी, इस तरफ भी रक्षा मंत्रालय को ध्यान देना चाहिए। सेना की अदम्य कहानियां और भी बनना जरूरी हैं, ये कहानियां लोगों में देशभक्ति की भावनाएं तो जगाती ही हैं, ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ जैसी फिल्में ये भी बताती है कि इन कहानियों में लोगों के निजी संघर्ष का कितना बड़ा योगदान है। और, ऐसी हर कहानी को रक्षा मंत्रालय से पूरी मदद मिलनी चाहिए।
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ एक तरह से देखा जाए तो सिर्फ कारगिल युद्ध की कहानी नहीं है। ये कहानी है तीस साल पहले के लखनऊ में रहने वाली एक लड़की की, जिसका सपना पायलट बनना है। मां को लगता है कि कुछ टोटका करने से लड़की के सिर से पायलट बनने का भूत उतर जाएगा। भाई को भी बहन के ये तेवर कुछ सही नहीं लगते। वह कमर्शियल पायलट बनने की कोशिशें शुरू करती है और एक दिन एयरफोर्स पायलट बन जाती है। इस पूरे संघर्ष में जो एक व्यक्ति उसके साथ लगातार बना रहता है वो है उसका पिता, जिसका भारतीय थलसेना में लेफ्टिनेंट कर्नल पद से रिटायर होना शायद उसकी बदली हुई सोच में बड़ी वजह निभाता है।

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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
30 साल पहले कोई पिता अपनी बेटी को न सिर्फ घर से बाहर जाकर अपनी मर्जी का कुछ करने के लिए प्रेरित करता है, बल्कि परिवार के बाकी सदस्यों की भावनाओं से लड़कर भी बेटी को पायलट बनने के लिए प्रेरित करता है, यही इस फिल्म की अंतर्धारा है। फिल्म में ये किरदार पंकज त्रिपाठी ने किया है। पंकज त्रिपाठी के शुरुआती हावभाव तो बाकी फिल्मों जैसे ही लगते हैं लेकिन लेकिन धीरे धीरे वह इस किरदार में रस घोलते जाते हैं। एक मजबूत कलेजे वाले लेकिन भावुक पिता के किरदार में पंकज ने एक बार फिर रंग जमाया है।
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ सामाजिक रूप से एक कामयाब फिल्म बन पाई है तो उसका बड़ा श्रेय इसके लेखक निर्देशक शरण शर्मा और इसमें शीर्षक भूमिका कर रहीं जान्हवी कपूर को जाता है। दोनों ने एक बेहतरीन तालमेल के साथ फिल्म को उसकी आत्मा के करीब रखने में पूरी कामयाबी पाई है। फिल्म का समय बताने के लिए निर्देशक ने हिंदी सिनेमा के कुछ हिट गानों का अच्छा साथ लिया है और जान्हवी कपूर के अभिनय का उत्कर्ष भी उस सीन में ही दिखता है जब वह ऑफिसर्स मेस में बज रहे गाने ‘चोली के पीछे क्या है...’ को खुद जाकर बंद कर देती है। इसके बाद जो होता है वह बताने लायक नहीं बल्कि देखने लायक सीन है। गुंजन सक्सेना के हिम्मत छोड़ देने के बाद लखनऊ लौटने पर अपने पिता के साथ का किचन वाला सीन भी बहुत ही भावुक है, और इसके बाद जब वह मुंहअंधेरे घर से बिना किसी को बताए वापस अपनी पोस्टिंग पर चली जाती है तो वहां से फिल्म का उत्कर्ष शुरू होता है।
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जान्हवी कपूर को फिल्म ‘धड़क’ में देखने के बाद तमाम लोगों ने ये छींटाकशी की कि उनका फिल्म में होना बस श्रीदेवी और बोनी कपूर की बेटी होने की वजह से है। लेकिन, इस बार जान्हवी ने इन आरोपों से निपटने के लिए खुद को भी तैयार किया है। वह एक फिल्मी परिवार में पैदा हुईं, इसमें उनका दोष नहीं हैं। हां, अगर खुद को इस वजह से मिले मौके के बाद वह मेहनत करने से चूक जातीं तो जरूर उन पर और उनके पथ प्रदर्शक करण जौहर पर वंशवाद का विरोध करने वाले हजार तोहमतें और लगाते। जान्हवी ने फिल्म में एक आम भारतीय लड़की के भावों को अच्छे से प्रस्तुत करने में कामयाबी पाई है।
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म को भरोसे लायक कहानी बनाने में इसके सहायक कलाकारों का बहुत बड़ा योगदान है। खड़ूस ड्यूटी ऑफिसर बने विनीत कुमार के अभिनय के नए तेवर इस फिल्म में दिखे हैं। मानव विज भी दबंग, सख्त लेकिन भरोसेमंद कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर प्रभावित करते हैं। अंगद बेदी ने हिंदी सिनेमा में अपना एक कोना पक्का कर लिया है। दो साल पहले आई फिल्म ‘सूरमा’ में भी उन्होंने भाई का ही रोल किया था, वहां उनका किरदार नायक को अपने लक्ष्य के लिए प्रेरित करता है, यहां मामला उल्टा है। लेकिन, फिल्म का असल संदेश उसी सीन में निकलकर बाहर आता है जब दोनों भाई बहन का युद्ध के मोर्चे पर आमना-सामना होता है।

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गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल - फोटो : ट्विटर
तकनीकी रूप से भी फिल्म अच्छी बन पड़ी है। अमित त्रिवेदी के पास हालांकि इस बार फिल्म के संगीत पक्ष में कोई खास योगदान करने का मौका तो नहीं रहा लेकिन फिर भी अरिजीत सिंह, अरमान मलिक और ज्योति नूरां को लेकर उन्होंने माहौल बनाने में अच्छी मदद की है। आर डी ने फिल्म की सिनेमैटोग्राफी को अनावश्यक प्रयोगों से दूर रखते फिल्म को जमीन से जोड़े रखने में कामयाबी पाई है और आरिफ शेख ने भी फिल्म को चुस्त रखते हुए इसकी लंबाई नियंत्रित रखी है। फिल्म के एक्शन सीक्वेंस में उनकी एडीटिंग कमाल की है। जॉन स्टीवर्ट एडूरी का रचा बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के प्रवाह को कहानी की गति के हिसाब से सहज बनाए रखता है।
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गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ एक असली कहानी में फिल्मी तड़के लगाकर बनाई गई कहानी है और ये देशभक्ति फिल्म कतई नहीं है। ये बातें तो देश की रक्षा की करती है लेकिन ये फिल्म एक पिता और एक बेटी के भावपूर्ण और प्रेरक रिश्ते को दिखाती फिल्म है। फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ के आगे की बात करती है। आपके घर में अगर बेटी है और वह कुछ बनना चाहती है तो ये फिल्म उसे भी दिखाएं और आप भी जरूर देखें। अमर उजाला रिव्यू में ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ को मिलते हैं साढ़े तीन स्टार।
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