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Shekhar Suman Podcast: क्या हुआ जब मुंबई आकर शेखर ने बजाई शम्मी आंटी के फोन की घंटी, पूरी कहानी, उनकी जुबानी

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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला
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अबकी बार की चुनावी चर्चा से अभिनेता शेखर सुमन कोसों दूर हैं। सियासत से उन्हें कोई गिला भी नहीं है और न ही इससे इनकार है। बस, वह इन दिनों अपनी वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ की रिलीज की तैयारियां कर रहे हैं और अपने बेटे अध्ययन के साथ इस सीरीज में किए गए किरदारों को खूब याद कर रहे हैं। मुंबई के पॉश इलाके अंधेरी पश्चिम की एक गगनचुंबी इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर रहने वाले शेखर सुमन की शख्सीयत के लोग आज भी कायल हैं। जमीन से जुड़े, बातों में बेफिक्री और दिल मिल जाए तो ठट्ठा लगाकर हंसना उनको खूब भाता है। इस एक घंटे लंबी बातचीत में शेखर सुमन ने याद किया है, अपना वो सफर जिसे उन्होंने पहली बार खुलकर बयां किया है, ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल के सामने।
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उत्सव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
आपकी पहली फिल्म ‘उत्सव’ से लेकर ‘हीरामंडी’ तक एक विशेष कालखंड की कहानियों का एक चक्र सा पूरा होता दिख रहा है..
जी हां, 26 सितंबर 1985 को रिलीज फिल्म ‘उत्सव’ से गिनें तो अगले साल इसके 40 साल पूरे हो जाएंगे। ‘हीरामंडी’ में भी वैसा ही माहौल है। वैसा ही पीरियड सिनेमा, उतने ही भव्य सेट, उतने ही महान फिल्मकार। ‘उत्सव’ में शशि कपूर, गिरीश कर्नाड, रेखा के साथ काम करना, भी एक कमाल का दौर था। एक कमाल ये भी था कि बंबई (अब मुंबई) आए हुए अभी मुझे दो हफ्ते भी नहीं हुए थे और मुझे ये फिल्म मिल गई थी। इसे ही किस्मत कहते हैं। ये सारा नसीब में होता है।
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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
मैं ‘उत्सव’ और ‘हीरामंडी’ दोनों में अभिनय का मौका मिलने को लेकर आपकी प्रतिक्रियाएं जाना चाहूंगा। पहले ‘हीरामंडी’ की बात करते हैं..
भंसाली साब के साथ एक मौका मिला था मुझे फिल्म ‘देवदास’ में काम करने का जो मैं नहीं कर पाया, वह चुन्नीलाल का रोल था। उनके लिए दिल में बहुत एहतराम है। हमेशा से उनके लिए बहुत सारा प्यार और अकीदत रही है। मुझे यूं लगता है कि जो बड़े फिल्ममेकर रहे हैं जैसे गुरुदत्त, कमाल अमरोही, के आसिफ साब, राज कपूर, बिमल रॉय आदि, इन सबकी मानवीय भावों पर बहुत जबरदस्त पकड़ रही है। खासतौर से गुरुदत्त और राज कपूर जैसे फिल्मकार जब साहिर और शैलेंद्र जैसे गीतकारों के साथ मिलकर कुछ रचते थे तो उसका असर विलक्षणकारी होता था। किरदारों की नब्ज पकड़ लेना और इन किरदारों के भीतर जहनी और रूहानी तौर पर चले जाना ही एक फिल्मकार की जीत है।

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शेखर सुमन, संजय लीला भंसाली - फोटो : इंस्टाग्राम
संजय लीला भंसाली की पहली फिल्म आपने कौन सी देखी कि क्या प्रतिक्रिया थी फिल्म के निर्देशन को लेकर आपकी?
मैंने उनकी पहली फिल्म ‘खामोशी’ जब देखी तो मुझे लगा कि इस निर्देशक में कोई बात है। उनके अब के सिनेमा के मुकाबले उसमें कोई भव्यता नहीं थी। लेकिन, मानवीय भावनाओं पर उनकी वो पकड़ कमाल थी। नाना पाटेकर और सीमा बिस्वास के किरदार, और उनका मनीषा कोइराला के किरदार के बीच जो समीकरण बना है, वह बहुत खूबसूरत है। ‘हम दिल दे चुके सनम’ तक आते आते वह थोड़ा कमर्शियल हुए लेकिन इसके बावजूद, जो सारे रिश्ते उन्होंने इस फिल्म में बनाए, अजय देवगन, सलमान और ऐश्वर्या के किरदारों के बीच या कि ऐश्वर्या  के किरदार और उनके पिता के बीच, वह एक बहुत ही जज्बाती इंसान ही ऐसा कर सकता है।
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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
यहां से ठीक 40 साल पीछे आपको ले जाना चाहता हूं, जब 20 साल का पटना का एक लड़का मुंबई आया और आते ही उसे शशि कपूर और गिरीश कर्नाड के साथ काम करने का मौका मिला। कितनी रातों तक फिर नींद नहीं आई आपको?
आज तक उस बात को सोचकर मेरी नींदें उड़ जाती हैं कि कैसे ये हुआ। जब मुझे ये बताया गया था। वह बिल्कुल अकल्पनीय था। ये हो नहीं सकता था। शशि कपूर जी ने जब मुझे पहली बार बताया था कि तुम फिल्म के लिए चुन लिए गए हो तो मैं पृथ्वी थियेटर से अंधेरी ईस्ट में रहने वाली अपनी बहन के घर, जहां मुंबई आने के बाद मैं रुका था, के घर तक पैदल भागते पहुंचा था। चप्पलें भी रास्ते में कहीं छूट गईं। बस का इंतजार करने का ख्याल तक नहीं आया।
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शेखर सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
और, शशि कपूर की फिल्म मिलना? कैसे हुआ ये?
ये एक बहुत लंबी कहानी है, कई बार बता चुका हूं। सही तरीके से आज तक किसी पत्रकार ने इसे दर्शाया नहीं है। आप सुनना चाहते हैं तो फिर बताता हूं। आप सोचिए एक यंग सा लड़का। ख्वाब लिए हुए कि मुझे एक फिल्म हीरो बनना है। सपने देखता है कि किसी बड़े सितारे के साथ काम करूंगा। बंबई आता है। ऐसे ख्वाब लिए सैकड़ों नौजवान आते हैं। ज्यादातर वापस चले जाते हैं। कुछ भ्रमित हो जाते हैं। कुछ किन्हीं और पेशों में अपनी मंजिल तलाश लेते हैं। उसमें एक छोटे से शहर का लड़का। वो भी बिहार का, जहां की जबान खराब मानी जाती है। कोई पृष्ठभूमि नहीं सिवाय इसके कि मैं एक्टर बनना चाहता था। मैंने ट्रेनिंग ली थी एक्टिंग में। लेकिन मैं एक ब्यूरोक्रेटिक फैमिली से था। पिताजी डॉक्टर। फैमिली में कोई आईएएस, तो कोई आईएफएस, उसमें कैसे ये ख्वाब और कहां और क्यूं पनपा? ये आज तक नहीं मालूम।
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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
फिल्में देखकर ही लगा होगा कि हीरो बन सकता हूं?
हां, जब मैं बड़ा हो रहा था तो पुरानी फिल्में जो दोबारा सिनेमाघरों में लगा करती थीं उन सबको देखने लगा। लोग कहते कि तुम इतने छोटे हो और ये दिलीप साब की फिल्म देखते हो, राज कपूर साब की फिल्में देखते हो, तुमको तो अब के जमाने की फिल्में देखनी चाहिए..

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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
..मतलब राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन?
हां, यही कहते कि कहां तुम पीछे भाग रहे हो देव आनंद के जमाने में। लेकिन, मुझे वे फिल्में बड़ी अच्छी लगती थी और उस समय एक टिकट में दो खेल भी देखने को मिलते थे। बड़ा मजा आता था और मुझे याद है कि जब मैं बहुत छोटा था तो मैंने बिमल रॉय वाली देवदास देखी थी और वो शरत चंद्र की कहानी, उसकी खूबसूरती और दिलीप साब की अदायगी वो सब इतनी खूबसूरती से बनी थी वो फिल्म।

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फराह खान और बिग बॉस 16 के प्रतिभागियों के साथ शेखर सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
तो मुंबई आपका आना योजनाबद्ध तरीके से हुआ या कि बस एक दिन परिवार को बिना बताए ही आ गए?
नहीं, वो तो एक बहुत ही लोकतांत्रिक तरीके से हुआ। मैं पटना से दिल्ली गया था पढ़ाई करने। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और तब तक मैं बहुत बदल चुका था। एक इंसान के रूप में भी और चूंकि मैं एक पब्लिक स्कूल में पढ़ा बच्चा हूं तो मेरा दृष्टिकोण भी बहुत विस्तृत हो चुका था। हालांकि, दिल में मैं अब भी पटनिया हूं। दिल से पूरी तरह बिहारी हूं बिहार की मिट्टी का अंश हूं और अंत तक रहूंगा। लेकिन ये है कि मुलम्मा चढ़ चुका था, एक बड़े शहर का। और वहां से पढ़ाई लिखाई करके खुद को लैस करके मुंबई आया मैं पूरी तैयारी के साथ।

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शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
आते ही कहां रुके होंगे आप यहां तब की बंबई में?
मेरी बड़ी बहन शिला स्मृति का घर था अंधेरी ईस्ट में तो वहां ठहरा था। वसंत अपार्टमेंट की तीसरी मंजिल पर वह रहती थीं। मैं मुंबई आया इसी वजह से कि मेरे पास रुकने की जगह थी। मुझे ऐसा कोई शौक नहीं था कि मैं फुटपाथ पर सोऊं या इधर उधर जाऊं। उनका भी छोटा सा घर था। उनके ड्राइंग रूम में मैं सोया करता था। तब मैंने शादी भी कर ली थी बीस साल की उम्र में।

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पत्नी अलका के साथ शेखर सुमन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
मतलब जब आप मुंबई हीरो बनने आए तो आपकी शादी हो चुकी थी?
जी हां, मैंने जिद करके लड़ाई करके दिल्ली में शादी कर ली थी। मैंने अंतर्जातीय विवाह किया था। अलका पंजाबी परिवार से हैं और ऐसा हमारे यहां पहले कभी कायस्थों के परिवार में हुआ नहीं था। मां बाप बोले, अभी तुम काम नहीं करते हो, कैसे देखोगे, कैसे करोगे? लेकिन मैंने कहा कि नहीं, सब हो जाएगा। उन दिनों मैं श्रीराम सेंटर में अभिनय कर रहा था। छह सौ रुपये महीने के मिलते थे। अलका पढ़ाई के साथ साथ एक दुकान में पार्ट टाइम इंटर्नशिप करती थीं। कुल मिलाकर हजार बारह सौ इकट्ठा हो जाते थे। डिफेंस कॉलोनी की एक बरसाती में रहते थे। चार सौ रुपये किराया था। दो सौ रुपये बाइक के पेट्रोल के लिए और दो सौ रुपये में खाना। बाकी जो बचता, उसमें ऐश करते थे।

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शेखर सुमन पत्नी अलका के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
और, आप जब पहली बार बंबई पहुंचे तो उस दिन का असर कैसा था?
मैं बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा तो मैंने अलका की तरफ देखकर कहा कि मेरा आत्मविश्वास थोड़ा डगमगा गया है। मैं तो पूरे आत्मविश्वास के साथ आया था कि मैं ये कर लूंगा वो कर लूंगा। लेकिन, इतने सारे लोग! और कोई पीछे मुडकर देख भी नहीं रहा। रोबोट्स की तरह चले जा रहे हैं। मेरी तरफ कौन निगाह डालेगा? और, क्यों देखेंगे? और, कहां से मैं शुरुआत करूं? मुझे कुछ इल्म नहीं था लेकिन देखिए नियति भी कमाल की चीज है। और, उसकी नींव पहले ही डाल दी जाती है। जब मैं श्रीराम सेंटर फॉर आर्ट एंड कल्चर से डिप्लोमा कर रहा था और वहां रिपर्टरी कंपनी में एक्टर था तो उन दिनों मशहूर अभिनेत्री शम्मीजी एक फिल्म बतौर प्रोड्यूसर बना रही थीं, ‘पिघलता आसमान’, शशि कपूर और राखी को लेकर। उसको निर्देशित कर रहे थे इस्माइल श्रॉफ। उसमें एक छोटा सा लेकिन अहम रोल अखबार बांटने वाले एक लड़के का था। इस किरदार की तलाश के लिए एनएसडी के बाद शम्मीजी सी श्रीराम रंग सेंटर आईं। सबके ऑडिशन हुए और मेरा सेलेक्शन हो गया। मुझे क्या मालूम था कि यही रास्ता मुझे उत्सव तक ले जाएगा। यही रास्ता मुझे उत्सव तक ले भी गया और इसी रास्ते ने मुझे फिल्म उत्सव का नायक बनाया।

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शेखर सुमन, अध्ययन सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
और, वहीं आपको पता चल गया कि कैसे आगे जाना है..
तो सुनिए तो, ये कहानी तो आप सुनिए। शम्मीजी ने कहा कि चुनाव होगा तो जितने भी लड़के रिपर्टरी में थे, सब आ गए। ऑडिशन शुरू हो गए कि कौन कैसा बोलता है कैसा दिखता है? और, फिर कल आने की बात कहकर वह चली गईं। उनके जाने के बाद सब मुझसे गालियां देकर कहते रहे कि तुम्हीं सबसे खूबसूरत हो, तुम्हारा ही सेलेक्शन होगा। मैं भी मन ही मन में मना तो यही रहा था कि रोल मुझे ही मिले लेकिन ऊपर ऊपर बहुत भोला बना रहा कि नहीं नहीं यार ऐसा क्या है? किसी को भी मिल सकता है। दूसरे दिन शम्मीजी आईं और मेरा नाम उन्होंने सार्वजनिक कर दिया। उन्होंने उसी समय मेरे हाथ पर एक हजार एक रुपये साइनिंग के तौर पर रखे। अब उस इंसान की सोचिए जिसे छह सौ रुपये मिलते थे महीने भर के। मेरे लिए तो एक हजार ही एक करोड़ के बराबर थे। मैं इतना खुश हुआ कि बता नहीं सकता।

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शेखर सुमन, अध्ययन सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
और, आप कैमरे के सामने पहुंच गए?
इतना आसान कहां होता है ख्वाबों को हकीकत में बदल पाना। शम्मी जी ने बताया कि उनके प्रोडक्शन कंट्रोलर हैं कल्लू मियां मुझे लेने आएंगे। उन्होंने मेरा पता लिया और जाने लगीं तो पूछा कि कोई सूट है? मेरे पास एक ही सूट था और मोटरसाइकिल से गिरने की वजह से पीछे से फट गया था। मैंने बताया कि सूट तो है लेकिन उस पर पैबंद है हालांकि दिखता नहीं है। वह मुस्कुराई और चली गईं। अगले दिन हम डिफेंस कॉलोनी के बी 72, सेकंड फ्लोर की बरसाती की खिड़की में लटके हुए हैं। पास में ड्राई क्लीनिंग करके चमकाया गया सूट भी लटक रहा है। घड़ी की सुइयों पर निगाहें टिकी हैं कि कब 11 बजे और कल्लू मियां की गाड़ी का हॉर्न बजे। बताया गया था कि मुझे डिफेंस कॉलोनी से सैनिक फार्म्स पहुंचना है। शूटिंग वही चल रही थी। लेकिन, सुबह से शाम हो गई, कल्लू मियां नहीं आए। हम अगले दिन फिर सूट के साथ खिड़की पर। फिर कल्लू मियां नहीं आए। ये सिलसिला अगले दिन भी चला। चौथे दिन मैंने हार मान ली कि फिल्मी लोग बातें बड़ी बड़ी करते हैं, करते कुछ नहीं है।

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शेखर सुमन, अध्ययन सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
ओह हो, ये तो बहुत मायूसी वाली बात हो गई, फिर...?
घर पर कोई फोन नहीं। मोबाइल का तो जमाना ही नहीं था। मैं बहुत मायूस हो गया। रुआसा हो गया था। चौथे दिन एक बार और बैठकर मैं खिड़की से हटने ही वाला था तो एक हॉर्न की आवाज आई। एक एंबेसडर आकर रुकी। उसमें से कल्लू मियां उतरे और उन्होंने कहा कि सॉरी थोड़ा शूटिंग का शेड्यूल आगे पीछे हो गया था तो मैं नहीं आ पाया। बोले, कि आप तैयार हैं? मेरे मुंह से तो यही निकला कि हम तो चार दिन से तैयार हैं। मुझसे ज्यादा कौन तैयार होगा, इस दुनिया में। दौड़ा मैं सूट लेकर और पहुंचा वहां तो पहली बार मैंने शशि कपूर को देखा। मुझे लगा कि वाकई सितारे ऐसे ही होते हैं, खूबसूरत, गोरे, एकदम लाल..इतने हसीन थे शशि जी, उनसे निगाहें नहीं हटीं। और, राखी जी को भी देखा, उनके ही साथ सीन था।

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फराह खान, शेखर सुमन - फोटो : इंस्टाग्राम
तो बताइए कैसा रहा आपके अभिनय करियर का कैमरे के सामने वाला पहला सीन?
फिल्म के निर्देशक इस्माइल श्रॉफ ने मेरी तरफ ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा, कर पाओगे? मैं तो इस दिन के लिए न जाने कब से तैयार था। सीन समझा। लाइनें समझीं और कैमरे के सामने तैयार खड़ा हो गया। उधर, एक्शन की आवाज मेरे कानों में पड़ी। फिर कैमरा चलता रहा। मैंने अपना सीन किया। और, फिर दूसरी आवाज मेरे कानों में आई, ओके। मेरे जीवन का फर्स्ट टेक, फर्स्ट टेक में ही बिल्कुल ओके हो गया। सब लोग तालियां बजा रहे हैं कि अरे, कमाल का एक्टर है ये। सब कुछ हो गया और मैं जाने लगा तो बड़ी हिचकिचाहट के साथ मैंने शम्मी जी से कहा कि आपका नंबर मुझे मिलेगा? कभी आऊंगा तो फोन करूंगा, आप करेंगी ना मेरी मदद? शम्मी जी ने बहुत दुलार किया और मदद का वादा किया। कागज के एक छोटे से टुकड़े पर उन्होंने अपने घर का फोन नंबर लिखकर दे दिया। उस कागज के टुकड़े ने मेरी तकदीर बदली है। आज मैं जहां हूं, उस कागज के टुकड़े की बदौलत हैं। मैंने उस कागज के टुकड़े को अपनी जायदाद की तरह संभाल कर रखा। वो कागज का टुकड़ा अगर मैं खो देता तो शायद ‘उत्सव’ मुझे नहीं मिलती। उस कागज को मैंने बहुत जतन से बहुत संभालकर रखा, सीने से लगाकर, दो साल तक...
और, फिर दो साल बाद जब शेखर सुमन ने मुंबई आकर अभिनेत्री शम्मी को फोन किया, तो क्या हुआ, ये सुनने के लिए क्लिक करें नीचे दिए पॉडकास्ट के लिंक पर और  सुनिए पूरा किस्सा खुद शेखर सुमन की जुबानी
शेखर सुमन ने आमिर खान से की अपनी तुलना, सुनिए शेखर सुमन का ‘शुक्ल पक्ष’ सिर्फ ‘अमर उजाला आवाज’ पर
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