मैं तो बहुत संतुष्ट हूं। मैं समझती हूं कि मुझे ऐसा लगता है कि सभी लोग मेरे साथ जो काम करते हैं वह खुश हैं। मैं भी बहुत खुश हूं, रंगमंच मुझे अपनी जान से भी बहुत ज्यादा प्यारा है।
मशहूर रंगकर्मी नादिरा बब्बर ने अपना पूरा जीवन रंगमंच को समर्पित कर दिया। नादिरा बब्बर का मानना है कि रंगमंच उनका पहला प्यार है और यह अनवरत जारी रहेगा। नादिरा बब्बर ने फिल्मों में कभी भी अपना करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा। वह हैरानी जताती हैं कि ओटीटी के इस दौर में इस प्लेटफॉर्म पर काम करने के प्रस्ताव उनके पास नहीं आ रहे हैं। नादिरा बब्बर से अमर उजाला की खास बातचीत।
दूर दराज के शहरों, कस्बों, गांवों से लोग जब मुंबई अभिनय करने आते हैं और रंगमंच की तरफ आकर्षित होते हैं, तो आपका नाम उनके जेहन में सबसे पहले आने वाले नामों में होता है? अब तक की अभिनय यात्रा से कितनी संतुष्ट हैं आप?
मैं तो बहुत संतुष्ट हूं। मैं समझती हूं कि मुझे ऐसा लगता है कि सभी लोग मेरे साथ जो काम करते हैं वह खुश हैं। मैं भी बहुत खुश हूं, रंगमंच मुझे अपनी जान से भी बहुत ज्यादा प्यारा है। जितनी खुशी मुझे रंगमंच पर मिलती है, इतनी खुशी मुझे किसी और काम में नहीं होती है। रंगमंच ही मेरा पहला प्यार है और यह अनवरत जारी रहेगा।
वैसे तो पूरा जीवन ही रंगमंच है और आपने भी जीवन में कई बार अभिनय किया ही होगा, दूसरों के सुख के लिए, अपने सुख के लिए रंगमंच में आपको किसी बात की तलाश रहती है?
तलाशना शब्द मुझे बहुत गलत लगता है। मैं कुछ न कुछ नई चीज ढूंढती रहती हूं, यह मुझे बहुत अच्छा लगता है। 19 वर्ष की उम्र से ही रंगमंच पर काम कर रही हूं। रंगमंच करते -करते कब इतना इतना लंबा समय बीत गया पता ही नहीं चला। रंगमंच पर जो सुकून मिलता है, वह किसी काम में नहीं मिलता है।
आमतौर पर रंगमंच की उतनी बात मीडिया में होती नहीं है जितना रंगमंच देश की अलग अलग भाषाओं में इन दिनों हो रहा है। थियेटर और दर्शकों के बीच का पुल कहां मिसिंग है?
ऐसी बात नहीं है। थियेटर और दर्शकों के बीच कहीं कुछ भी मिसिंग नहीं है। आज भी थियेटर बहुत हो रहा है। और, थियेटर को देखने वाले दर्शक भी बहुत हैं। बल्कि पहले की अपेक्षा दर्शकों का रुझान रंगमंच की तरफ ज्यादा हुआ है। पहले की अपेक्षा रंगमंच पर काम करने वाले कलाकारों को पैसे भी अच्छे मिल रहे हैं।
'यहूदी की लड़की' से आपने पारसी थियेटर को पुनर्जीवित किया, अब तक भी इसके बहुत सारे शोज होते रहते है। पहली बार जब आपने इस नाटक का मंचन किया, कैसे अनुभव रहे?
इससे पहले मैंने 'इकबाल की शायरी' से रंगमंच की शुरुआत की। वह नाटक बहुत ही ज्यादा कामयाब था। जब मैंने पहली बार 'यहूदी की लड़की' का मंचन किया तो उसके बहुत ही अच्छे अनुभव रहे हैं। मेरे लिए वह नया नाटक था, पहली बार किया जा रहा था। हमारे जमाने में उस नाटक को कोई नहीं करता था। वह नाटक भी बहुत कामयाब हुआ। पारसी थियेटर के बारे में ज्यादा माहिर नहीं थी। उस पर मैंने शोध किया, फिर उस नाटक को पारसी थियेटर स्टाइल में किया।
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नादिरा बब्बर परिवार के साथ
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
'दयाशंकर की डायरी' पहला नाटक आपने खुद लिखा, आपको कब लगा कि खुद लिखे नाटकों पर मंचन करना चाहिए? आशीष विद्यार्थी ही इस नाटक का मंचन करते आए हैं, ऐसा कोई दूसरा एक्टर आपकी जेहन में जो इस नाटक को कर सकता है?
उस समय हिंदी के नाटक कहीं से आ ही नहीं रहे थे। सारे नाटक अंग्रेजी में होते थे, अंग्रेजी नाटक को कितना अडॉप्ट करें। जब मुश्किल हो गई तो हमने यही सोचा कि हिंदी और उर्दू के नाटक करेंगे। अगर नहीं होता है तो हम खुद अपने नाटक लिखेंगे। वहीं से 'दयाशंकर की डायरी' की शुरुआत हुई। ऐसे बहुत सारे एक्टर हैं, जो इस नाटक को कर सकते हैं, मुझे लगता है मानव कौल इस नाटक को अच्छे तरीके से कर सकते हैं।
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नादिरा बब्बर और राज बब्बर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने अपना पूरा जीवन रंगमंच को समर्पित कर दिया, रंगमंच को बढ़ाने में राज बब्बर का कितना सहयोग रहा? और अब आपकी बेटी जूही इस विधा की विरासत संभाल रही हैं। किसी भी कलाकार के लिए परिवार का साथ कितना जरूरी होता है।
उनका सहयोग शुरू से ही जिंदगी भर रहा है। वह नहीं होते तो मैं इतनी कामयाबी से काम ही नहीं कर पाती। अभी मेरी बेटी जूही रंगमंच को बहुत ही अच्छे से संभाल रही हैं। किसी भी कलाकार के लिए परिवार का साथ होना बहुत ही जरूरी होता है। बिना परिवार के साथ के हम कोई भी काम कर ही नहीं सकते।
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राज बब्बर और नादिरा बब्बर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रंगमंच से फिल्मों में आए कलाकार जब फिल्मों में सफल हो जाते हैं, तो रंगमंच के प्रति उनकी कितनी भूख रहती है?
बहुत सारे एक्टर हैं जो फिल्मों में सफल होने के बाद थियेटर करना चाहते हैं, लेकिन यह तो उनके ऊपर निर्भर करता है कि थियेटर के लिए कितना समय निकाल पाते हैं। अगर वह चाहे तो समय निकाल सकते हैं, लेकिन थियेटर में इतने पैसे तो मिलते नहीं हैं, तो नियमित रूप से थियेटर में कैसे काम कर सकते हैं ?
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नादिरा बब्बर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने ऐश्वर्या राय बच्चन की फिल्म फिल्म 'ब्राइड एंड प्रेजुडिस' में उनकी मां का किरदार निभाया, उनके साथ का पहला शॉट कौन सा था, और, उस दिन आपने ऐश्वर्या को क्या नई टिप एक्टिंग को लेकर दी?
मुझे तो बिल्कुल ही याद नहीं है कि पहला शॉट कौन सा था। मैंने ऐश्वर्या राय को एक्टिंग की कोई टिप्स नहीं दी। मुझे अच्छा भी नहीं लगा कि मुझे कुछ एक्टिंग टिप्स देनी चाहिए। रंगमंच की अलग बात है, लेकिन फिल्मों में मैं किसी की भी एक्टिंग की टिप्स नहीं देती हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना मेरे लिए सही नहीं रहेगा।
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नादिरा बब्बर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बाकी फिल्मों में अपने अभिनय का किस तरह आकलन करती हैं और इन दिनों ओटीटी के दौर में तो आपके पास इनमें अभिनय के खूब प्रस्ताव आते होंगे?
फिल्मों में काम करने के लिए कभी गंभीरता से मैंने सोचा ही नहीं। अपने रंगमंच की ही दुनिया में बहुत खुश हूं। रही बात, आज के ओटीटी के दौर की तो मुझे बड़ी हैरानी होती है कि ओटीटी के लिए कोई भी प्रस्ताव मेरे पास नहीं आते हैं। शायद लोग डरते हैं कि मना न कर दे।
इप्टा जैसी संस्थाओं ने रंगमंच को छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंचाया। आपकी संस्था का ऐसा कोई प्रयास जो मिशन में तब्दील होना चाह रहा हो?
नहीं, बिल्कुल नहीं। हम जहां काम कर रहे हैं, वहीं बहुत खुश हैं। बाकी जब बाहर जाने का मौका मिलता है तो बाहर भी जाते हैं। जहां तक इप्टा की बात है तो इप्टा ने बहुत ही काम किया है। इप्टा की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। इप्टा ने बहुत ही अच्छा काम किया है।