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Vaibhav Raj Gupta Interview: एक बेटा एक्टर है, दूसरा डायरेक्टर है, घर वाले परेशान हैं कि दोनों फ्रीलांसर हैं..

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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला
कोई सात साल पहले बड़े परदे पर फिल्म 'आश्चर्यचकित' में नजर आए वैभव राज गुप्ता की वेब सीरीज ‘गुल्लक’ हिट होने के बाद फिर से बड़े परदे पर मांग बढ़ रही है वेब सीरीज 'स्ट्रगलर्स' से ही उनकी एक्टिंग की बोहनी हुई थी और उत्तर प्रदेश में हरदोई जिले के बेनीगंज में कभी गायों की सेवा करते रहे वैभव का वैभव इन दिनों हर तरफ नजर आ रहा है। बेनीगंज में सातवीं तक की पढ़ाई करने वाले वैभव का पूरा परिवार इसके बाद सीतापुर आकर बसा। सीतापुर में ही वह मिस्टर सीतापुर बने और अब उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट बनी है वेब सीरीज ‘गुल्लक’। वैभव से एक खास बातचीत...
Gullak S4 Review: बच्चों के बीच बड़े होते माता-पिता की दिल छू लेने वाली कहानी, लौट आई ‘गुल्लक’ की असली खनक
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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वैभव, वेब सीरीज ‘गुल्लक’ का आपके करियर में कितना बड़ा योगदान रहा है?
बहुत। मतलब ये मेरे करियर का टर्निंग प्वाइंट रहा है। मैं लकी रहा हूं इस मामले में। लेकिन, उसके पीछे बहुत हार्ड वर्क रहा है। बहुत सालों की मेहनत रही है। ‘गुल्लक’ से पहले जो भी मैं कर रहा था। बहुत सोच कर रहा था। डर भी था कि ये नहीं चला तो? लेकिन, जिद ये भी थी कि हम वही करेंगे जिसमें किरदार थोड़ा मुश्किल हो। जिसमें लगे कि हां भीतर से खुशी मिल रही है और थोड़ा चुनौती भरा लग रहा है किरदार।
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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेकिन, बताते हैं कि ‘गुल्लक’ के पहले सीजन का जब प्रस्ताव आया तो आप बहुत उत्साहित नहीं थे?
हां, ‘गुल्लक वन’ जब आया तो पहले मैं नही कर रहा था। लेकिन, इसके बाद धीरे धीरे ऑडिशन तक बात पहुंची। फिर मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी। फिर मुझे ये बहुत अच्छा लगने लगा। मुझे लगा कि जहां से मैं आया हूं, अब मेरे पास एक मौका है, उसे दुनिया को दिखाने का। एक अभिनेता के तौर पर मेरा ये सपना था कि कभी मुझे कोई ऐसा किरदार मिलेगा जिसमें मैं जहां से मैं आया हूं, सीतापुर का अपना सारा अनुभव डालूंगा।

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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मतलब कि जीवन में अगर जो कुछ सामने हो रहा है, उसे समझते रहा जाए तो उसका भी लाभ मिलता ही है?
हां, इसमें जब मौका मिला मुझे अपने शहर की गलियों को परदे पर जीने को और जैसे ही मैंने ‘गुल्लक वन’ की स्क्रिप्ट फिर से पढ़ी और उसमें जिस तरह से अन्नू के किरदार का चरित्र चित्रण एक अर्धवृत्त बनाता जाता है, मुझे लगा कि अगर ये मैंने कर लिया तो मैं फिर अन्नू मिश्रा को जीने से मुझे कोई रोक नहीं सकता। तब मुझे नहीं पता था कि इसका दूसरा सीजन बनेगा भी। मुझे तो ये था कि अगर ये बन गया तो मुझे पीछे देखने का मौका नहीं मिलेगा, लोगों तक पहुंचेगा ये।
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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, वही हुआ। बेनीगंज से सीतापुर तक का बहुत कुछ इस किरदार में आपने अपने निजी अनुभव से डाला है। कोई खास रिश्तेदार भी है जो अन्नू मिश्रा जैसा ही हो?
जब मैंने ‘गुल्लक’ का फर्स्ट सीजन किया था तो काफी कुछ पीछे जाना पड़ा था मुझे। अपने गांव, अपने लोगों के पास, जो छोटे छोटे संदर्भ एक कस्बाई जीवन शैली के उसमें डाले गए वे सारे मेरे जीवन में असल रूप में हो चुके हैं। अब भी मैं जब सीतापुर जाता हूं तो उनको बताता हूं कि मैंने आपका नाम, आपकी शैली, आपकी अदा यहां इस्तेमाल की है। मैंने ऐसे तो बहुत सारे अन्नू देखे हैं जीवन में लेकिन मेरे मामा का लड़का सोनू गुप्ता, वह इस किरदार के सबसे करीब है। उसकी शख्सीयत से मैंने बहुत कुछ चुराया है अन्नू मिश्रा को करने के लिए।
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परिवार के साथ वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए? 
मेरे दादा हरिप्रसाद गुप्ता पेंटर और होम्योपैथी के डॉक्टर थे। पिता नीरज गुप्ता सहारा इंडिया परिवार में नौकरी के साथ साथ प्रॉपर्टी डीलर का भी काम करते थे। मां क्षमा गुप्ता गृहणी और छोटा भाई अमृत राज गुप्ता निर्देशक है। 'गुल्लक' सीजन वन का निर्देशन उसने ही किया। पैसे कमाने के लिए मैं सीतापुर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करता था। सीतापुर महोत्सव में साल 2007 में मैं मिस्टर सीतापुर चुन लिया गया। सहारा इंडिया के काम के लिए पिताजी का मुंबई आना जाना लगा रहता था, बस मैं यहां स्नातक की पढ़ाई करने आ गया। साथ ही नाटक करने लगा। और, फिर एक दिन छोटे भाई ने ही मुझे ‘गुल्लक’ वन में मौका दे दिया।
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वैभव राज गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुंबई आने से पहले छोटे शहरों के युवाओं को किस बात का ख्याल रखना चाहिए? क्या तैयारी करके आने से सफलता मिलना आसान होगा?
तैयारी का क्या होगा, मैं नहीं बता सकता। सफलता पाओगे या नहीं पाओगे, ये भी नहीं बता सकता। मैं ये बता सकता हूं कि अगर इस कला से प्रेम है तो ही आओ। हीरो बनना क्या होता है, मुझे नहीं पता। मुझे सिर्फ इतना पता है कि अगर अभिनय से प्यार है तो आप लंबा खींच सकते हो। अगर प्यार नहीं है तो फिर आप छह महीने में थक जाओगे। मुंबई में लोग बहुत जल्दी धैर्य खो देते हैं। ये दो साल वाला टारगेट लेकर मुंबई कभी मत आओ। यहां बस आ जाओ। खुद पर भरोसा बनाए रखो, और फिर देखो क्या होता है?
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गुल्लक 4 - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘गुल्लक’ के अमन की तरह असल जीवन में भी छोटे भाई को ‘धोने’ का मन करता है कभी?
हां, लेकिन वह इतना छोटा नहीं है कि उसकी धुलाई कर पाऊं। बस साल भर छोटा है वह मुझसे। ‘गुल्लक’ वन उसी ने डायरेक्ट की थी तो बस कभी कभी बतकही हो जाती है। पहले मैं मुंबई आया था फिर उसको लेकर आ गया इधर। तब से हम साथ ही हैं। साथ ही रहते हैं। एक डायरेक्टर है, एक एक्टर है। और, घरवाले परेशान हैं कि दोनों फ्रीलांसर हैं। हालांकि, घर वालों ने हमारा बहुत साथ दिया। बस पापा कभी कभी मुझे बोलते रहते थे क्योंकि मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था। मैं मुंबई आया था अपनी ग्रेजुएशन करने, मुझे नहीं पता था कि मुझे एक एक्टर बनना है। मैं इस शहर में बस अपना जीवन खोजने आया था। मुझे कभी इस बात का एहसास भी नहीं था कि मैं एक ऐसी विधा में जाऊंगा जिससे मुझे प्यार हो जाएगा।
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