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Tiger Nageswara Rao: सबसे बदनाम चोर की असली कहानी, चुनौती जीतने के लिए जिसने चुराया इंदिरा गांधी का ये सामान

Fri, 06 Oct 2023 06:04 PM IST
साक्षी पांडेय अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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रवि तेजा और टाइगर नागेश्वर राव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

‘अभी तक वह नागेश्वर राव था, अब वह टाइगर बन गया है!’ तेलुगु में बनी फिल्म ‘टाइगर नागेश्वर राव’ के हिंदी ट्रेलर का ये संवाद ही इस फिल्म का असल लब्बोलुआब है। उत्तर भारत में तो लोगों को ज्यादा नहीं पता लेकिन दक्षिण में नागेश्वर राव का नाम बच्चा बच्चा जानता है, कुछ कुछ वैसे ही जैसे कभी चंबल के डकैतों के नाम कुख्यात थे। टाइगर नागेश्वर राव अपने समय की एक किंवदंती रहा है। एक ऐसा शातिर चोर जिसने जब चाहा, जैसे चाहा और जहां चाहा, अपने हिसाब से बड़ी बड़ी चोरियां की और जब भी पुलिस की पकड़ में आया। किसी न किसी बहाने भाग निकला। उसे अपने चोरी के इस हुनर पर इतना गुमान था कि इसे साबित करने के लिए उसने प्रधानमंत्री की एक निजी वस्तु तक की चोरी कर डाली।

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टाइगर नागेश्वर राव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

टाइगर नागेश्वर राव आंध्र प्रदेश की बस्ती स्टुअर्टपुरम का नामी चोर रहा है। उसके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज थे। टाइगर की परवरिश स्टूअर्टपुरम में हुई जिसे चोरों का गांव कहा जाता है। कहते हैं कि साल 1911 और 1914 के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह के अपराधों को अंजाम देने वाले चोरों-डकैतों को एक साथ रखने की योजना बनाई गई। और, उस  जगह का नाम स्टुअर्ट पुरम रखा गया। साल 1913 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के सदस्य हेरोल्ड स्टुअर्ट के नाम पर इस गांव स्टुअर्टपुरम की स्थापना हुई। सरकार का मकसद था कि चोरों और डकैतों को एक जगह रखकर उन पर नजर रखना आसान होगा।

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स्टुअर्टपुरम के लोग नागेश्वर राव की कहानी सुना रहे हैं - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इसी गांव में  नागेश्वर राव का जन्म हुआ था। बचपन में ही अनाथ हो गए नागेश्वर को मुसीबतों ने पाला। स्कूल बीच में ही छोड़ पेट भरने के लिए वह मजदूर बना और जल्द ही अपराध की ओर मुड़ गया। साल 1973 में नागेश्वर राव ने अपनी पहली चोरी  एक बैंक में की। वह इस चोरी में सफल रहा। नागेश्वर राव ने इसके बाद तमाम छोटी-मोटी चोरियां शुरू कीं और धीरे-धीरे  उसके मन से पुलिस का डर जाता रहा। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक  जैसे राज्यों में बड़ी चोरियां करने के बावजूद वह पुलिस की पकड़ दूर रहा। यही वजह थी कि अपराध जगत के लोग उसे टाइगर कहकर बुलाने लगे। वह जो भी चुराता था, उसका बड़ा हिस्सा गरीबों में बांट देता था।

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टाइगर नागेश्वर राव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
साल 1974 में आंध्र प्रदेश के नांदयाल जिले के बंगानपल्ली में पुलिस थाने के सामने बने एक बैंक में बड़ी चोरी हुई, यह खबर पूरे देश में सुर्खियां बनी।  35 लाख रूपये की हुई इस चोरी को नागेश्वर ने आधी रात को अंजाम दिया। उसका सामना कई बार पुलिस से हुआ, पर हर बार बच कर निकल जाता था। साल 1976 में टाइगर नागेश्वर राव को तमिलनाडु में गिरफ्तार करके  अलग-अलग जेलों में रखा गया। लेकिन एक पेशी के दौरान  जेल के अधिकारियों पर हमला करके वह  फरार हो गया।

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टाइगर नागेश्वर राव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
1980 के दशक में टाइगर नागेश्वर राव एक कुख्यात चोर  के तौर पर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में सक्रिय था। उस पर 100 से अधिक संगीन मुकदमे दर्ज है। अपनी चालाकी के लिए कुख्यात नागेश्वर को साल 1984 में दोबारा  पकड़ लिया गया और जेल में डाल दिया गया। दो साल तक जेल में रहने के बाद साल 1986 में वह जेल से फरार होने में कामयाब रहा। लेकिन साल 1987 में आखिरकार एक पुलिस मुठभेड़ के दौरान वह मारा गया। कहते हैं कि सिर्फ अपनी चोरी की खासियत दिखाने के लिए उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रूमाल भी चुराया था। 20 अक्तूबर को रिलीज हो रही फिल्म ‘टाइगर नागेश्वर राव’ इसी शातिर चोर की कहानी से प्रेरित है।

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