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Rohit Jugraj Interview: आंखों में थकान, जेब में टूथब्रश और सामने राम गोपाल वर्मा, जानिए, फिर क्या हुआ...

Mon, 11 Dec 2023 06:11 PM IST
ज्योति राघव अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला
सोनी लिव की वेब सीरीज 'चमक' पंजाब की म्यूजिक इंडस्ट्री के अपराध पर आधरित है। इस सीरीज की कहानी पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसे वाला और अमर सिंह चमकीला की हत्या कांड से प्रेरित बताई जा रही है, हालांकि सीरीज के निर्देशक रोहित जुगराज का कहना है कि उनकी सीरीज की कहानी का सिद्धू मूसेवाला और अमर सिंह चमकीला की हत्याकांड से कुछ भी लेना देना नहीं है। रोहित जुगराज से अमर उजाला की एक खास बातचीत

Chamak Web Series Review: रोहित जुगराज का शानदार ओटीटी अवतार, पंजाबी संगीत की सियासत में चमके एक से एक कलाकार
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चमक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वेब सीरीज 'चमक' देखकर लगता है कि यह सीरीज पंजाब के कुछ बेहद लोकप्रिय गायकों की हत्याओं से प्रेरित है? 
जैसा इस सीरीज का नाम 'चमक' है वैसे ही इस  सीरीज की एक चमकती हुई दुनिया की कहानी है। सीरीज के हीरो का स्टेज नाम काला है। इस सीरीज की कहानी चमक के पीछे अंधेरे की है। इस कांसेप्ट से ही सीरीज की पूरी कहानी स्पष्ट हो जाती है। यह दुनिया पंजाबी म्यूजिक वर्ल्ड की है। अभी हाल फिलहाल पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री में जो हो रहा है। वही इस सीरीज की कहानी है। अभी पिछले साल सिद्धू मूसेवाला के साथ जो हुआ। उससे पहले  1988 में अमर सिंह चमकीला के साथ हुआ। इस सीरीज में काल्पनिक पात्रों के जरिए पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री की सच्चाई कहीं जा रही है। किसी एक व्यक्ति की हत्याकांड से प्रेरित नहीं है। 
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चमक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री  इस तरह की घटना के पीछे की वजह क्या मानते हैं आप ?
देखिए, अपराध वहीं होता है जहां पर पैसा होता है। एक बड़ी प्रसिद्ध पुरानी कहावत है जर, जोरू, जमीन, यही तीन कारण अपराध के होते हैं। पंजाब में लोगों के पास बहुत जमीन है। जमीन का एक छोटा सा हिस्सा बेचकर अल्बम निकाल दिया क्योंकि वहां हर एक को गाने का शौक है। पंजाब में ढाबे पर बैठने वाला लड़का भी गा रहा है। पंजाब में पॉलिटिशियन, क्रिकेटर के अलावा बाकी सब सिंगर है। संगीत की इतनी कदर है, यह बहुत अच्छी बात है।  लेकिन इसके पीछे नकारात्मक बातें भी बहुत हैं। वह है आपसी जलन और ईर्ष्या। कलाकार को जब कामयाबी मिलती है तो उसकी सहनशीलता कम हो जाती है। 

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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पंजाबी इंडस्ट्री में काम करने से पहले आपने मुंबई में भी खूब काम किया, शुरुआत कैसी रही आपकी?
मैं मुंबई साल 2003 में पहुंचा और संजय लीला भंसाली को फिल्म 'देवदास' और 'ब्लैक' में असिस्ट किया। राम गोपाल वर्मा के गाड़ी के पीछे भागा। उनको अपनी शॉर्ट फिल्म देखने के लिए दी। उन्होंने कहा कि शॉर्ट फिल्म देखने का समय तो नहीं है। लेकिन जिस गति से तुम भागे थे, तुमको असिस्टेंट रख लूंगा। फिर मैंने राम गोपाल वर्मा को  'भूत' और 'सरकार' में असिस्ट किया।
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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संजय लीला भंसाली से कैसे मुलाकात हुई?
यह बहुत ही दिलचस्प घटना है।  मैं दिल्ली से बैग उठाकर आ गया था और मेरे मन में था कि बिना कुछ किए वापस तो जाना नहीं है।  जो कुछ करना है मुंबई में ही करना है। मैं भंसाली सर को ईमेल करता था और मुझे पता नहीं था कि ईमेल का जवाब वह नहीं बल्कि कोई और दे रहा है।  जब मैं संजय लीला भंसाली के ऑफिस में गया तो सिकंदर खेर ने दरवाजा खोला। उनको मैंने अपना नाम बताया और ईमेल का प्रिंट आउट दिखाया। उन्होंने प्रिंट आउट ले लिया और बोले कि जाओ। 
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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर..
दरअसल, मेल का जवाब  संजय लीला भंसाली के असिस्टेंट सिकंदर खेर, अंबर और अप्पू दे रहे थे। उनको लगा कि संजय सर को पता चला तो वह सबकी ऐसी तैसी कर देंगे। वह सब मुझे भगा रहे थे। मैं बैग लेकर वहीं खड़ा रहा और सुबह से रात हो गई। उनको लगा कि मैं तो वहीं सो जाऊंगा। फिर उन्होंने मुझे एक गलत पते पर भेज दिया कि भंसाली सर वहां मिलेंगे। मुझे लग गया था कि उन्होंने गलत पता दिया है, लेकिन भंसाली सर का पता ढूंढना इतना भी मुश्किल नहीं था। मैं भंसाली सर के घर पहुंच गया। भंसाली सर मिले उनको सारी बात बताई और अगले दिन ऑफिस बुलाया। ऑफिस गया तो उनके सारे असिस्टेंट मुर्गे बने पड़े थे। यहां से संजय लीला भंसाली सर के कैंप में एंट्री हो गई।
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निर्देशक रोहित जुगराज 'चमक' की टीम के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राम गोपाल वर्मा के गाड़ी के पीछे भागने का क्या किस्सा है?
दिल्ली से  मुंबई के लिए निकला तो मेरे दिमाग में सिर्फ तीन निर्देशक संजय लीला भंसाली, राम गोपाल वर्मा और मणि रत्नम सर थे। भंसाली सर और रामू सर को तो असिस्ट कर चुका था, लेकिन मणि सर के साथ काम करने का मौका नहीं मिला। रामू सर के बारे में एक बात बहुत प्रसिद्ध थी कि वह लोगों को मौका देते हैं।  उनको असिस्ट  करना बहुत जरूरी था। वह एक दिन वह संजय लीला भंसाली सर के सेट पर पाए उस समय 'देवदास' की शूटिंग चल रही थी। वहां सिकंदर खेर ने मेरी मदद की, उन्होंने बताया कि सामने राम गोपाल वर्मा की गाड़ी है।  मैने पूछा कि इस बार सही बोल रहे हो ना। वह बहुत जोर से हंसे।  रामू सर फिल्म सिटी से बाहर निकल रहे थे मैं उनकी गाड़ी की तरफ भागा। उन्होंने गाड़ी रोकी, उनकी मैने अपनी शॉर्ट फिल्म की कॉपी देते हुए कहा कि अगर आपको मेरे अंदर कुछ भी प्रतिभा नजर आए तो अपना असिस्टेंट रख लीजिए। उन्होंने कहा कि आठ महीने के बाद मुझसे संपर्क करना और अपने ड्राइवर का मोबाइल नंबर नोट करवा दिया। मैं तो बस यही कहना चाहूंगा कि जहां चाह वहां राह।

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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और फिर, राम गोपाल वर्मा  की फिल्म 'जेम्स' से आपके निर्देशन करियर की शुरुआत हुई..
रामू सर को मेरी मेहनत और लगन बहुत अच्छी लगी। उन्होंने मेरी मेहनत और लगन देख कर 'जेम्स' निर्देशित करने की जिम्मेदारी दी। एक दिन की बात है,वह  सुबह -सुबह वह ऑफिस आ गए, मैंने दरवाजा खोला। उस समय करीब सुबह के सात बज रहे थे। मैं एडिट करते हुए थक कर वहीं पर सो गया था। और, जब दरवाजा खोलने गया तो मेरी जेब में टूथ ब्रश था। उन्होंने मुझे देखा और टूथब्रश पर हाथ फेर कर आगे बढ़ गए, कुछ नहीं बोले। उसी दिन शाम को उन्होंने मुझे फिल्म दे दी। मैंने तब तक तीन साल उनके साथ बिता चुका था।

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चमक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पंजाबी इंडस्ट्री की तरफ कैसे बढ़ना हुआ?
मैंने  अनुभव किया जो कहानियां मैं कहना चाहता हूं उसका स्कोप पंजाब की इंडस्ट्री में ज्यादा है। यहां पर सलमान खान और रणबीर कपूर के साथ काम करने का मौका तो नहीं मिलेगा, वहां पर दिलजीत दोसांझ, गिप्पी ग्रेवाल उनते ही भूखे थे जितना मैं था। मैने उनको वह कहानियां सुनाई और उनको वह बात समझ में आ गई। मैंने गिप्पी ग्रेवाल के साथ 'जट्ट जेम्स बॉन्ड' दिलजीत दोसांझ के साथ 'सरदार जी' और 'सरदार जी 2' बनाई। बाद में दिलजीत दोसांझ, कृति सेनन और वरुण शर्मा के साथ हिंदी फिल्म 'अर्जुन पटियाला' बनाई है। अब पहली बार वेब सीरीज 'चमक' बनाई है।   
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निर्देशक रोहित जुगराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पंजाबी फिल्में बड़ी भव्य स्तर पर बन रही हैं, बिजनेस भी अच्छा हो रहा है। लेकिन मुख्यधारा की सिनेमा से नहीं जुड़ पा रही हैं।  इसकी क्या वजह आप मानते  हैं ?
मुझे लगता है कि पंजाबी सिनेमा को कॉमेडी से आगे निकलना चाहिए। वहां की फिल्में हिट हो रही हैं, यह अच्छी बात है। लेकिन सिर्फ कॉमेडी फिल्में ही बनती रहेंगी तो बाकी दर्शक उन फिल्मों से खुद को जुड़ा महसूस नहीं करेंगे।  जैसे साउथ की एक बहुत खूबसूरत फिल्म 'सीता रामम' रिलीज हुई थी। इस फिल्म को सभी ने खूब पसंद किया। उन्होंने ऐसी फिल्म बनाने की हिम्मत की। पहले मराठी में एक तरह की फिल्में बन रही थी अब वहां भी अलग अलग फिल्में बन रही हैं। गुजराती सिनेमा में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। अब पंजाब में भी अब अलग फिल्में बननी शुरू हुई हैं। उम्मीद करता हूं कि पंजाबी सिनेमा अब और आगे जाएगा।
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