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EXCLUSIVE: 47 साल चलेगा अभिनय करियर कभी सोचा न था, जया की डिप्लोमा फिल्म देख बनी अभिनेत्री: शबाना

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फिल्म 'ये नजदीकियां' की शूटिंग और शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
शबाना आजमी को निर्देशक सत्यजीत रे से अपने दौर की सबसे नाटकीय अभिनेत्री का तमगा हासिल है। अभिनय की दुनिया में आने की भी उनकी दिलचस्प कहानी है। उन्हें खुशी है कि अब सिनेमा के हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और इसका असर आने वाले दिनों में इसकी कहानियों पर भी जरूर पड़ेगा। अपनी नई वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ के अलावा शबाना अपनी अंग्रेजी फिल्म ‘‘व्हाट्स लव गॉट टू डू विद इट?’ में एमा टॉमसन के साथ काम करने को लेकर भी खासी उत्साहित हैं। स्टीवन स्पीलबर्ग की सीरीज ‘हेलो’ का जिक्र भी उन्होंने इस दौरान किया। शबाना ने अपने 47 साल के अभिनय सफर के तमाम किस्से और कहानियां सुनाईं हैं ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल को इस एक्सक्लूसिव बातचीत में।
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द एम्पायर में शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
जब भी कोई नया निर्देशक कुछ नया बनाने का हौसला लेकर आता है तो उसकी पहली नज़र शबाना आजमी पर ही जाती है। फिर चाहे वह महेश भट्ट हों, सुधीर मिश्रा हों या फिर विनय शुक्ला से लेकर टेरी समुंद्रा और अब मिताक्षरा कुमार। नए निर्देशकों के प्रस्तावों में आप ऐसा क्या तलाशती हैं जो आपको हां कहने के लिए प्रेरित करता है?

मुझे लगता है उनका जो अपने काम को लेकर जो जुनून होता है वह मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। नए लोग जब शूटिंग करने आते हैं तो ऐसा लगता है कि अगर उनको वही शॉट जो उन्होंने अपने दिमाग में सोचा है, नहीं मिला तो उनकी दुनिया ही बदल जाएगी। हम ठहरे घाघ लोग लेकिन हमको ऐसे हालात में में उन पर थोड़ा सा प्यार भी आता है और थोड़ी सी हंसी भी। वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ की निर्देशक मिताक्षरा के साथ तो मुझे बहत ही मजा आया। उनको जो चीज चाहिए भले ही वह फिर दृश्य की पृष्ठभूमि में ही क्यों न हो, वह न मिले तो वह बेहाल हो जाती थीं। डिजिटल दौर आने से भी निर्देशक बहुत कुछ शूट कर लेना चाहता है। इसमें कई बार उनका लालच भी बढ़ जाता है लेकिन मेरा मानना है कि अगर कोई नया माध्यम मिला है तो उसका फायदा उठाने में बुराई नहीं है।
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द एम्पायर में शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
इतिहास में बहुत कम महिलाएं ऐसी हुई हैं जिनको ‘किंगमेकर’ कहा जा सके तो एसान दौलत का किरदार करने से पहले आपके जेहन में भी ‘मुगल ए आजम’ जैसी तमाम फिल्में तो जरूर घूमी होंगी?

आमतौर पर यही होता है क्योंकि हमारे पास संदर्भ बहुत कम होतें हैं। आमतौर पर हम यही करते हैं कि पहले जो फिल्में हमने देखी होती हैं उन्हीं के हिसाब से हम एक खाका बना लेते हैं। एक ऐतिहासिक किरदार करने की मेरी बहुत ख्वाहिश थी और खासतौर से इसलिए कि उसको कुछ दूसरे ढंग से कैसे पेश किया जाए ताकि वह ऐसा न लगे कि ‘मुगल ए आजम’ के डॉयलॉग बोले जा रहे हैं। मैंने एक फिल्म देखी थी शेखर कपूर की ‘एलिजाबेथ’। उसमें मैंने ये देखा था जो अभिनेत्री केट ब्लांशेट हैं, वह जब निजी जीवन में होती हैं तो अलग और जब सार्वजनिक जीवन में होती हैं तो उनकी संवाद अदायगी का लहजा अलग होता है। ‘द एम्पायर’ में का आधार एक किताब है। किताब में एसान दौलत को किंगमेकर तो बताया गया लेकिन उसकी पृष्ठभूमि का विस्तार उसमें नहीं है तो हमें बहुत सारा काम कल्पनाओं के सहारे करना पड़ा।

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द एम्पायर में शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
मैंने देखा है कि अपने किरदारों के प्रस्तुतीकरण में आप काफी शोध करती हैं और संवाद अदायगी के अलावा वेशभूषा से लेकर और भी तमाम प्रयोग करती हैं, इस बार अलग क्या किया आपने?

एसान दौलत के किरदार के लिए मैंने अपनी भौहें आधी कर दी हैं। ‘काली खुही’ में मैंने भोहें मिला दी थीं, इसमें आधी कर दी हैं। मेरा ये मानना है कि भाव प्रकटन में भौहों का बहुत बड़ा काम होता है। आधी भौंह जो है उससे भी बहुत कुछ उसका प्रभाव बदल देता है।
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द एम्पायर की प्रेस कांफ्रेंस के दौरान शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
सिनेमा में 47 साल हो चुके हैं आपको। कई महिला निर्देशकों के साथ आपने काम किया। अब कथानक कहने में महिला निर्देशकों की भागीदारी क्या कम होती दिख रही है?

नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। जोया अख्तर आज के दौर की कामयाब निर्देशक हैं। वह जिस किसी कलाकार के साथ काम करना चाहें तो कोई मना नहीं करेगा। मिताक्षरा के बारे में भी मेरा मानना है कि खूब कामयाब निर्देशक बनेंगी। पहले ये सोचा जाता था कि एक महिला निर्देशक सिर्फ औरतों के ही विषयों पर ही फिल्म बनाएंगी या ऐसे विषय चुनेगी जिनके विषय संकुचित हैं या जिनका कैनवस बड़ा नहीं है। लेकिन, अब ये बदल रहा है। ओटीटी से एक बात जो निकलकर आई है कि स्टार वार सब अपनी जगह पर है लेकिन कंटेट इज किंग। कंटेंट अच्छा होगा तो लोग देखेंगे। दूसरी बात ये भी है कि फिल्ममेकिंग के हर विभाग में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है। प्रोडक्शन में तो और भी बहुत ज्यादा लड़कियां काम कर रही हैं। मैं समझती हूं कि ये एक अच्छी स्वस्थ बदलाव है और इसकी वजह से कंटेंट में भी फर्क आएगा।
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शबाना आजमी की मां शौकत आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
‘द एम्पायर’ देखते समय मुझे सत्यजीत रे का एक कथन भी याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि शबाना आजमी इस दौर की बेहतरीन नाटकीय अभिनेत्री हैं। नाटकीय अभिनेत्री की आपकी परिभाषा क्या है?

देखिए मेरी मां (शौकत आजमी) भी सबसे ज्यादा ड्रामैटिक एक्ट्रेस मानी जाती थीं और नाटक बिना भावुकता के नहीं हो सकता है। क्या आपके भीतर वह कूवत है कि परिस्थिति कोई भी हो, आप उसको पूरी तरह महसूस करें। मतलब जब आपको गुस्सा आए तो सचमुच गुस्सा आए, जब आपको प्यार आए तो वाकई प्यार आए। आप सिर्फ ऊपरी तौर पर उसको नहीं करें। अगर आप ऊपरी तौर पर कुछ भी करेंगे तो उसमें सच्चाई नहीं दिखेगी फिर चाहे उसे लिखा कितनी ही खूबसूरती से क्यों न गया हो। कैमरा नकलीपन पकड़ लेता है। मेरी मम्मी हमेशा कहती थीं कि अगर आपके अंदर की मशीन नहीं चल रही हो तो आप हमेशा पकड़े जाएंगे। ये फर्क होता है एक अच्छे एक्टर का। ऐसा नहीं है कि जो लोग अंदर से महसूस नहीं करते वे कामयाब नहीं हो सकते। वे कामयाब होते हैं लेकिन उनकी कामयाबी दूसरी तरह की होती है। लेकिन जब आप महसूस करते हैं तो आप उसमें, हमे जो पढ़ाया गया था, वह ट्रूथ ऑफ द मोमेंट ला सकते हैं।
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स्पर्श, अर्थ फिल्म का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला मुंबई
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने की आपने हैट्रिक लगाई है 80 के दशक में। मैं थोड़ा और पीछे जाकर पूछना चाहता हूं कि आपने 1974 में जब अभिनय की शुरुआत की तो कभी सोचा था कि ये अभिनय करियर 50 साल तक चलता रहेगा?

नहीं, मुझे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था। मुझे लगता है कि ये इसलिए ऐसा हो पाया कि जब मैं ‘अमर अकबर एंथनी’ और ‘परवरिश’ जैसी मुख्यधारा की बहुत कामयाब फिल्में कर रही थी तो उन दिनों ‘अर्थ’ या ‘मासूम’ या ‘स्पर्श’ जैसी जो फिल्में कामयाब हुई उन्होंने मुझे अपनी एक परछाई थी, अपनी एक इमेज दी। ये इमेज ऐसे किरदारों की थी जिनमें वे औरते सिर्फ अपनी खूबसूरती की वजह से हीरो के पीछे नहीं भागती थीं या पेड़ों के चक्कर लगाती थीं। उनका एक किरदार था। इसमें फायदा ये होता है कि जब आप किरदार कर रहे होते हैं तो भले आप उस समय युवा हों लेकिन आगे चलकर संक्रांति में जाना ज्यादा आसान हो जाता है। ऐसा न हो तो आपका जो आकर्षण है वह सिर्फ आपकी शक्ल और आपकी जिस्म पर बना रहेगा। और जब वह जाने लगेगा, जोकि जाना ही है उम्र के साथ. तो आपका दायरा संकुचित हो जाएगा।

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फिल्म 'ये नजदीकियां' की शूटिंग के दौरान निर्देशक विनोद पांडे से दृश्य समझते शबाना आजमी, मार्क जुबैर और नीना गुप्ता - फोटो : अमर उजाला मुंबई
और, परदे पर जब शबाना आजमी को शबाना आजमी का ही अभिनय करना हो, जैसे फिल्म ‘खामोश’ में था तो तब आप क्या करती हैं?

ऐसा मुझे मालूम नहीं कि मुझे खुद को ही परदे पर निभाना हो तो मैं कैसे करूं। लेकिन, मेरा ऐसा ख्याल है कि अपर्णा सेन की जो फिल्म मैंने की थी ‘15 पार्क एवेन्यू’ उसमें जो किरदार था वह सबसे ज्यादा मेरी निजी जिंदगी से मिलता जुलता है। उसमें एक अलग सी बात होती है। नहीं तो आपको किरदार को बनाना पड़ता है, सोचना पड़ता है कि इसकी जिंदगी किस तरह की होगी, इसकी पृष्ठभूमि किस तरह की होगी। जब आपको पता हो कि किरदार आपसे बहुत मिलता जुलता है तो वह प्रक्रिया ही बिल्कुल अलग हो जाती है।

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शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
करण जौहर की फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ आप कर रही हैं उसमें जया बच्चन और धर्मेंद्र भी हैं, अपने दौर के कलाकारो के साथ जब काम करती हैं तो किस तरह की बातें होती हैं?

फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ की मेरे हिस्से की शूटिंग 15 सितंबर से शुरू होने वाली है। लेकिन ये बात जरूर है कि पिछले दिनों जो भी काम मैंने किया है वह हमारी पीढ़ी के लोगों के साथ नहीं किया। शेखर कपूर की फिल्म ‘व्हाट्स लव गॉट टू डू विद इट?’ में मुझे हाल ही में एमा टॉमसन के साथ काम करने का मौका मिला। एमा को मैं बहुत बहुत पसंद करती रही हूं। मेरी उन पर श्रद्धा भी खूब रही है। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उनके साथ काम करूंगी या जो मैंने अभी जो स्टीवन स्पीलबर्ग की ओटीटी सीरीज ‘हेलो’ में काम किया तो ये अलग तरह के लोग थे। अब मैं ये देखूंगी कि जब फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ की शूटिंग शुरू होती है तो कैसा महसूस होगा!

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सई परांजपे की न बन सकी फिल्म 'बिच्छू' में धर्मेंद्र के साथ शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला मुंबई
धर्मेंद्र के साथ तो आपने पहले भी काम किया है।

धरम जी से हमारा रिश्ता वैसे भी बहुत अच्छा है। मैं आपको एक प्यारी स्वीट कहानी बताती हूं धरम जी के बारे में। इतना मुझे उन पर प्यार आता है। दरअसल वह अब्बा को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। मैंने उनके साथ फिल्म ‘मर्दों वाली बात’ में काम किया। फिर सई परांजपे की एक फिल्म ‘बिच्छू’ में हम साथ काम कर रहे थे जो बनते बनते रह गई। एक दिन उनका फोन आया, मुझे वह कहने लगे कि मेरी एक नातिन है वह पढ़ती है इंग्लैंड में और आपका इंटरव्यू करना चाहती है। तो मैंने कहा, धरमजी सिर आंखों पर। मुझे इतनी हैरत हुई कि धरमजी उसको लेकर खुद आए तो वह उस वक्त एक स्टार या धर्मेंद्र नहीं थे वे बस एक नाना थे। मझे उनकी ये बात इतनी प्यारी लगी। उनको क्या जरूरी थी कि वह उनको खुद लेकर आएं और फिर वह बाहर बैठकर जावेद के संग गप्पें हांक रहे हैं और मैं अंदर उसको इंटरव्यू देती रही। जया के साथ काम करने को लेकर मुझे बहुत उकसाहट हो रही है क्योंकि जया की वजह से ही तो मैंने फिल्म इंस्टीट्यूट ज्वाइन किया।

 

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बच्चन परिवार संग शबाना आजमी और जावेद अख्तर - फोटो : अमर उजाला मुंबई
अच्छा..?

हां, हुआ ये था कि मैं सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ रही थी और मैंने कुछ डिप्लोमा फिल्म्स देखी फिल्म इंस्टीट्यूट की और उसमें एक फिल्म देखी ‘सुमन’। तो उसमें जो मैंने काम देखा जया का तो मैं हैरतजदा हो गई क्योंकि उस तरह का प्राकृतिक अभिनय मैंने देखा ही नहीं था। और, तब मैंने तय किया कि मैं ज्वाइन करूंगी फिल्म इंस्टीट्यूट और अब मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिल रहा है तो मुझे उसकी बेहद खुशी है।
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जोया अख्तर, फरहान अख्तर संग शबाना आजमी और जावेद अख्तर - फोटो : अमर उजाला मुंबई
अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन को लेकर आपको कितनी पीड़ा हुई और कितना जरूरी है आने वाली पीढ़ी को समझाना कि मुखर रहना बहुत जरूरी है?

बहुत पीड़ा होती है। जब आप कैफी आजमी और शौकत आजमी के बच्चे हैं जिन्होंने सारी उम्र कला को एक माध्यम माना है सामाजिक बदलाव का तो ऐसे हालात के बारे में चिंतित होना या फिर वहां शरीया कानून लागू होने का विरोध करना बिल्कुल कुदरती है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है। हमारे बेटा या बेटी, जोया और फरहान, सामाजिक मामलों को लेकर बहुत संवेदनशील हैं और वह आवाज उठाने में बिल्कुल भी नहीं डरते हैं। फरहान ने औरतों के साथ होने वाली हिंसा के विरोध में संगठन भी बनाया है। मेरा ये मानना है कि जो माहौल बच्चों को मिलता है वैसी ही हमारे बच्चे हो जाते हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि युवा पीढ़ी को कोई चिंता ही नहीं है तो इसमें युवा पीढ़ी का कोई कसूर नहीं है। कसूर हमारा है क्योंकि हम उनका सही मार्गदर्शन नहीं कर पाए। हम उनको ठीक से बता नहीं पाए जब भी बदलाव आया है तो इसलिए आया है कि युवा पीढ़ी सामने आकर खड़ी हो गई।
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