शबाना आजमी को देखने से ज्यादा उनको सुनने में आनंद आता है। वह जब अभिनय नहीं कर रही होती हैं तो कलाकारी बतिया रही होती हैं। उनकी बातों में एक अलग तरह का रस है। अभिनेता उनकी बातों में नवरस ढूंढते हैं और श्रोताओं को उस रस की तलाश रहती है जिसका स्वाद लेने में अक्सर वो सिनेमाघर में चूक जाते हैं। उनके चेहरे पर एक अलग तरह की दृढ़ता दिखती है। परदे की मासूम शबाना जब समाजसेवी शबाना बनती है, तो अपने निर्देशकों को डरा देती है। और, खुद शबाना आजमी ये मानती हैं कि सामाजिक सरोकारों की पैरवी के दौरान उनकी इस सार्वजनिक सख्ती ने उनसे कई किरदार छीन भी लिए।