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Satyakam Anand Interview: ‘भक्षक’ के सोनू से सुनिए दोस्ती का गजब किस्सा, ‘शोले’ के जय और वीरू याद आ जाएंगे

Fri, 16 Feb 2024 12:10 PM IST
आकांक्षा गुप्ता अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सार

सत्यकाम इन दिनों फिर चर्चा में हैं अपनी फिल्म ‘भक्षक’ के किरदार सोनू को केलकर। सत्यकाम और नंबर वन कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा बरसों के साथी हैं।
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सत्यकाम आनंद - फोटो : अमर उजाला
‘बेटा, तुमसे ना हो पाएगा’ ये जुमला न जाने कितनी बार आम जीवन में इस्तेमाल होता है और न जाने कितने लोगों ने आपको भी इसी तीर से ताना मारा होगा। सोशल मीडिया पर मीम्स भी इसके खूब बने। ये संवाद है, निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का और इसे परदे पर अपनी अदाकारी से जीवंत किया जे पी सिंह के किरदार में अभिनेता सत्यकाम आनंद ने। सत्यकाम इन दिनों फिर चर्चा में हैं अपनी फिल्म ‘भक्षक’ के किरदार सोनू को केलकर। सत्यकाम और नंबर वन कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा बरसों के साथी हैं। दोनों की दोस्ती के बारे में कम लोग ही जाने हैं, लेकिन मुकेश का नाम लेते ही सत्यकाम अब भी भावुक हो जाते हैं, क्या है दोस्ती का ये जय-वीरू जैसा किस्सा, आइए जानते हैं..
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सत्यकाम आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपके अभिनय सफर की शुरुआत कैसे हुई और कहां से हुई?

मैं आरा, बिहार का रहने वाला हूं। मेरे पिता शिव कुमार सहाय अध्यापक हैं। 12वी में मेरे अंक कम आए, इसलिए कॉलेज में दाखिला नहीं मिल रहा था। पिताजी ने ही मुझे थियेटर करने का सुझाव दिया ताकि थियेटर कोटे से कॉलेज में दाखिला हो जाए। लेकिन, जो बात पिताजी ने मेरी पढ़ाई जारी करने के लिए बताई, वह मेरा जीवन बनने लगी तो पिताजी ने कहा, नाटक नौटंकी छोड़ो और पढ़ाई पर ध्यान दो और इंजीनियर बनो। लेकिन, मुझे तो थियेटर से प्यार हो चुका था।

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सत्यकाम आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

घरवालों को आपने किस तरह राजी किया?

हमारे घर में ऐसी गुंजाइश थी कि पिताजी से खुलकर बात कर सकते थे। उनका जवाब था कि जो मैं चाह रहा हूं, अगर वह करोगे तो पैसा दूंगा, अगर तुम्हें अपनी मर्जी से कुछ करना है तो तुम देखो कैसे क्या करना है। मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया लेकिन एक बच्चे से महीने के 15 रुपये मिलते थे। मुझे लगा ऐसे पैसे इकट्ठा नहीं हो पाएंगे। पिताजी जिनको ट्यूशन पढ़ाते थे, उन पर करीब 20 हजार रुपये का बकाया था पिताजी का। मैंने इधर फोकस किया। पिताजी के बकाये के 12 हजार रुपये अपनी अदाकारी के जरिये वसूल लाया। आधे पैसे उन्हें दिए, आधे मैंने रखे और 1997 में दिल्ली आ गया। अस्मिता थियेटर ग्रुप में शामिल हुआ और वहीं मुझे नाटक की विधिवत ट्रेनिंग मिली।

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सत्यकाम आनंद और संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर आगे..?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में दाखिले की कोशिश की, वहां चयन नहीं हुआ तो मन बहुत दुखी हुआ। एक दो बार तो आत्महत्या का भी ख्याल आया, लेकिन संघर्ष से हार मानना मैंने सीखा नहीं। जीवन के उद्देश्य फिर से समझे। मुझे अपने बचपन का ख्याल आया और मैं निकल पड़ा बच्चों के बीच अभिनय की अलख जगाने। स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने-लिखना सिखाने का काम किया। इसी बीच मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नाटक 'समर यात्रा' में मौका मिला। यहीं मुकेश छाबड़ा से मुलाकात हुई। हम तभी के दोस्त हैं। ये बात 1998 की है। इस नाटक के लिए गोवा गया तो वहां सीमा मुरासकर से मुलाकात हुई। आज वह मेरी पत्नी हैं।
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सत्यकाम आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

दोनों के घरवाले शादी के लिए राजी थे?

पहले नहीं राजी थे। सीमा के घर वालों को मेरे बिहारी होने पर एतराज था। तब बिहार में अपराध चरम सीमा पर था और बिहार की छवि उतनी अच्छी नहीं थी जितनी आज है। सीमा के घरवाले डरते थे कि बिहारी लड़का है, कहीं बेटी को काटकर न फेंक दे। मेरे घरवाले भी तैयार नहीं थे। सबको मानने में दो साल लग गए और मेरी शादी मुंबई में ही हुई। पत्नी ने कहा कि एक साल मुंबई में रहते हैं, उसके बाद जहां चलना होगा, वहां चलेंगे, लेकिन वह साल आज तक नहीं आया। 

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सत्यकाम आनंद (गैंग्स ऑफ वासेपुर) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मुंबई में पहला ब्रेक कैसे मिला?

पहली बार मुझे जी टीवी के शो 'तमन्ना हाउस' में 2004 में काम करने का मौका मिला। इसके बाद लगातार मुंबई में कुछ ना कुछ काम मिलता गया। इसी यात्रा में अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में जे पी सिंह का किरदार निभाया था। यह किरदार बहुत ही लोकप्रिय हुआ हुआ। 'बेटा, तुमसे ना हो पाएगा' डायलॉग आज भी बहुत लोकप्रिय है। इसके बाद मुझे आठ फिल्मों के प्रस्ताव आए। इनमें से मैंने तीन चुनीं।

'द माया टेप' में मैं और नवाजुद्दीन सिद्दीकी लीड में थे। फिल्म 'मिसेज स्कूटर' अभय देयोल बतौर निर्ममाता बना रहे थे। एक और फिल्म थी, ये तीनों रिलीज ही नहीं हुईं।

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सत्यकाम आनंद और के के मेनन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तब तो बहुत दिक्कत हुई होगी?
जीवन साथी का साथ ऐसे मौके पर ही काम आता है। कम लोग ही होते हैं इतने सौभाग्यशाली जिन्हें सीमा जैसा साथी जीवन में मिलता है। उन्होंने काम शुरू किया। कुछ विदेशी फिल्मों में वह असिस्टेंट कॉस्ट्यूम डिजाइनर रहीं, चार साल तक अनुराग कश्यप की की सेक्रेटरी रहीं। उनके उस दौर के साथ ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया है।

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सत्यकाम आनंद और भूमि पेडनेकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सुना आपने ‘घोस्ट राइटिंग’ (बड़े लेखकों के लिए बिना क्रेडिट के लिखना) भी की हैं?
हां, ये सच है कि मैंने तमाम धारावाहिकों के लिए बिना नाम मिले काम किया है। इसी दौरान मुझे विद्या बालन की फिल्म 'शेरनी'  मिली। फिर वेब सीरीज 'ग्रहण' और 'महारानी' में काम करने का मौका मिला। तीनों कहानियों में लोगों ने मेरा काम देखा और मुझे सराहा। यहां से मेरी एक नई यात्रा शुरू हुई है। मेरे करियर में फिल्म 'भक्षक' अब एक नया मोड़ लेकर आया है।
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महेश भट्ट और सत्यकाम आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा से आपकी दोस्ती के किस्से फिल्म जगत के कुछ ही लोग जानते हैं, आप बताइए ये रिश्ता कैसा है?
मैंने साल 2008 से लेकर 2010 तक मुकेश छाबड़ा के सहायक के रूप में काम किया है। ये उन दिनों की बात है जब मैंने 'फोर्स', 'मिलन टाकीज', और 'रॉक स्टार' जैसी फिल्मों की कास्टिंग पर उनके साथ काम किया। फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की कास्टिंग में भी मैं मुकेश की टीम में था। वहीं उनकी वजह से मुझे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में काम मिला। इसके बाद साल 2018 में 'अब दिल्ली दूर नहीं', 'लव ऑल' और 'शेरनी' जैसी फिल्मों में अभिनय का काम मिला। मुकेश ने ही 'भक्षक' में भी मौका दिलाया। मुकेश और मेरी दोस्ती अब भी कायम है। जितना भी मैं काम कर रहा हूं उसमें 90 फीसदी काम मुकेश छाबड़ा की ही वजह से ही मिल रहा है।
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