जब मैं अभिनय की दुनिया में आया, तब भारतीय सिनेमा में कई बदलाव हो चुके थे। मेरे पिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह अक्सर पूछते थे कि हमारे सिनेमा को पश्चिम की ओर झुकाव की आवश्यकता क्यों है? मेरे पिता अक्किनेनी नागेश्वर राव एक बहुत बड़ा नाम थे। यह बात मुझे पता तो थी, लेकिन अहसास नहीं था। जब बड़ा हुआ, तब मुझे यह पता चला कि मेरे पिता का रुतबा, उनका नाम कितना बड़ा है।
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akkineni nageswara rao
- फोटो : social media
घर में उनसे मिलने कई बड़े-बड़े कलाकार आते थे। घर का माहौल ऐसा ही था कि फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियां घर पर खूब आती थी। तब तक मेरे मन में अभिनय करने का कोई चस्का नहीं था। हालांकि, मैंने कुछ फिल्मों में काम जरूर किया था। फिर जब बड़ा हुआ तो चेन्नई के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से स्नातक किया और उसके बाद मैं मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अमेरिका चला गया था। जब वहां से लौटा तो करियर के बारे में संजीदगी से सोचने लगा। तब जाकर लगा कि अपनी विरासत को आगे बढ़ाऊं।
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नागार्जुन
- फोटो : file photo
जब वर्ष 1986 में फिल्म 'विक्रम' में मुझे मौका मिला और फिल्म को सफलता मिली, तब बहुत खुशी हुई थी। और वर्ष 1989 में आई फिल्म 'गीतांजलि' में जो सफलता, जो प्यार मुझे मिला, उस खुशी का जिक्र करना तो मेरे लिए नामुमकिन-सा था। मैंने जो भी सीखा, अपने पिता से सीखा। जैसे एक बच्चे के लिए उसके पिता सुपरमैन होते हैं, वैसे ही मेरे लिए वे थे। बचपन से ही मैंने उन्हें विस्मय से देखा। जब हम कभी बाहर जाते थे और लोग जिस तरह से उन्हें सम्मान देते थे, वह मुझे दिखता था। वह परिवार के साथ एकदम आम इंसान की तरह रहते थे। वह एक अच्छे पिता और एक अच्छे पति थे।
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नागार्जुन
- फोटो : file photo
घर के बाहर वह प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, लेकिन घर के अंदर एक बेहतरीन व्यक्ति जो हमारी समस्याओं को ध्यान से सुनते और हमारी मदद करते। उनके लिए सारे बच्चे एक समान थे। एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 1970 और 80 के दशक तक अभिनय का आनंद लिया। फिर जब मैं अभिनय की दुनिया में आया, तब भारतीय सिनेमा में कई बदलाव हो चुके थे। मेरे पिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह अक्सर पूछते थे कि हमारे सिनेमा को पश्चिम की ओर झुकाव की आवश्यकता क्यों है? हमारी संस्कृति और विरासत इतनी समृद्ध है। उसे बदलने की आवश्यकता ही क्यों है?' मैंने यह कहते हुए वापस तर्क दिया कि हमें दर्शकों को वह देना है, जो वह देखना चाहते हैं। वह पलटवार करते हुए कहते कि चीनी, कोरियाई को देखो।
उनका सिनेमा उनकी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करता है। वह अभिनय पर ही टिप्पणी करते थे, क्योंकि अभिनय ही उनका पहला प्यार था। उन्हें मेरे एक्शन दृश्यों में कभी कोई तर्क नहीं दिखता था। बाद में वह जरूर मेरे प्रदर्शन को मंजूरी देना शुरू किया था। उन्होंने फिल्म 'श्री रामदासु' में मेरा अभिनय बहुत पसंद किया था। कभी-कभी हम उनकी गलतियां खोजने की कोशिश करते थे और बहुत गुस्सा करते थे, क्योंकि हम कभी उनकी एक भी गलती नहीं खोज पाते थे।
जब उन्हें कैंसर का पता चला, तो उन्होंने हमें इससे निपटना सिखाया। जब तक वे कर सकते थे, तब तक बीमारी से लड़ते रहे। वह फिल्म 'मनम' के सेट्स पर थे, जब वह अचानक गिर पड़े और हॉस्पिटल ले जाने पर हमें पता लगा कि वह कैंसर की पांचवी स्टेज पर हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनके प्रशंसकों ने जो प्यार दिखाया, उसने हमें अभिभूत कर दिया था। मैं जो कुछ हूं, उनकी बदौलत ही हूं। वे बार-बार याद आते हैं।