गुरु और चेला, बहरूपिया
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पिताजी की सीख हमेशा याद रखी
पिताजी मुझसे हमेशा कहा करते थे कि कभी भी सफलता का घमंड मत करना और न ही किसी की बद्दुआ लेना क्योंकि दुआ से ज्यादा बद्दुआ लगती है। मुझे जो भी मिला वह सब मेरे माता, पिता और मेरे गुरु भाई जान के आशीर्वाद से मिला, अगर भाईजान मुझे अपना नाम नहीं दिए होते तो शायद मैं कुछ नहीं कर पाता। मैं तो उनकी जूती के बराबर भी नहीं था। अगर जूनियर के आगे से महमूद हटा दिया जाए तो मेरा कुछ अस्तित्व ही नहीं। भाईजान (महमूद) की ही इनायत रही कि उस दौर में मैं इंपाला कार से चलता था। मुझे जो कुछ भी मिला, वह उम्मीद से बहुत ज्यादा मिला है।