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EXCLUSIVE: ‘अमर उजाला’ से बोले निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी, ‘हिंदी सिनेमा राष्ट्रीय सिनेमा नहीं है’

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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बंगाली सिनेमा का बड़ा नाम रहे निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं। उनकी फिल्मों को भी मिलाकर गिनें तो यह संख्या 10 तक पहुंच जाती है। वह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा में प्रवेश की उनकी पहली कोशिश फिल्म ‘बेगम जान’ में उनसे गलतियां हुईं। लेकिन, वह हिंदी सिनेमा को राष्ट्रीय सिनेमा भी नहीं मानते। श्रीजीत ने नेटफ्लिक्स की फिल्मावली ‘रे’ की दो कहानियां निर्देशित की है। क्रिकेटर मिताली राज की बायोपिक भी वह निर्देशित करने जा रहे हैं। श्रीजीत से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव बातचीत।

लगातार नेशनल अवार्ड जीतने के बाद एक फिल्मकार की जिम्मेदारियां कितनी बढती जाती हैं?
मुझे नहीं लगता कि अलग से कोई जिम्मेदारी आ जाती है क्योंकि मेरी फिल्मों का पहला और सबसे अहम दर्शक मैं खुद हूं। मैं वही फिल्में बनाता हूं जो मुझे पसंद हैं और वही फिल्में बनाता हूं जो कहानियां मुझे अच्छी लगती हैं। अगर आप अखिल भारतीय दर्शकों के बारे में कह रहे हैं तो मैं 2010 से फिल्में बना रहा हूं और बंगाल के दर्शक देख रहे हैं कि मैं अपने हिसाब से अपने ढंग की कहानियां बनाता हूं। ‘बेगम जान’ में भी लोगों ने देखा कि ये थोड़ा लीक से हटकर फिल्म थी। दर्शकों के लिए फिल्म बनाना, दर्शकों को लक्ष्य करके फिल्म बनाना मेरे बस की बात नहीं है। मुझे ये पता नहीं है कि यूपी में लोग किस तरह की फिल्म पसंद करेंगे। यूपी में जो फिल्म पसंद आएगी, वह गुजरात में नहीं भी आ सकती है। अलग अलग राज्यों के लोगों की पसंद अलग अलग हो सकती है। मेरे हिसाब से खुद के प्रति ईमानदार रहना ही सबसे अच्छा है।
 
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रे - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आप फिल्मों में जब आए तो आपने सत्यजीत रे का अनुसरण किया। सत्यजीत रे की दो लघु कथाएं आपने फिल्मावली रे’ के लिए चुनी हैं तो इन्हीं दो कहानियों को चुनने की कोई वजह?
ये जो कहानियां हैं वह हू ब हू वैसी ही नहीं है जैसी सत्यजीत रे ने 60 के दशक में लिखी थीं। पहली बात तो उनमें कोई महिला किरदार नहीं थे। वे कहानियां खासतौर से यंग एडल्ट्स के लिए लिखी गईं थी। उनमें उतनी हिंसा नहीं थी। हम इनको थोड़ा और डार्कर स्पेस में ले गए। ये जो दो कहानियां हैं ‘बिपिन चौधरी स्मृतिभ्रम’ और ‘बहुरूपी’, वे रूपांतरण के लिए एकदम दुरुस्त हैं। हमने इन कहानियों की रूह वही रखी है।
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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, आपकी फिल्ममेकिंग पर कितना असर है सत्यजीत रे का?
मैं बंगाल से हूं। छह साल की उम्र से टीवी खोलने पर या लोगों से बात करने पर मैंने उन्हें ही देखा सुना। वह एक किंवदंती बन चुके हैं। असर अगर आप देखोगे तो वह लेखन में है। संवादों में हैं। संवादों में वह बहुत किफायत बरतते थे। और, एक असर हास्य में भी है। शूटिंग के फ्रेम में भी आपको ये दिखेगा। बंगाल से होने की वजह से ये असर आ ही जाते हैं।

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बेगम जान - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जिन्होंने ‘बेगम जान’ और इसकी मूल फिल्म ‘राज कहिनी दोनों देखी हैं, उनको बहुत बड़ा एक अंतर लगता है दोनों की कहानी कहने में, ये अंतर क्या इसलिए था कि महेश भट्ट ‘बेगम जान’ के निर्माता थे?
नहीं, नहीं, भट्ट साब कभी शूट पर नहीं आए और कभी एडिट पर भी नहीं आए। किसी ने कोई भी हस्तक्षेप नहीं किया। जो अंतर है वो इसलिए है कि हमने कहानी की पृष्ठभूमि बदलने की कोशिश की। बंटवारे की एक कहानी हम पूर्वी सीमा से उठाकर पश्चिमी सीमा पर ले गए। और जो लड़किया थीं, वह जो चकलाघर था ‘राजकहिनी’ का, उसको हमने एक अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की, जिसकी शायद कोई जरूरत नहीं थी। ये करने में कहानी में बनावट आ गई। दरअसल कहानी को एक राष्ट्रीय पहचान देने के चक्कर में वह थोड़ा नकली हो गई। जब भी कोई कहानी नकली हो जाती है ना तो कहीं पर जाकर उसकी रिदम कट जाती है।
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गुमनामी - फोटो : सोशल मीडिया
आपकी फिल्मों में एक राजनीतिक अंतर्धारा भी चलती है। बेगम जान’ में ये दिखा। आपकी पिछली फिल्म गुमनामी’ में भी ये दिखा। किसी क्षेत्रविशेष की अंतर्धारा को जब राष्ट्रीय पहचान मिलती है तो वह तारीफ कितनी संतुष्टि देती है?
देखिए, मैं सच सच आपको बताऊं। बंगाली तालियां, मारवाड़ी तालियां या फिर यूपी तालियों में कोई फर्क नहीं है मेरे लिए। तालियां जब पड़ती हैं जिस क्षेत्र से भी पड़ती हैं, वे तालियां ही होती हैं और अच्छा ही लगता है। लेकिन, मैं थिएटर का बंदा हूं। मैं फिल्मों में इसलिए आया क्योंकि मुझे लालच है दर्शकों की बड़ी तादाद का। एक बड़े दर्शक वर्ग को मुझे अपनी कहानियां दिखानी हैं।
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रे - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मैं आपको बीच में रोक रहा हूं लेकिन ये बताइए कि थिएटर छोड़ के फिल्मों में आना तो समझ आता है लेकिन अच्छा खासा एकैडमिक करियर छोड़कर इस तरफ आना?
कहानियां कहने का जो कीड़ा है वह अंदर घुस गया था। लेकिन इसी कीड़े ने मुझसे कहा कि ये सब कहानियां थिएटर में कह पाना मुमकिन नहीं है। इसके लिए बड़ा पर्दा लगेगा। 400 की जगह अगर चार लाख लोगों को अपनी कहानियां कहनी हैं तो सिनेमा ही उसका माध्यम है। नेशनल का भी वही है। अगर आप चार लाख लोगों को चार करोड़ में तब्दील करना चाहते हो तो आपको नेशनली स्टोरी बोलना होगा। नेशनल प्लेटफॉर्म आपको सहूलियत देता है कि आप ज्यादा लोगों को अपनी कहानियां बता सको।
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रे - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कोई कलाकार जब क्षेत्रीय सिनेमा से निकलकर राष्ट्रीय सिनेमा में आता है तो उसके दर्शक बढ़ते हैं। उसके प्रशंसक बढ़ते हैं। वह जो सीमित दायरे में अपना काम कर रहा था उसके देखने वाले बढ़ जाते हैं..
मुझे यहां पर आपसे थोड़ा मतभिन्न होना पड़ेगा। हिंदी सिनेमा राष्ट्रीय सिनेमा नहीं है क्योंकि हिंदी भाषा जो है वह राष्ट्रीय भाषा नहीं है। सभी 16 भाषाएं जो हैं वे सारी भाषाएं भारत की आधिकारिक भाषाएं हैं, तो राष्ट्रीय सिनेमा जैसा कुछ है नहीं। भारतीय सिनेमा है। मलायलम सिनेमा भी भारतीय सिनेमा है। हिंदी सिनेमा भी भारतीय सिनेमा है। ये क्षेत्रीय और राष्ट्रीय का अंतर जो आप कर रहे हैं। इससे मैं सहमत नहीं हूं।

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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : सोशल मीडिया
आपकी असहमति का पूरा स्वागत है। लेकिन आप बंगाली सिनेमा बना रहे हैं। अगर आपको लगता कि बंगाली सिनेमा और हिंदी सिनेमा बराबर है तो आप कभी बंगाली सिनेमा से  बाहर नहीं निकलते। ये एक कलाकार का लालच होता है कि वह क्षेत्रीय भाषा से निकलकर एक ऐसी भाषा में आए जो एक से ज्यादा राज्यों में बोली जाती है
नहीं, मैं इसी मुद्दे पर आपसे सहमत नहीं हूं। मेरा लालच है बहुत तरीके की भाषाओं में फिल्म बनाने का।

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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : सोशल मीडिया
तो आपने तमिल तेलुगू में फिल्म क्यों नहीं बनाई, हिंदी को ही क्यों चुना?
उसमें अंग्रेजी भी है। उसमें क्षेत्रीय भी है। जैसे मृणाल सेन ने उड़िया में फिल्म बनाई। मृणाल सेन ने मलयालम में फिल्म बनाई। तो फिल्मकार बहुत सारी संस्कृति को समाहित करना चाहते हैं। बहुत तरह की संस्कृति को खोजना चाहता है। इसमें एक क्षेत्र का और एक राष्ट्र का जो समीकरण है, वह गलत है। मुझे लगता है कि ये गलत है।

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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : सोशल मीडिया
मैं समीकरण की बात नहीं बल्कि कलाकार के जो लालच की बात कर रहा हूं। ए आर रहमान, एस एस राजामौली या मणिरत्नम। ये सब हिंदी में इसलिए आए क्योंकि हिंदी ही देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इसमें किसी कलाकार को मिलने वाली बड़ी दर्शक संख्या की बात है और फिर बात अगर सिर्फ सिनेमा की होती तो आप भी हिंदी से पहले तमिल या तेलुगू में फिल्म बनाते!
अगर आप संख्या की बात कर रहे हैं तो वह अलग बात है। और, ऐसी बात नहीं है कि मैं सीधे हिंदी पर आया। सच पूछें तो मेरी जो पहली स्क्रिप्ट है वह अंग्रेजी में है। अगर आप अंग्रेजी भाषी लोगों की संख्या देखेंगे तो वह हिंदी से ज्यादा है। अगर मुझे दर्शकों की अधिक संख्या की तरफ ही जाना है तो मैं अगर एक अंग्रेजी फिल्म बनाऊं तो मेरे पास एक अधिक बड़ी संख्य़ा दर्शकों की होगी।
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श्रीजीत मुखर्जी - फोटो : सोशल मीडिया
फिर तो चीन की भाषा में फिल्म बनाने में अंग्रेजी से भी ज्यादा दर्शक मिल सकते हैं?
बिल्कुल सही बात। और, एक विकल्प ये भी हो सकता है कि बंगाली में फिल्म बनाई जाए और उसे दूसरी भाषाओं में डब किया जाए।


श्रीजीत मुखर्जी का ये वीडियो इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।
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