बेगम जान
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जिन्होंने ‘बेगम जान’ और इसकी मूल फिल्म ‘राज कहिनी दोनों देखी हैं, उनको बहुत बड़ा एक अंतर लगता है दोनों की कहानी कहने में, ये अंतर क्या इसलिए था कि महेश भट्ट ‘बेगम जान’ के निर्माता थे?
नहीं, नहीं, भट्ट साब कभी शूट पर नहीं आए और कभी एडिट पर भी नहीं आए। किसी ने कोई भी हस्तक्षेप नहीं किया। जो अंतर है वो इसलिए है कि हमने कहानी की पृष्ठभूमि बदलने की कोशिश की। बंटवारे की एक कहानी हम पूर्वी सीमा से उठाकर पश्चिमी सीमा पर ले गए। और जो लड़किया थीं, वह जो चकलाघर था ‘राजकहिनी’ का, उसको हमने एक अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की, जिसकी शायद कोई जरूरत नहीं थी। ये करने में कहानी में बनावट आ गई। दरअसल कहानी को एक राष्ट्रीय पहचान देने के चक्कर में वह थोड़ा नकली हो गई। जब भी कोई कहानी नकली हो जाती है ना तो कहीं पर जाकर उसकी रिदम कट जाती है।