सिने टॉकीज 2022
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दो दिन तक यहां मुंबई विश्वविद्यालय प्रांगण में चले सिने टॉकीज 2002 के आयोजन में भारतीय संस्कृति और सिनेमा के बीच रिश्ता और प्रगाढ़ करने पर गहन विचार विमर्श हुआ। सिनेमा को देश की ताकत बनाने और देश को आजाद कराने में सिनेमा के योगदान पर भी खास तौर से चर्चा हुई। इस अवसर पर प्रसून जोशी ने समावेशी सिनेमा की बात को रेखांकित करते हुए कहा, "अगर आप एक किसान और उसके संघर्ष पर फ़िल्म बनाने का इरादा रखते हैं तो आपको इस तरह का वातावरण निर्मित करना होगा जहां एक किसान का बेटा भी आकर फिल्म बना सके, वर्ना हमारा सिनेमा में कोरी कल्पनाओं से अधिक कुछ नहीं होगा। यह बहुत आवश्यक है कि सिनेमा बनाने वालों का संबंध गांवों, छोटे-छोटे शहरों और विभिन्न तरह की पृष्ठभूमि के लोगों से हो। अगर कुछ गिने-चुने लोग ही सिनेमा बनाते रहेंगे तो सिनेमा में कुछ ही बातें बार-बार दोहराई जाती रहेंगी।”