सुरक्षा
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
गोरे नहीं हम काले सही, हम नाचने गाने वाले सही
मिथुन की शुरुआती सफलता में उनकी फिल्मों के म्यूजिक और उनके डांस ने बहुत मदद की। मिथुन ने नाचने का अपना एक अलग अंदाज विकसित किया था। बेलबॉटम की मोहरी में चेन का आधा हिस्सा सिलवाने का फैशन यहीं से शुरू हुआ और यहीं से छोकरों ने मोटे सोल वाले जूते भी पहनने शुरू किए। जो अमिताभ, राजेश खन्ना, जीतेंद्र, धर्मेंद्र के फैन थे, वे मिथुन के फैन्स से जलते थे। लेकिन, सिनेमा में समाजवाद मिथुन से ही शुरू हुआ माना जाता है। वह सर्वहारा समाज के हीरो थे। जो युवा जमाने के पैमाने पर खूबसूरत नहीं थे, ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, तीसमार खां नहीं थे, जिनके पास कार या मोटरसाइकिल नहीं थी, सब मिथुन के फैन होते गए। मिथुन ने रिक्शावालों, साइकिल चलाने वालों, मजदूरों और कामगारों की एक नई इमेज बनाई और लोगों को लगने लगा कि ये ‘सुहाग’ वाला अमित कपूर उनका हीरो नहीं बल्कि धूप में तपकर काला हुआ ये गोपी ही उनके आसपास से निकला हीरो है। हजारों-लाखों को ये अपने बीच का लड़का लगा। इन्हीं भावनाओं ने आगे चलकर मिथुन को ‘डिस्को डांसर’ बनाया और देश में सबसे ज्यादा आयकर देने वाला नागरिक भी।