हिंदी सिनेमा में तमाम ऐसे निर्देशक हुए हैं जिनकी दिलो जान से बनाई चंद फिल्मों की गिनती क्लासिक फिल्मों में होती हैं, लेकिन जो रिलीज के वक्त उस दौर के दर्शकों ने पूरी तरह से नकार दी थीं। राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से लेकर आर माधवन की फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ तक के बाद भी और उससे पहले भी ऐसी फिल्मों की ठीक ठाक लिस्ट है। इस लिस्ट से जिस खास फिल्म का जिक्र आज के बाइस्कोप में है, उसका नाम है ‘जाने भी दो यारो’। अपनी रिलीज के वक्त कहीं हाशिये में सिमट गई ये फिल्म भी सिनेमाघरों से उतरने के बाद ही हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म बनी। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के निर्देशक कुंदन शाह तब जिंदा थे, जब इस फिल्म के प्रिंट को ठीक ठाक करके फिर से इसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ को दोबारा सिनमाघरों में रिलीज हुए भी आठ साल होने को आए। कुंदन शाह से तब खूब बातें हुई थीं। उन्होंने खूब किस्से फिल्म की मेकिंग के सुनाए थे। वह ये भी कहते थे कि उनका बड़ा मन है इस फिल्म का सीक्वेल बनाने का। लेकिन, ‘एक था टाइगर’, ‘दबंग 2’ और ‘राउडी राठौर’ के एक्शन पर झूम रहे दर्शकों को साल 2012 में भी ‘जाने भी दो यारो’ का सीक्वेल भाएगा, किसी ने यकीन नहीं किया। कुंदन शाह सीक्वेल की वह स्क्रिप्ट अपने सिरहाने रखकर महीनों सोते रहे और एक दिन अपने इस सपने को लिए हुए ही ऊपर चले गए।