सुल्तान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके सिनेमा में एक बात और दिखती है, वह है अलग अलग धर्मों के किरदारों के बीच बनने वाला रिश्ता, ये आप जानबूझकर बुनते हैं या फिर ये कहानी लिखने का आपका स्वाभाविक प्रवाह है?
मेरी कहानियों के किरदार मेरे हिंदुस्तान के किरदार हैं। वह ‘सुल्तान’ का सुल्तान खान हो सकता है, ‘भारत’ का विलायती खान हो सकता है या फिर ‘जोगी’ का कलीम। ये किरदार पूरी फिल्म में कहीं धर्म का दिखावा या मजहबी बात नहीं करते। ये किरदार मेरे आसपास के किरदार हैं जिनकी छाया मैं अपनी कहानियों में देख पाता हूं। और, इनके अक्स में मुझे अपना हिंदुस्तान नजर आता है। हम बचपन में दोस्ती करते नहीं, बस ये दोस्तियां हो जाती हैं, और उस समय हम किसी का धर्म कहां पूछते हैं? यही भाव मेरे सिनेमा का है। मेरा सिनेमा हिंदुस्तान की मिट्टी को ही अपनी खाद मानता है। और, एक मिट्टी में पनपे हर पौधे का धर्म एक ही होता है।