अल्ला रखा रहमान यानी ए आर रहमान आमतौर पर निजी बातचीत में भी बहुत कम बोलते हैं। हर क्रिएटिव इंसान की तरह उनका भी काम करने का अपना अलग तरीका है। संगीत को उन्होंने इबादत समझा है। लेकिन, अपना करियर शुरू करन के लंबे अरसे तक न उन्हें नुसरत फतेह अली खान के बारे में ज्यादा कुछ पता था और न हिंदी सिनेमा के कई मशहूर संगीतकारों के बारे में। लता मंगेशकर से उनका कनेक्शन थोड़ा इसलिए अलग है क्योंकि रहमान के पिता आर के शेखर रोज सुबह उठकर लता की एक तस्वीर निहारा करते थे। ऐसी तमाम निजी यादें ए आर रहमान ने साझा की हैं, ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल के साथ इस एक्सक्लूसिव बातचीत में।
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ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आमतौर पर कोई कलाकार या तकनीशियन फिल्म निर्माता तब बनता है जब उसे लगता है कि कोई दूसरा उसकी सोच को हूबहू परदे पर नहीं उतार पाएगा, आप निर्माता क्यों बने?
फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ बनाने का मूल विचार नए भावों को व्यक्त करने का रहा। मैं पिछले 20 साल में 160 फिल्मों में संगीत दे चुका हूं। खूब घूमा हूं। दूसरी संस्कृतियों के लोगों से मिला हूं। तो मेरे भीतर कहीं ये एहसास भी रहा कि मुझे संगीत में और गहरी डुबकी लगानी ही चाहिए। और, ऐसा करने का मेरे पास एक ही तरीका था कि अपनी फिल्म की कहानी खुद लिखूं। अपनी चुनौतियां खुद रचूं और ऐसी ही एक फिल्म का निर्माण करूं।
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ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, ‘मां तुझे सलाम’ बनाने के पीछे भी ऐसी ही किसी प्रेरणा ने काम किया होगा?
भारत का मूल भाव है ‘वंदे मातरम्’। और, उस समय बिंदु पर ऐसा गाना बनाने के लिए हमें किसी ने कहा नहीं और ना ही किसी ने हम पर दबाव डाला। हमने ये गीत अपने गर्व के साथ बनाया। महबूब ने इसे लिखा। भरतबाला और कनिका का जुनून इसके वीडियो में तब्दील हुआ। 90 के दशक में एक नए भारत का जन्म हुआ था। एक विकासशील देश का जन्म हुआ था।
दर्जनों फिल्मफेयर, छह नेशनल अवार्ड, दो ऑस्कर और बाफ्टा पुरस्कार सब आपको मिले हैं। लेकिन, ‘मां तुझे सलाम’ सुनने के बाद अपनी मां करीमा बेगम से मिली झप्पी के आगे इन सबका क्या मोल है?
हर इंसान को ये समझना जरूरी है कि उसका जन्म क्यों हुआ है? हमारे जीवन में जो कुछ होता है उसके पीछे कुछ न कुछ संदेश होता है। मेरी फिल्म पहली फिल्म 1992 में ही क्यों रिलीज हुई? या कि जैसे 2009 मेरे जीवन का अहम साल है। (इस साल रहमान की पहली हॉलीवुड फिल्म रिलीज हुई और टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया के सौ प्रभावशाली लोगों में शामिल किया)। मुझे लगता है कि कोई तो शक्ति है और वह शक्ति हम सबको एक देखना चाहती है। जब मैं खुद से ये सारे सवाल करता हूं तो मुझे अपने सारे गुजरे साल याद आते हैं। हमारे विवेक से आगे जाकर हर वस्तु में एक संबंध है। कहीं एक ऐसी पवित्र अवस्था है जहां न कोई हिंदू है, न मुस्लिम, न ईसाई, ईश्वर को न मानने वाला भी। हमारी आत्माओं के बीच भी ऐसी ही एक पवित्र डोर खिंची हुई और मेरा भरोसा है कि जब मैं संगीत बनाता हूं तो ये उस पवित्र अवस्था के भी आगे निकल जाता है। वो कहते हैं न कि एक जगह होगी जहां न कुछ अच्छा होगा और न कुछ बुरा, मैं तुम्हें वहां मिलूंगा। वह जगह दरअसल संगीत है।
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ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आपके न्यूयार्क में हुए लाइव शो में मैं मौजूद था, वहां एक अमेरिकी महिला से मैंने उनके वहां होने का सबब पूछा तो उनका उत्तर था, ‘संगीत। मैंने ऐसा संगीत पहले सुना नहीं है।‘ भारतीय संगीत का दूत बनकर कहीं जाना कितनी बड़ी जिम्मेदारी मानते हैं आप?
शुरू से हम जो करते हैं, उसके पीछे हमारी नीयत होती है। ‘रोजा’ रिलीज होने से 10 साल पहले तक मैंने दुनिया का हर तरह का संगीत सुना। चीन, रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सबका। मैं ये देखना चाहता था कि कैसे हम वहां की अच्छी चीजें अपनी संस्कृति में ला सकते हैं और कैसे हम अपनी संस्कृति को दूसरे देशों तक पहुंचा सकते हैं। जब हम दूसरों के लिए कुछ बाहर लेकर जाना चाहते हैं तो हमें ये ख्याल रखना होता है कि हमारी संवेदनाएं एक स्तर पर होनी चाहिए। एक साझा स्थान होना चाहिए। अगर आप मेरी शैली देखेंगे तो मैंने अपनी पहली फिल्म में दक्षिण भारत से होने के बावजूद हिंदुस्तानी राग पनाए हैं। जब हमारा साक्षात्कार किसी दूसरी संस्कृति से होता है तो हम या तो उस पर तरस खाते हैं या उसके आभामंडल से प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन, अगर हम सही संतुलन बना लें और दोनों संस्कृतियों का एक साझा सहमति बिंदु खोज लें तो फिर वह आपसे बहुत कुछ सीखना चाहते हैं। संगीत एक आम भाषा है। आपने जैसे कि कहा मुझे भारतीय संगीत का सांस्कृतिक दूत समझा जाता है, तो मुझे लगा कि क्यों न ऐसा ही प्रयोग मैं सिनेमा में भी करूं।
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इहान भट, ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, आपको लगता है कि भारतीय सिनेमा में अभिनय करने वाले भी अंतर्राष्ट्रीय दूत बन पा रहे हैं?
मेरी फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ का हीरो इहान कश्मीर से है। वह यूक्रेन शूटिंग करने गया। उससे पहले उसने एक साल तक पियानो सीखा। फिर हॉलीवुड में ट्रेनिंग करने गया। मैंने इहान को कभी एक भारतीय अभिनेता के तौर पर देखा ही नहीं। मेरी ख्वाहिश है कि वह भारत के बाहर भी नाम कमाए। उसे हॉलीवुड की, चीन की, जापान की फिल्मों में भी पहचान मिले। ये काम हमारे अभिनेताओं को करना ही चाहिए। मुझे लगता है धनुष ऐसा कर रहे हैं। प्रियंका चोपड़ा भी ऐसा कर रही हैं। समय की जरूरत है कि हमारे अभिनेता पूरी दुनिया में काम करें और देश की संस्कृति व दर्शनशास्त्र पूरी दुनिया में फैलाएं।
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नुसरत फतेह अली खान, ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आपने तमाम अंतर्राष्ट्रीय सितारों के साथ संगत जमाई है। लेकिन, मेरी दिलचस्पी आपकी नुसरत फतेह अली खान से हुई पहली मुलाकात के बारे में जानने में सबसे ज्यादा है, कैसे हुआ ये संगम?
मेरे एक दोस्त सारंग ने एक बार मुझे एक सीडी दी। उस सीडी में नुसरत साब की आवाज मैंने पहली बार सुनी। उसमें उन्होंने ‘दम मस्त कलंदर’ गाया था। उन्हें सुनकर मेरे तो होश ही उड़ गए। मैंने दक्षिण भारतीय संगीत सुना हुआ था। उत्तर भारत का संगीत सुना हुआ था, लेकिन ये तो कुछ और ही था। मैंने पूछा कि ये क्या है, किसकी आवाज है ये? मेरे जीवन के अगले पांच साल इसके बाद पंजाबी लहजा, पंजाबी भाषा और सूफियाना को समर्पित रहे। उनसे मुलाकात कराने का वादा मुझसे सबसे पहले शेखर कपूर ने किया था, लेकिन वह हो न सका। फिर मैं अपने एक अलबम के सिलसिले में न्यूयॉर्क में था और मुझे पता चला कि नुसरत साहब का शो हो रहा है। तो मैं शो देखने गया। कोई पांच छह हजार गोरे मस्त होकर झूम रहे थे। मुझे लगा कि किसी कलाकार को इससे ज्यादा क्या चाहिए। कार्यक्रम के बाद बैकस्टेज उनसे मुलाकात की बात आयोजकों ने मान ली तो मैं लाइन में खड़ा हो गया। कोई पांच छह सौ लोग रहे होंगे। तभी उनके मैनेजर ने मुझे पहचान लिया, वह मुझे लाइन से निकालकर ले गय। नुसरत साब ने कहा कि मैं मुंबई आ रहा हूं, वहां हम मिलते हैं। मैंने कहा कि मुझे आपसे सीखना है। तो रात के दो बजे उनके होटल के स्यूट में महफिल लगी। हर तरफ से लोग आ रहे हैं और उन्होंने मुझे कव्वाली का पहला ज्ञान दिया। जो कव्वाली उस दिन उन्होंने गाकर सुनाई, वह मुझे अब तक याद है। वही इकलौता सबक उन्होंने मुझे दिया। तब भरतबाला ने कहा कि आप दोनों मिलकर कुछ क्यों नहीं करते। तो 1997 में हम पाकिस्तान गए। सिर्फ एक रात के लिए। मतलब कि हम शाम को पहुंचे। बिना आराम किए काम पर लग गए। सुबह तक काम करते रहे। फिर अगली शाम तक काम जारी रहा बिना सोए। और शाम को हम वापस आ गए।
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ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जीवन में सुर का लगना ही कमाल है फिर चाहे वह संगीत हो या सिनेमा। अपनी फिल्म के लिए खोजे कलाकारों में से आपने इहान की बात तो बता दी, लेकिन इडिलसी?
फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ का ये एक बहुत ही खास किरदार है। जब हम आलिया भट्ट के साथ ‘पटाखा गुड्डी’ का वीडियो बना रहे थे तो उस समय मुझे लगा था कि वह इस रोल के लिए बिल्कुल फिट रहेंगी। उन्होंने कहा भी मुझे कि आप कहानी तो सुनाइए। लेकिन मैंने ही फिर उनसे इस रोल के बारे में बात नहीं की। ऐसा इसलिए कि जब तक 2016 में हमारी पटकथा बनकर तैयार हो पाई, आलिया बड़ी स्टार बन चुकी थीं। हमारी फिल्म के लिए साल भर की ट्रेनिंग और हॉलीवुड में लगने वाली कक्षाओं में मौजूदगी जरूरी थी और मुझे लगा हमें एक स्थापित हो चुकी अभिनेत्री को इसके लिए परेशान नहीं करना चाहिए। साढ़े छह सौ, सात सौ के करीब कलाकारों के ऑडीशन के बाद इडिलसी का चुनाव हुआ। वह डोमिनिकन रिपब्लिक से हैं और उन्होंने फिल्म के किरदार के हिसाब से अपना काम बहुत अच्छा किया है।
और, अब सवाल लता मंगेशकर के बारे में। उनका पहली बार जब साथ मिला तो उस पल के बारे में बताइए?
लता जी के साथ मेरा पहला गाना ‘जिया जले था..’। उनके पास होना भी किसी सपने जैसा होता है। मुझे जहां तक पता है मेरे पिताजी के पास युवा लता मंगेशकर की एक फोटो थी। इस फोटो को वह रोज सुबह उठकर देखते थे। संगीत की प्रेरणा के लिए। किसी भी तरह के गायन का वह शिखर हैं। लताजी जैसा गाने वाला ना कोई हुआ है और न होगा। अभी हम लोगों को क्या क्या नहीं करना पड़ता। ड्रेस बदलो, मेकअप करो, म्यूजिक वीडियो शूट करो, यहां स्टेज पर उछलकूद करो, वहां नाचो। लेकिन, उन्होंने क्या किया, कुछ नहीं। सिर्फ संगीत की साधना की। पूरा जीवन उन्होंने संगीत को दे दिया। विश्व में संगीत की प्रेरणा मानी जाती हैं वह। एक तरह से देखा जाए तो लता मंगेशकर के साथ काम करके मैंने अपने पिताजी का सपना पूरा कर दिया है।
फिल्म ‘ताल’ में आपके संगीत ने हिंदी सिनेसंगीत की धारा मोड़ने का बड़ा काम किया। किसी फिल्म के सिर्फ म्यूजिक राइट्स के लिए छह करोड़ रुपये की रकम एक रिकॉर्ड है। आपके संगीत पर किसी का कोई असर रहा क्या कभी? और अब जो संगीत बन रहा है, उस पर रहमान का कितना असर आप मानते हैं?
मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं और मुझे लगता है कि मुझे अब इस बात के लिए माफी मांगनी चाहिए कि मैंने तमाम संगीतकारों को तब नहीं सुना। हां, मैंने आर डी बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और नौशाद को तो खूब सुना लेकिन मदन मोहन, सचिन देव बर्मन जैसे संगीतकारों के बारे में मुझे बहुत बाद में पता चला। मैं तो दक्षिण में जी रहा था। वहां के संगीतकारों के लिए बजा रहा था। इंटरनेशनल म्यूजिक सुन रहा था तो मैं जब संगीतकार बना तो मेरे ऊपर किसी दूसरे का असर नहीं था। मैं हिंदी के संगीतकारों से मिलता हूं तो मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान होता है। देश दुनिया में हिट होने लायक गाना बनाना आसान नहीं होता। दक्षिण भारत में भी उत्तर भारत के संगीत की नकल होती है। वहां भी लोग नौशाद, मदन मोहन और एस डी बर्मन को पसंद करते हैं। जिम्मेदारी यही होती है कि नए लोग जो आ रहे हैं वे किसी की नकल नहीं कर रहे। वे तरीके या कहें कि रास्ते वही इस्तेमाल कर रहे हैं जो तमाम फिल्मों मसलन ताल आदि ने बनाए। मेरा तो यही कहना कि हर एक की अपनी अलग पहचान होनी चाहिए।