83 फिल्म
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युवाओं में फिल्म ‘83’ के प्रति आकर्षण न होने को इस फिल्म को हुए नुकसान की वजह दिल्ली के शिक्षाविद कैलाश जोशी भी मानते हैं। वह कहते हैं, ‘फिल्म निश्चित रूप से बहुत अच्छी बनी है। परंतु युवा पीढ़ी ऑनलाइन गेमिंग के हानिकारक मोहपाश में जकड़ी हुई है। जो कुछ इससे बचे हैं उनका रुझान फुटबाल की ओर अधिक है। युवा पीढ़ी ग्लैमर और हिंसा युक्त काल्पनिक सिनेमा की दीवानी है। वैसे फिल्म का नाम भी कुछ बेहतर हो सकता था।’ जबकि, सवाई माधोपुर के योगेश गर्ग कहते हैं, ‘83 के वर्ल्ड कप को पर्याप्त भुनाया जा चुका है। इसको देखने और जीने वाली पीढ़ी रिटायरमेंट की उम्र की है। उनके लिए क्रिकेट अब रुचिकर नही रहा। रही सही कसर मौजूदा दौर में क्रिकेट में सट्टेबाजी ने पूरी कर दी। कपिल देव कभी न्यू मिलेनियम पीढ़ी के नायक नही रहे। ये पीढ़ी सचिन, राहुल, गांगुली और धोनी को ही नायक के तौर पर जानती है।