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कौन हैं आयशा चौधरी, जिन पर बनी है प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'द स्काई इज पिंक'

Wed, 11 Sep 2019 11:47 AM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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हाल ही में प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'द स्काई इज पिंक' की शूटिंग पूरी हुई है। इस फिल्म में प्रियंका के अलावा फरहान अख्तर और जायरा वसीम मुख्य भूमिका में हैं।

प्रियंका की यह फिल्म एक भारतीय लड़की आयशा चौधरी की सच्ची कहानी पर आधारित है। लेकिन आयशा चौधरी ने ऐसा क्या किया कि बॉलीवुड को उन पर फिल्म बनानी पड़ी। उनकी सच्ची कहानी आगे पढ़ें।
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आयशा की भूमिका में दिखेंगी जायरा वसीम - फोटो : Twitter
आयशा चौधरी... 1996 में गुरुग्राम में इनका जन्म ऑटो इम्यून डिफिशिएंसी डिसऑर्डर के साथ हुआ था। जिसके कारण महज छह महीने की उम्र में उनका बोन मैरो ट्रांसप्लांट करना पड़ा था। लेकिन उनकी परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। इस ट्रांसप्लांट के बाद आयशा को पल्मनरी फाइब्रोसिस (Pulmonary Fibrosis) नामक गंभीर बीमारी हो गई।
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आयशा चौधरी और फिल्म द स्काई इज पिंक स्टार कास्ट - फोटो : Twitter
इस बीमारी के कारण आयशा के फेफड़ों में ऐसी कोशिकाएं विकसित होने लगीं, जिससे आयशा को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। इन कोशिकाओं ने त्वचा को सख्त और मोटा कर दिया, जिससे आयशा के फेफड़ों तक ऑक्सीजन ठीक से पहुंच ही नहीं पा रही थी। 

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आयशा चौधरी - फोटो : Youtube
बेहद छोटी उम्र में आयशा जिंदगी और मौत को करीब से देख रही थी। फिर आयशा की मां ने उनका ध्यान किताबों की तरह आकर्षित किया। एक इंटरव्यू में आयशा की मां ने बताया है, 'उसे हमेशा लिखना पसंद था। फरवरी 2014 की बात है जब वह बिस्तर पर पड़ी थी। मैंने उसे ह्यू प्राथर की एक किताब दी और कहा कि इस किताब की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। इस पर आयशा ने जवाब दिया - मैं ह्यू प्राथर से बेहतर लिख सकती हूं।'
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आयशा चौधरी - फोटो : WikiBio
महज 18 साल की उम्र में आयशा लेखिका बन गईं। उनकी किताब 'माय लिटिल एपिफैनीज' (My Little Epiphanies) को साल 2015 में जयपुर लिटरेरी फेस्ट में रिलीज किया गया था। लेकिन अपनी किताब की सफलता देखने के लिए ज्यादा दिनों तक वह जीवित नहीं रह सकीं।





 
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आयशा चौधरी - फोटो : Youtube
2014 तक आयशा के फेफड़ों के ऑक्सीजन लेने की क्षमता 35 फीसदी थी, जो 2015 में 20 फीसदी रह गई। 24 जनवरी 2015 को आयशा की मृत्यु हो गई।

आयशा के डॉक्टर ने चेतावनी दी थी कि अगर उन्हें किसी तरह का इंफेक्शन होगा तो वह जीवित नहीं रह पाएंगी। लेकिन आयशा डर कर जीने वालों में से नहीं थीं। अपनी स्थिति जानने के बाद भी आयशा ने देश के कोने-कोने में ट्रैवेल किया। मोटीवेशनल स्पीच दिए। हर जगह वह पोर्टेबल ऑक्सीजन लेकर जाती थीं।

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द स्काई इज पिंक में फरहान-प्रियंका - फोटो : social media
INK 2013 और 2014 के कॉन्फ्रेंसेज से लेकर 2013 में पुणे में आयोजित टेड-एक्स तक में उन्हें बतौर स्पीकर बुलाया गया था।

आयशा का मानना था कि 'अगर आप अपनी जिंदगी नहीं बदल सकते तो आपके पास हमेशा किसी और की जिंदगी बेहतर बनाने का विकल्प है।' उनका कहना था 'मृत्यू अंतिम सच है। लेकिन मैं खुश रहना चाहती हूं और मैंने एक हैप्पी पल्मनरी फाइब्रोसिस को चुना है।'

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