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250 रुपए लेकर घर से चले थे, आज बन गए 150 करोड़ की कंपनी के मालिक

Sun, 11 Sep 2016 02:54 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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अमित कुमार दास जेब में 250 रुपए लेकर घर से निकले थे। सोचा था बड़े शहर में जाकर पढ़ाई करेंगे और एक मुकाम हासिल करेंगे। अपनी लगन और मेहनत से अमित ने वो कर दिखाया जो उनके मां-बाप ने कभी सोचा भी नहीं था। आज अमित साल में 150 करोड़ रुपए कमा रहे हैं। आइए जानते हैं कैसे अमित ने हासिल किया ये मुकाम...
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250 रुपए लेकर घर से चले थे अमित, आज बन गए 150 करोड़ की कंपनी के मालिक

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अमित का जन्म बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज कस्बे के एक किसान के घर में हुआ था। किसान परिवारों में लड़के बड़े होकर खेती-बाड़ी ही किया करते थे। अमित इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। वह हमेशा से इंजीनियर बनना चाहते थे। परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि बेटे की पढ़ाई का खर्च उठा सके। पैसे नहीं थे लेकिन जैसे-तैसे सरकारी स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद पटना के एएन कॉलेज से साइंस से इंटर किया।
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परिवार पर ज्यादा बोझ ना डालते हुए अमित 250 रुपए लेकर दिल्ली आ गए। यहां आकर उन्हें अहसास हुआ कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्च वो नहीं उठा पाएंगे। ऐसे में वह पार्टटाइम ट्यूशंस लेने लगे। साथ ही, दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए की पढ़ाई शुरू कर दी। पढ़ाई के दौरान उन्हें कंप्यूटर सीखने की सूझी। इसी मकसद के साथ वो दिल्ली के एक प्राइवेट कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे।

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सेंटर पर रिसेप्‍शनिस्ट ने उनसे अंग्रेजी में सवाल पूछे लेकिन वो उसका जवाब नहीं दे पाए। रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। वो उदास मन के साथ घर जाने लगे। एक आदमी ने उनकी उदासी देखकर कारण जानना चाहा। वजह पता चलने पर उसने अमित को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स करने का सुझाव दिया। अमित को यह सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने बिना देर किए तीन महीने का कोर्स ज्वॉइन कर लिया।
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इस कोर्स से अमित की इंग्‍लिश अच्छी हो गई थी उनमें एक नया आत्मविश्वास आ गया था। इसी के साथ अमित फिर से उसी कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में पहुंचे और इस बार उन्हें एडमिशन मिल गया। अब अमित को दिशा मिल गई थी। 6 महीने के कंप्यूटर कोर्स में उन्होंने टॉप किया। अमित की इस उपलब्धि को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें तीन साल के लिए प्रोग्रामर की नौकरी ऑफर की।
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प्रोग्राम पूरा होने पर इंस्टीट्यूट ने उन्हें फैकल्टी के तौर पर नियुक्त कर लिया। वहां पहली सैलरी के रूप में उन्हें 500 रुपए मिले। कुछ साल काम करने के बाद अमित को इंस्टीट्यूट से एक प्रोजेक्ट के लिए इंग्लैंड जाने का ऑफर मिला, लेकिन अमित ने जाने से इनकार कर दिया। वो भारत में ही अपना कारोबार शुरू करना चाहते थे। उस समय अमित की उम्र 21 साल थी। 
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इसके चलते अमित ने जॉब छोड़ दी। कुछ हजार रुपए की बचत से दिल्ली में एक छोटी-सी जगह किराए पर ली और अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी आइसॉफ्ट शुरू की। कुछ महीनों तक उन्हें एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला था। गुजारे के लिए वे जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में रात 8 बजे तक पढ़ते और फिर रात भर बैठ कर सॉफ्टवेयर बनाते। मेहनत और लगन रंग लाई और धीरे-धीरे उन्हें प्रोजेक्ट मिलने लगे।

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अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए उन्हें 5000 रुपए मिले। अमित अपने संघर्ष के बारे में बताते हैं कि लैपटॉप खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए क्लाइंट्स को अपने सॉफ्टवेयर दिखाने के लिए वे पब्लिक बसों में अपना सीपीयू साथ ले जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट का प्रोफेशनल एग्जाम पास किया और इआरसिस नामक सॉफ्टवेयर डेवलप किया और उसे पेटेंट भी करवाया। 2006 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया में एक सॉफ्टवेयर फेयर में जाने का मौका मिला। 

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इस अवसर ने उन्हें इंटरनेशनल एक्सपोजर दिया। इससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी कंपनी को सिडनी ले जाने का फैसला कर लिया। आइसॉफ्ट सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी की तरक्की शुरू हो चुकी थी। आज उसने ऐेसे मुकाम को छू लिया, जहां वह हजारों कर्मचारियों और दुनिया भर में सैकड़ों क्लाइंट्स के साथ कारोबार कर रही है। इतना ही नहीं 150 करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर की इस कंपनी के ऑफिस सिडनी के अलावा, दुबई, दिल्ली और पटना में भी स्थित हैं।
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अमित को अपने राज्य बिहार में शिक्षा के अवसरों की कमी का अहसास भी था। साल 2009 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने फारबिसगंज में उनके नाम पर एक कॉलेज खोला। कॉलेज का नाम मोती बाबू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करके कुछ बनने का सपना देखने वाले बिहार के अररिया जिले के युवाओं के लिए इससे अच्छा उपहार कोई और नहीं हो सकता था।



 
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