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कोरोना का कहर : लैंगिक समानता के लिए पैदा हो रहा बड़ा खतरा, यूनेस्को के अध्ययन से हुआ खुलासा, जानिए वजह

Sun, 21 Nov 2021 10:26 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

कोरोना का कहर : कोविड-19 महामारी के चरम पर, 190 देशों में 1.6 अरब छात्र स्कूल बंद होने से प्रभावित हुए थे। न केवल उन्होंने शिक्षा तक पहुंच खो दी, बल्कि स्कूल जाने के असंख्य लाभों को भी अद्वितीय पैमाने पर खो दिया।
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लैंगिक समानता पर खतरा - फोटो : संयुक्त राष्ट्र
दुनियाभर में वैश्विक संक्रामक महामारी कोरोना वायरस का कहर कई तरह से देखने को मिला है। लाखों लोगों की जान लीलने वाले इस कोविड-19 वायरस ने कई देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से तबाह किया। करोड़ों लोगों को बेरोजगार बनाने के साथ ही एक अरब से अधिक बच्चों को उनकी शिक्षा तक पहुंच से वंचित कर दिया है। इतनी ही नहीं, यूनेस्को के हालिया अध्ययन में अधिक गंभीर और चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। यूनेस्को की स्डटी में कहा गया है कि कोविड-19 के कारण दुनियाभर में लैंगिक समानता के लिए बड़ा खतरा पैदा हो रहा है। 

यूनेस्को के नए अध्ययन में बताया गया है कि दुनिया भर में स्कूलों के लंबे समय तक बंद रहने के कारण शैक्षिक व्यवधान न केवल सीखने के नुकसान पर खतरनाक प्रभाव डालेगा, बल्कि लैंगिक समानता के लिए भी खतरा पैदा करेगा। "When schools shut: Gendered impacts of COVID-19 school closures" शीर्षक वाला वैश्विक अध्ययन इस बात को सामने लाता है कि लड़कियों और लड़कों, युवा महिलाओं और पुरुषों को संदर्भ के आधार पर स्कूल बंद होने से अलग तरह से प्रभावित किया था।
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स्कूल बंद - फोटो : Istock
1.6 अरब विद्यार्थी स्कूल बंद होने से प्रभावित
यूनेस्को के शिक्षा प्रभाग के लिए सहायक महानिदेशक स्टेफानिया जियानिनी के अनुसार, कोविड-19 महामारी के चरम पर, 190 देशों में 1.6 अरब विद्यार्थी स्कूल बंद होने से प्रभावित हुए थे। उन्होंने न केवल शिक्षा तक पहुंच खो दी, बल्कि स्कूल जाने के असंख्य लाभों को भी अद्वितीय पैमाने पर खो दिया। जियानिनी ने कहा कि इस हद तक शिक्षा में व्यवधान का सीखने की हानि और स्कूल छोड़ने पर खतरनाक प्रभाव पड़ा है। इसके अलावा, यह स्वास्थ्य, भलाई और सुरक्षा पर प्रभाव सहित लैंगिक समानता के लिए खतरा पैदा करता है।
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प्राइमरी स्कूल - फोटो : अमर उजाला
स्टडी में 90 देशों से साक्ष्य जुटाए गए
यूनेस्को की स्टडी में लगभग 90 देशों के साक्ष्य और स्थानीय समुदायों में एकत्र किए गए गहन डाटा के आधार पर, रिपोर्ट से पता चलता है कि लिंग मानदंड और अपेक्षाएं दूरस्थ शिक्षा में भाग लेने और लाभ उठाने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीब घरों की लड़कियों के कामकाज के समय में बढ़ोतरी होने से उनके सीखने का समय बेहद कम हो गया। 

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विद्यालय में उपस्थित बच्चे। - फोटो : अमर उजाला
इन कारणों से रहे प्रभावित
इसी प्रकार, सीखने में लड़कों की भागीदारी आय-सृजन गतिविधियों द्वारा सीमित थी। इंटरनेट तक सीमित पहुंच के कारण लड़कियों को कई संदर्भों में डिजिटल रिमोट लर्निंग तौर-तरीकों में संलग्न होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जैसे- सक्षम उपकरण, डिजिटल कौशल की कमी और तकनीकी उपकरणों के उपयोग को प्रतिबंधित करने वाले सांस्कृतिक मानदंड आदि। अध्ययन में कहा गया है कि डिजिटल लिंग-विभाजन कोविड-19 संकट से पहले से ही एक चिंता का विषय था।
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प्राथमिक स्कूल - फोटो : अमर उजाला
पाकिस्तान में केवल 14 फीसदी लड़कियों के पास मोबाइल
वैश्विक रिपोर्ट में बांग्लादेश और पाकिस्तान पर गहन अध्ययन ने स्कूल बंद होने के दौरान दूरस्थ शिक्षा पर इसके लिंग संबंधी प्रभावों का खुलासा किया। पाकिस्तान के अध्ययन में, भाग लेने वाले जिलों में केवल 44 प्रतिशत लड़कियों ने अपने निजी इस्तेमाल के लिए मोबाइल फोन रखने की सूचना दी, जबकि 93 फीसदी लड़कों ने ऐसा किया। जिन लड़कियों के पास मोबाइल फोन नहीं था, उन्होंने बताया कि वे अपने रिश्तेदारों के उपकरणों पर भरोसा करती हैं, आमतौर पर उनके पिता के उपकरणों पर।
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विद्यार्थियों का स्वागत - फोटो : संवाद
लड़कियों के कथित रोमांटिक रिश्तों का डर
जबकि कुछ लड़कियां परिवार के सदस्यों के फोन का उपयोग करने में सक्षम थीं, हालांकि, वे हमेशा ऐसा करने में सक्षम नहीं थीं। उनकी पहुंच प्रतिबंधित थी क्योंकि कुछ माता-पिता चिंतित थे कि लड़कियों को स्मार्टफोन तक पहुंच प्रदान करने से दुरुपयोग होगा और इसके परिणामस्वरूप रोमांटिक रिश्ते हो सकते हैं। इसमें कहा गया है, लड़कियां जितनी लंबे समय स्कूल से बाहर थीं, सीखने के नुकसान का खतरा उतना ही अधिक था। 
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छात्र-छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
10 फीसदी पढ़ाई भी नहीं की
लड़कियों ने रिपोर्ट किया कि अप्रैल से सितंबर 2020 तक उन्होंने 1 से 10 प्रतिशत पढ़ाई भी नहीं की थी। रिपोर्ट में लिंग-आधारित बाधाओं को चुनौती देने के बारे में कई सिफारिशें हैं। यह देखते हुए कि महामारी एक समय पर याद दिलाने वाली है कि स्कूल न केवल सीखने के लिए स्थल हैं, बल्कि लड़कियों और लड़कों के लिए जीवन रेखा भी हैं, जो उनके स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षा के लिए एक आवश्यक स्थान है। 
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