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किसी भी मां को रुला देने वाला है दिल्ली का ये सच

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दिल्ली सरकार के उन अस्पतालों के खोखली सच्चाई का खुलासा एक आरटीआई के माध्यम से हुआ है। इस आरटीआई की मानें जिंदगी देने के लिए विश्व स्तरीय सुविधाओं का दावा करने वाले अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों की जिंदगी खतरे में है।

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इस आरटीआई में पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि 12 से 15 फीसदी बच्चों की इन अस्पतालों में मौत हो गई जिन्हें बाल चिकित्सा या शिशु से संबंधित आईसीयू वॉर्ड्स में भर्ती किया गया।
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कुछ मामलों में मृत्यु दर का ये आंकड़ा 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

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19 केन्द्रीय और दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की ये सच्चाई वाकई खौफनाक है कि पिछले पांच सालों में इन अस्पतालों में 34000 बच्चों ने दम तोड़ दिया।

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केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत आने वाले सफदरगंज अस्पताल की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। 5 सालों के आंकड़ो में अस्पताल के NICU में 4288 मौतें हुई हैं, तो वहीं PICU में 6108 नई जिंदगियां खत्म हो गई हैं।
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एसआरएस के मुताबिक दिल्ली में हर साल शिशु मृत्युदर 1000 बच्चों के जन्म लेने पर 24 का है। 1 से पांच साल की उम्र में जिन बच्चों की मौत हुई है उनमें ज्यादातर डाइरिया, निमोनिया, सेप्टीसीमिया, सेप्सिस जैसी बीमारियों मौत की वजह बनी हैं।
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दिल्ली सरकार के एक अफसर के मुताबिक सारी सुविधाओं से लैस होने के बावजूद इस तरह के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में जन्म लेने वाले बच्चों की 5499 मौतें हुई हैं।
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कुछ जगह वेन्टीलेटर सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं तो कहीं के अस्पतालों में प्रबंधक के हालात बेहत खराब हैं। इनमें पिछले काफी समय से सुविधाओं के बढ़ावा देने के लिए ध्यान नहीं दिया गया।ध्यान नहीं दिया गया तो हालात बद से बदतर हो सकते हैं।
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