अरुण जेटली का निधन होने से यूं तो हर देशवासी गमगीन है, लेकिन उनके पड़ोसियों को शायद उनकी सबसे ज्यादा कमी खलेगी। दरअसल अपने स्वभाव मिलनसारिता के कारण जेटली पड़ोसियों के दिलों में बसते थे। आज उन्हें जेटली की सबसे ज्यादा कमी महसूस हो रही है। जरूरत पर सिर्फ और सिर्फ उन्हें जेटली का ही सहारा था।
Trending Videos
विज्ञापन
2 of 5
अरुण जेटली का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
श्रद्धांजलि देने के लिए पड़ोसियों की कतार भी काफी लंबी थी। पहले चांदनी चौक फिर नारायणा विहार और अंत में कैलाश कॉलोनी तक इस पूरे सफर में हजारों लोग जेटली परिवार से जुड़ते चले गए। नारायणा विहार स्थित पुराने पड़ोसी आज भी उन्हें उतना ही मानते है जितना पड़ोस में रहने पर सम्मान देते थे।
विज्ञापन
3 of 5
फाइल फोटो
इन्हीं में से एक सतीश मल्होत्रा ने बताया कि जेटली के राजनीतिक करियर की शुरुआत नरायणा विहार, ई ब्लॉक के मकान नंबर 265 से हुई थी। उस वक्त वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुआ करते थे। इसी मकान में रहकर उन्होंने कानून की पढ़ाई की। वे बताते हैं कि उनके परिवार और अरुण जेटली के पिता ने एक साथ वर्ष 1970 में नाराणया विहार में आकर प्लॉट लिया था। साथ-साथ घर बनवाया।
4 of 5
फाइल फोटो
जेटली की मां धार्मिक महिला थीं। उन्होंने सनातन धर्म मंदिर में काफी सेवा की। जेटली 1970 से 2000 तक इसी मकान में रहे। सतीश ने बताया कि जेटली क्रिकेट के काफी शौकीन थे। पड़ोसियों के साथ मिलकर वे हर रोज क्रिकेट खेला करते थे।
जब नारायणा विहार वाला घर बेचा तो उसका पैसा जेटली ने अपनी दोनों बहनों में बराबर बांट दिया। जेटली से मिलने कोई भी उनके पास जाता तो वह सभी पड़ोसियों के बारे में न सिर्फ पूछते थे, बल्कि कई लोगों को फोन लगाकर उनसे हालचाल भी लेते थे। उनमें पड़ोसियों को हमेशा एक मार्गदर्शक दिखाई देता था।