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14 दिन में 12 बच्चों की मौत मामला, सामने आई ऐसी हकीकत, जानकर पैरों तले खिसक गई जमीन

Fri, 21 Sep 2018 06:07 AM IST
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अस्पताल में भर्ती बच्चा - फोटो : अमर उजाला
महर्षि वाल्मीकि अस्पताल में दो सप्ताह के दौरान हुई 11 बच्चों की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इनकी पड़ताल करने पर सामने आई हकीकत चौंकाने वाली है। दरअसल अस्पताल में गलघोंटू (डिप्थीरिया) का टीका चार माह से उपलब्ध नहीं है। यहां आने वाले मरीजों से बाहरी दुकानों से टीका मंगाया जाता है। कई बार आर्थिक रूप से कमजोर मरीज के परिजन टीका नहीं खरीद पाते। 6 से 19 सितंबर के बीच हुई बच्चों की मौत पर उनके परिजनों का कहना है कि अस्पताल में काफी लापरवाही बरती जाती है।
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अस्पताल में भर्ती बच्चा - फोटो : अमर उजाला
सूत्रों की मानें तो अस्पताल में दवाएं भी पर्याप्त मात्र में नहीं हैं। अस्पताल में इस समय कई बच्चे गंभीर अवस्था में भर्ती हैं और उन्हें तत्काल दवाओं की जरूरत है। वहीं अस्पताल के पास स्थित एक कॉलोनी के आरडब्ल्यूए अध्यक्ष अमर सिंह ने बताया कि इस अस्पताल में कई माह से गलघोंटू का टीका नहीं है। इसके अभाव में आए दिन यहां बच्चों की मौत हो जाती है। अस्पताल में न मरीज को पानी मिलता है और न ही अन्य सुविधाएं। दवाएं तक नहीं हैं। यहां पर एंबुलेंस और ऑपरेशन थियेटर तक नहीं है। 
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कसौली से टीके की सप्लाई बंद

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डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाई - फोटो : अमर उजाला
सूत्रों ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के कसौली से गलघोंटू बीमारी का टीका यहां सप्लाई होता है। यहां केंद्र सरकार का ही एक संस्थान है, लेकिन चार माह से टीका सप्लाई नहीं हुआ है। घोड़े के रक्त से बनने वाले इस टीके की मांग ज्यादा है। हालांकि हरेक निजी दुकानों में ये उपलब्ध नहीं है।

पांच टीके लगते हैं बच्चे को

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अस्पताल का ऑपरेशन थियेटर - फोटो : अमर उजाला
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुशील गुप्ता ने बताया कि जन्म के बाद बच्चे को पांच टीके लगाए जाते हैं। बारिश के दिनों में गलघोंटू बच्चों के शरीर में सक्रिय होता है। दिल से लेकर दिमाग तक ये वायरस कहीं भी पहुंच जाता है। टीकाकरण अगर समय पर हो, तो बच्चों को बचाया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से भी इसकी शिकायत की गई है। उन्होंने ये भी बताया कि इस माह के आखिर में टीका कसौली से मिल सकता है।
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10 साल मरीजों पर शोध किया

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डॉ. सुशील गुप्ता का कहना है कि 10 साल मरीजों पर शोध किया है। इस दौरान कुछ बच्चे ऐसे लिए, जिन्हें एंटी डिप्थीरिया सीरम दिया गया, जबकि कुछ को नहीं दिया गया। दोनों के ही परिणाम समान आए हैं। इससे साबित होता है कि सीरम या टीका गलघोंटू होने के बाद कामयाब नहीं होता। इसे शुरुआत में ही रोक सकते हैं, लेकिन उनके पास जितने भी मरीज आते हैं, उनकी तबियत पहले से ही खराब होती है। गले में दर्द, बुखार, सांस लेने में तकलीफ और रक्त प्रवाह इसके लक्षण हैं।       
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ज्यादातर बच्चों का हार्ट फेल

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सूत्रों ने बताया कि चार वर्षों के दौरान अस्पताल में ज्यादातर बच्चों की मौत गलघोंटू के बाद हार्ट फेल होने से हुई है। सहारनपुर, मुज्जफरनगर, नूंह, मेरठ, बागपत और बड़ौत आदि इलाकों से यहां बच्चे इलाज के लिए आते हैं।

सरकार का सुस्त रवैया
अस्पताल की पड़ताल में सबसे बड़ी कमी गलघोंटू बीमारी की दवाएं मौजूद न होना पाया गया। डॉक्टरों की मानें तो इसके पीछे सरकार का सुस्त रवैया है। बीमारी की भयावहता जानने के बाद भी सरकार दवाओं के विकल्प पर निर्णय नहीं लेती।
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