आसमान से झुलसा देने वाली गर्मी में न जाने कितने परिजन अभी भी सुबह से दोपहर और देर शाम तक अपनों के जीने मरने की जानकारी पाने के लिए एक से दूसरे अस्पतालों में भटक रहे हैं। ऐसे ही सुनीता हैं, जिनकी भांजी जशोदा का कुछ पता नहीं चल रहा है। रविवार को वह भरी दोपहर में संजय गांधी अस्पताल की मोर्चरी के सामने बैठकर बुदबुदा रही थीं। इनसे बात हुई, तो बहते आंसुओं के साथ उन्होंने कहा, कुछ ही क्षणों की बात थी, शीशा तोड़कर वह दूसरी मंजिल से न कूदी होतीं, तो जलकर राख हो गई होतीं।
मुंडका की आग वाली बिल्डिंग में सुनीता अंदर ही फंसी थीं। इस बिल्डिंग में केमिकल का काम होता था, वहीं पर वो नौकरी करती थीं। बड़ी देर तक सांत्वना देने के बाद उन्होंने उस भयावह मंजर को यादकर सुनाया। जब आग लगी तो वह तीसरी मंजिल पर थीं। निचली मंजिल पर आग लगने का शोर मचा, तो वह बाकी लोगों के साथ भागकर दूसरी मंजिल पर आईं। साथ में उनकी भांजी जशोदा भी थी।