उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में ऐसा शिवलिंग मौजूद है, जिस पर दुधारू गाय अपना दूध खुद चढ़ाती थी। भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक इस शिवलिंग को श्री मल्लिकार्जुन के नाम से जाना जाता है।
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mallikarjun temple askot
ज्योतिर्लिगों में मल्लिकार्जुन का स्थान दूसरा है। मल्लिका मां पार्वती और अर्जुन यानी शिव हैं। अस्कोट की अगंलेख की पहाड़ी पर स्थित श्री मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर उसी का एक अंश है।
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यह धार्मिक स्थल भारत के सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों का ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के लोगों का भी आस्था का केंद्र है। अस्कोट बाजार से करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित अगंलेख की पहाड़ी के शीर्ष पर निर्मित इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक रोचक कथा से जुड़ी है।
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मान्यता है कि 19वीं शताब्दी के मध्य में चमलेख की गायें इस पहाड़ी पर चरने जाया करती थीं। उनमें से एक दुधारू गाय रोज चुपके से एक जगह पर जाकर अपना दूध स्वयं चढ़ाया करती थी। ग्वाले की नजर एक दिन इस पर पड़ी तो वह आश्चर्यचकित रह गया।
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उसने देखा कि वहां एक स्वयं प्रस्फुटित शिवलिंग था। जिस पर गाय दूध चढ़ा रही थी। ग्वाले के माध्यम से इस आश्चर्यजनक घटना की खबर के बाद लोग यहां पूजा करने लगे।
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस शिवलिंग के अभिषेक और दर्शन से सभी दुख दूर हो जाते हैं। मलिल्कार्जुन की पूजा से संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है। अस्कोट रियासत के तत्कालीन राज परिवार द्वारा इस घटना के बाद नेपाल शिखर नामक पहाड़ी पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया। तब से यह मंदिर भारत और नेपाल के लोगों की आस्था का केंद्र बन गया।