सामान्य रूप से एकांत में रहने वाली टिड्डियां अनुकूल वातावरणीय दशाओं व भोजन की प्रचुरता पर समूह में रहने लगती हैं।
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- फोटो : अमर उजाला।
समूह में होने पर ये टिड्डी दल बहुभक्षी हो जाता है। साथ ही तमाम वनस्पतियों को खा जाता है। एक मादा टिड्डी अंडों को अंड समूह में बलुई भूमि की सतह से 15 सेंटीमीटर नीचे देती है।
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- फोटो : अमर उजाला।
फसल लगने से पूर्व मेढ़ों की कटाई-छटाई द्वारा टिड्डियों के अंडों को धूप व परभक्षियों के लिए खोलना एवं स्थानीय क्षेत्रों में जुताई द्वारा टिड्डियों के अंडों को नष्ट किया जा सकता है।
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- फोटो : अमर उजाला।
टिड्डियां दो-तीन अंड समूहों में 100 अंडे प्रति समूह देती है। मृदा भृंग, फफोला भृंग गिडार, चीटियों और झिगुरां द्वारा अंडों का भक्षण किया जाता है।
अंडे से निकल कर शिशु समूह बनाते हैं एवं हरी वनस्पतियों पर आक्रमण करते हैं। टिड्डियां सर्वप्रथम छोटी घासों को खाती है। इसके बाद फसलों में स्थानांतरित हो जाती है।