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Kargil Vijay Diwas: शहीदों की यादों पर जमी उपेक्षा की धूल, कहीं शिलापट गायब तो कहीं निशान तक मिट गए

Sun, 26 Jul 2020 10:11 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून में शहीद द्वार - फोटो : अमर उजाला
आज (26 जुलाई) कारगिल विजय दिवस (शौर्य दिवस) है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी देश की आन-बान-शान बनाए रखने के लिए अपनी शहादत देने वालों की वीरता को नमन किया जाएगा। लेकिन, देहरादून में शहादत की स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए जगह-जगह जो शिलापट लगाए गए हैं, जिन सड़कों का नामकरण शहीदों के नाम पर किया गया है आज उनकी हालत बदहाल है। कहीं शिलापट गायब हैं तो कहीं इनके निशान मिट गए हैं। शहादत की इस उपेक्षा पर न तो प्रदेश सरकार और न प्रशासन ध्यान दे रहा है।
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देहरादून में शहीद द्वार - फोटो : अमर उजाला
देहरादून के वीर सपूत मेजर विवेक गुप्ता, स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर, राइफल मैन विजय भंडारी, नायक मेख गुरंग, राइफल मैन जयदीप भंडारी, राइफल मैन नरपाल सिंह, सिपाही  राजेश गुरंग, नायक हीरा सिंह, नायक कश्मीर सिंह, नायक देवेंद्र सिंह, लांस नायक शिवचरण सिंह आदि जवान कारगिल युद्ध में दुश्मनों का लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। तत्कालीन सरकार ने कारगिल युद्ध के शहीदों के नाम पर बल्लीवाला चौक, बल्लूपुर चौक, न्यू कैंट रोड, चांदमारी, तुनवाला चौक, श्यामपुर, प्रेमनगर, तेलपुर, नेहरूग्राम, कैनाल रोड, चाय बागान सहित कईं स्थानों पर सड़कों का नामकरण किया था। 
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देहरादून में शहीद द्वार - फोटो : अमर उजाला
इन सड़कों को इंगित करने के लिए सड़क किनारे संगमरमर के शिलापट लगाए गए थे, लेकिन अब गायब हैं। कहीं बदहाल हैं तो कहीं शिलापटों के आगे झाड़ियां उगी हैं। इनके आगे कूड़ा फेंककर शहादत का अपमान किया जा रहा है। इतना ही नहीं शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी जो कारगिल शहीदों के नाम से न जानी जाती हो। सरकारी फाइलों में भी अभी तक सड़कों के पुराने नाम अंकित हैं। राजधानी में जहां पूरा सरकारी अमला मौजूद है, वहीं शहादत का इस प्रकार अपमान हो रहा है तो अन्य जगह क्या हाल होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।  

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देहरादून में शहीद द्वार - फोटो : अमर उजाला
कारगिल युद्ध के शहीदों के परिजनों के लिए केंद्र और सभी राज्य की सरकारों ने बड़े-बड़े वायदे किए थे। 21 साल गुजर चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार की ओर से किए वादे अब तक फाइलों में कैद हैं। कारगिल शहीदों के लिए लड़ाई लड़ रहे केशर जन कल्याण समिति के अध्यक्ष एडवोकेट एनके गुसाईं ने कहा कि जिन सीमाओं के प्रहरियों के बदौलत हम चैन की नींद सोते हैं, उनकी शहादत के दो दशक बाद भी सरकारों ने उनके सम्मान में की घोषणाएं धरातल पर नहीं उतारी। 
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देहरादून में शहीद द्वार - फोटो : अमर उजाला
वादे जो रह गए अधूरे
-शहीद परिवार को शहरी क्षेत्र में मकान के लिए प्लाट या ग्रामीण क्षेत्र में पांच बीघा कृषि भूमि जिलाधिकारियों द्वारा आवंटित करना। 
-शहीद के घर को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग का नामकरण शहीद के नाम पर करना।
-नजदीकी शिक्षण संस्था का नामकरण शहीद के नाम पर करना।
-सैनिक अस्पताल के साथ ही सभी अस्पतालों में निशुल्क दवा और इलाज कराना।
-शहीदों के आश्रितों को ग्रीन कार्ड पर उचित मान सम्मान देना। 
- निजी स्कूलों में शहीदों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना।
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