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Joshimath Sinking: जोशीमठ भू-धंसाव का ये कारण तो नहीं? 10 तस्वीरों के साथ जानिए डूबते शहर की कहानी

Thu, 05 Jan 2023 04:17 PM IST
रेनू सकलानी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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जोशीमठ में घरों पर पड़ी दरारें - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड का जोशीमठ शहर को लेकर हर तरफ चिंता है। उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट सिनोप्सिस (उदास) की रिपोर्ट के अनुसार, जोशीमठ में 500 घर रहने के लायक नहीं हैं। अब पीएमओ भी मामले की निगरानी कर रहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जोशीमठ में यह स्थिति आई कैसे? 

जोशीमठ नगर प्राचीन, आध्यात्मिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है लेकिन नगर के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। नगर में जगह-जगह से हो रहा भू-धंसाव लगातार बढ़ता जा रहा है संयुक्त मजिस्ट्रेट दीपक सैनी ने बताया कि जोशीमठ भू-धंसाव पर पीएमओ से भी जानकारी मांगी गई है। पीएमओ से भी मामले की मॉनिटरिंग की जा रही है।

वहीं जोशीमठ नगर में हो रही सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई है। थाना प्रभारी कैलाश चंद भट्ट का कहना है कि ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के निर्देश के अनुपालन में नगर में हो रही निजी निर्माण कार्य को बंद करने का आदेश जारी किया गया है। जोशीमठ में भू-धंसाव का कारण बेतरतीब निर्माण, पानी का रिसाव, ऊपरी मिट्टी का कटाव और मानव जनित कारणों से जल धाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में रुकावट को बताया गया। 
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जोशीमठ में घरों पर पड़ी दरारें - फोटो : अमर उजाला
नगर पालिका की रिपोर्ट के अनुसार गांधीनगर वार्ड में 133, मारवाड़ी में 28, नृसिंह मंदिर के पास 24, सिंहधार में 50, मनोहर बाग में 68, सुनील में 27, परसारी में 50, रविग्राम में 153 और अपर बाजार वार्ड में 26, मकानों में दरारें आई हैं। यह क्षेत्र जोशीमठ से तपोवन के बीच के है। इस हिस्से में रैणी आपदा भी आई थी।
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घर पर पड़ी दरार - फोटो : अमर उजाला

 रैणी आपदा के कारण यह क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस आपदा को यहां के लोग भूले नहीं हैं। यहां परियोजना निर्माण कार्य भी चल रहा है। 
 

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दरारें - फोटो : अमर उजाला
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय के मिजाज को बिगाड़ रहा है। साल दर साल आने वाली अप्रत्याशित आपदाएं डरा रही हैं। बीते कुछ सालों की घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि कैसे बेमौसम की बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण हिमालयी क्षेत्र को बड़ी त्रासदी से गुजरना पड़ा है।
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दरारें - फोटो : अमर उजाला
बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में गर्मी, गर्मियों में तेज बारिश और मानसून बीतने के बाद आई आपदा ने राज्य के लाखों लोगों को प्रभावित किया। सैंकड़ों गांव विस्थापन की मांग कर रहे हैं। बेमौसमी बारिश और आपदा से राज्य को करोड़ों का नुकसान हुआ है। बागवान से लेकर किसान तक इससे प्रभावित हुए हैं।
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लोगों ने किया विरोध - फोटो : अमर उजाला
  • इतिहास में दर्ज हो गई वर्ष 2021 की रैणी आपदा 
    वर्ष 2021 में फरवरी माह में रैणी आपदा भी एक अप्रत्याशित घटना थी। जल प्रलय में 206 लापता हो गए थे, इनमें से अब तक 176 के शव बरामद हो चुके हैं। जबकि 50 से अधिक लोग लापता हैं। इस आपदा से 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। चमोली आपदा के बाद तमाम विज्ञानियों ने यह भी बताया कि ऋषिगंगा कैचमेंट से निकली जलप्रलय महज एक घटना नहीं, बल्कि इसमें कई घटनाक्रम शामिल थीं।
 
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लोगों में आक्रोश - फोटो : अमर उजाला
  • वाडिया संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, करीब 5600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रौंथी पर्वत से जब हिमखंड टूटा तो नीचे रौंथी गदेरे (ऊंचाई समुद्र तल से 3800 मीटर) तक पहुंचते हुए मलबे का वेग 55 मीटर प्रति सेकेंड था।
  • इसके बाद प्राकृतिक आपदाओं के लिए सर्वाधिक संवेदनशील उत्तराखंड राज्य में एक राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोले जाने की सिफारिश की गई थी। 

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चक्काजाम - फोटो : अमर उजाला
  • इसके अलावा बीते दिनों कैबिनेट ने राज्य में उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (यूएलएमएमसी) खोले जाने का प्रस्ताव पास किया है। 
  • रैंणी आपदा के बाद एनडीएम ने भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीटयूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी व जशक्ति व खान मंत्रालय के साथ मिलकर एक अध्ययन कराया था। रिपोर्ट में हिमालय क्षेत्र में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के लिए अध्ययन करने की सलाह दी गई है। ऊर्जा मंत्रालय से कहा गया है कि हिमालय में बहुत सी जल विद्युत परियोजनाएं पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील हैं।

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जोशीमठ में लोगों का प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला
  • रैंणी आपदा की वजह ग्लेशियरों के टूटने की मानी गई। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया कि नदियों के उद्गम स्थलों व ग्लेशियर क्षेत्रों  में उपग्रहों (सेटेलाइट) से निगरानी को बढ़ाया जाए। इसके लिए इसरो देश से बाहर दूसरी एजेंसियों का भी सहयोग ले सकता है। साथ ही ऊंचाई वाले स्थानों पर हाइड्रो मेट्रोलॉजिकल स्टेशन भी बनाए जाएं।
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जोशीमठ में लोगों का प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला
रिपोर्ट में ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए सेंटर फॉर ग्लेशियल रिसर्च स्टडीज एंड मैनेजमेंट की स्थापना की जरूरत बताई गई। साथ ही कहा गया कि ग्लेशियोलॉजी व ग्लेशियर अध्ययन करने वाले अकादमिक व शोध संस्थान अलग-अलग होकर काम करने के बजाय एक दूसरे को आंकड़ों और अध्ययन को साझा करें और इसके दोहराव से बचें।
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