क्या है कांवड़ यात्रा का इतिहास, ये यात्रा सावन के महीने में ही क्यों की जाती है। दरअसल, भगवान शिव को कष्ट से मुक्ति देती है ये यात्रा। जानिए पूरी बातें सिलसिलेवार...
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history of kanwar yatra
10 जुलाई से कांवड़ यात्रा शुरू हो गई है। ये यात्रा सावन के महीने में शुरू की जाती है। इसके पीछे हजारों वर्ष पहले हुई समुद्रमंथन की घटना है। जिसके बाद ये सबकुछ हुआ। आगे जानिए...
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history of kanwar yatra
समुद्रमंथन के दौरान निकले हलाहल विष को पीने के बाद भगवान शिव का गला नीला हो गया था। साथ ही उनके शरीर में कई नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगे थे। ऐसे में देवता चिंतित हो उठे।
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history of kanwar yatra
चिंतित देवताओं ने आपस में सहमति के बाद एक हल निकाला और पवित्र और शीतलता का पर्याय गंगा जंल शिव के शरीर में चढ़ाना शुरू किया।
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lord shiva symbol image
कुछ ही समय में देवताओं की मेहनत रंग लाई और शिव का शरीर सामान्य होने लगा। इसी कार्य को आगे बढ़ाते हुए कांवड़िये हरिद्वार से गंगा जल लेकर नीलकंठ महादेव में चढ़ाते हैं। यह यात्रा सदियों से चली आ रही है। आगे, जानिए सबसे पहले कौन लाया था कांवड़।
मान्यता है कि सबसे पहले भगवान शिव के परमभक्त परशुराम ने सबसे पहली कांवड़ उठाई थी। उन्हें पहला कांवड़ भी माना जाता है। (इन तथ्यों की अमर उजाला तस्दीक नहीं करता है। यह सिर्फ मान्यताओं पर आधारित है।)