कोई हिमालय को इस कदर भी प्यार कर सकता है कि अपने घर को ही ‘हिमालय’ बना दे? इस सवाल का जवाब जानना है तो इसके लिए आपको मसूरी (देहरादून) आकर शुक्ला दंपति से मिलना पड़ेगा।
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himalaya
इनके घर से आपको साक्षात हिमालय के दर्शन ही नहीं होते, 1947 से पहले का हिमालय कैसा था, उसके जवाब भी मिलते हैं। इसके अलावा गढ़वाल और कुमाऊं की कला-संस्कृति, खान-पान, गीत-संगीत, पहनावा और हर वो चीज जो अब विलुप्ति के कगार पर है, आपको यहां देखने, छूने और महसूस करने को मिल जाती है।
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house
1996 में समीर शुक्ल और पत्नी डॉ. कविता शुक्ला हिमालय दर्शन को निकले तो यहीं के होकर रह गए। बिना कुछ सोचे कस्टम में अधिकारी पद से इस्तीफा दे दिया। लखनऊ का मकान बेचकर मसूरी में एकांत में स्थान पर एक छोटा सा मकान बना लिया। जो आज एक बड़े हेरिटेज एंड आर्ट सेंटर के रूप में विकसित हो चुका है।
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house
हिमालय से जुड़ी हर चीज को उन्होंने यहां खुद अपने हाथों बड़े सलीके से सजाया है। समीर शुक्ल गढ़वाल-कुमाऊं की संस्कृति को संजोने का काम करते हैं तो पत्नी कविता पेंटिंग पर उसे आकार देती हैं। आइये आपको बताते हैं क्यों खास है, शुक्ला दंपति का यह छोटा सा घर।
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फोटो गैलरी: घर के एक हिस्से में बनी हालनुमा गैलरी में आपको 1947 से पहले के हिमालय से जुड़े चित्र देखने को मिलते हैं। जिनमें लद्दाख, तिब्बत, भूटान, नेपाल, उत्तराखंड, हिमाचल से लेकर गोरखा तक के रहन-सहन, वेशभूषा और खानपान की जानकारी मिलती है। आजादी से पहले के चारधाम और कई विलुप्त मूर्तियों के चित्र भी यहां उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं अंग्रेजों के जमाने से लेकर अब तक मसूरी के विकास की यात्रा भी आपको चित्रों के माध्यम से यहां देखने को मिलती है। हिमालय से निकलने वाली कौन सी नदी किस ग्लेशियर से निकलती है, उसके मुहाने के चित्र भी आपको महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
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पेंटिंग गैलरी: डॉ कविता शुक्ला और समीर शुक्ल द्वारा हिमालय को पेंटिंग के माध्यम से भी प्रस्तुत करने का प्रयास बखूबी किया गया है। इसमें गंगा के उद्गम की परिकल्पना और मां नंदा देवी के साथ राजजात की पेंटिंग विशेष तौर पर आकर्षित करती हैं। चौसिंघा खाडू और नंदा की विदाई को पेंटिंग में एक सीरीज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
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टोपियों के जरिए हिमालय का वर्गीकरण: हिमालय परिक्षेत्र में वेशभूषा के अलावा यहां पहनी जाने वाली टोपियां भी भिन्न होती हैं। गैलरी के एक हिस्से में टोपियों के जरिए हिमालय का वर्गीकरण किया गया है। गैलरी में लद्दाख, कश्मीर, कल्हू-किनौर, सिक्किम, भूटान, उत्तराखंड, नेपाल, डार्जिलिंग और गोरखाओं द्वारा पहनी जानी वाली टोपियों को प्रस्तुत किया गया है।
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temple
108 किलो को घंटा: घर के हिस्से में शिव शक्ति मंदिर की स्थापना की गई है। मंदिर के हिस्से में लगा 108 किलो का घंटा आकर्षित करता है। इसके अलावा घर के दीवारों के प्रत्येक हिस्से में उत्तराखंड की धरोहर पुरानी मूर्तियों को हूबहू उकेरा गया है। पुरातत्व महत्व की कई मूर्तियां भी यहां सुसज्जित की गई हैं।
संयुक्त गैलरी: इस गैलरी में गढ़वाल-कुमाऊं को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यहां मौजूद साजो-सामान में ढोल-ढमाऊ के अलावा हुड़का, नगाड़ा नरसिंघा, तुरतरी, भंखोरा, डोरथाली विशेष हैं। इसके अलावा माणा (आधा किलो), नाली (एक किलो), और पाथा (दो किलो) जो अब प्राय: विलुप्त हो गए हैं, यहां सलीके से सजाए गए हैं। रौड़ी-पलौड़ी, सिलबट्टा, उख्यारी, संदूक, कुठार, हलसुंघा, जूआ से लेकर खेत-खलियानों में इस्तेमाल किए जाने वाले तमाम औजार भी यहां मौजूद हैं। उत्तराखंड की खास पहचान टिमरु, पद्म, भोजपत्र, रुद्राक्ष, स्फटिक और पारद शिवलिंग भी आपको यहां देखने को मिलेंगे। यहां तक कि पंडों की पौथियां भी गैलरी में मौजूद हैं।