गंगोत्रीधाम आने वालों सैलानियों और श्रद्धालुओं को अब गोमुख के दर्शन न होने के साथ गंगोत्री ग्लेशियर की भी वो रंगत नहीं दिखेगी। इस बदलाव से वैज्ञानिक भी सकते में हैं।
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144 वर्ग किमी में फैले कभी लुभावने नीले रंग के दिखने वाले गंगोत्री ग्लेशियर का रंग अब प्रदूषण के कारण काला पड़ रहा है। इसकी सतह पर कार्बन और कचरे की काली पर्त जम गई है।
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इसके साथ ही ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ने से गढ़वाल हिमालय का यह सबसे बड़ा ग्लेशियर 18 मीटर प्रति वर्ष की गति से सिकुड़ता जा रहा है।
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गंगा का उद्गम होने की वजह से गंगोत्री ग्लेशियर लोगों की आस्था का केंद्र है। लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के कारण ग्लेशियर का मुहाना गोमुख पहले ही बह चुका है और अब इस ग्लेशियर के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
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ग्लेशियर के मुहाने को प्रदूषण और कचरे की काली पर्त ने ढक लिया है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के ग्लेशियर स्टडी सेंटर के वैज्ञानिक ग्लेशियर की स्थिति देखकर लौटे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर की माइक्रो क्लाइमेट में तेजी से बदलाव आ रहा है।
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ग्लेशियर पर खतरे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2002 में यहां 24 फुट बर्फबारी रिकार्ड की गई थी और 2015 में सिर्फ 24 सेंटीमीटर बर्फबारी हुई है। गंगोत्री ग्लेशियर समुद्र तल से 3950 मीटर ऊंचाई पर है। जून, 2015 में ग्लेशियर का 40 मीटर हिस्सा टूटा था, जिसके टुकड़े गंगोत्रीधाम में पाए गए।
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वैज्ञानिकों को ग्लेशियर मानव मल और कचरा भी फैला हुआ मिला। तपोवन जाने का रास्ता ग्लेशियर के मुहाने से होकर जाता है। सैलानी ग्लेशियर पर कचरा फैला देते हैं। विज्ञानियों को आशंका है कि अगर प्रदूषण और तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो ग्लेशियर की स्थिति और बिगड़ेगी। काले पड़ने का मतलब है कि ग्लेशियर लगातार पिघल रहा है।
ग्लेशियर के मुहाने से तपोवन का रास्ता बंद करके भागीरथी पर पुल बनाकर भोजावासा से तपोवन का रास्ता बनाया जा सकता है। यहां पुल पहले से प्रस्तावित भी है। गंगोत्री ग्लेशियर के पानी के सैंपल लिए गए हैं। इनकी जांच से पता चलेगा कि ग्लेशियर क्षेत्र में बर्फबारी का स्रोत इंडियन समर मानसून है या पश्चिमी विक्षोभ। ग्लेशियर का रंग काला पड़ रहा है। इससे बिगड़ती स्थिति और माइक्रो क्लाइमेट में बदलाव पता चल रहा है।
- डॉ. समीर तिवारी, गंगोत्री प्रभारी, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान