उत्तराखंड को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता है। यहां हमेशा से ही देवी देवताओं की सत्ता चलती रही है। यहां स्थित चारों धामों की कई ऐसी रोचक बाते हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी।
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आपको पता है कि बदरीनाथ धाम की मूर्ति किस तरह से स्थापित हुई थी और उसकी पूजा किस तरह से की जाती है। तो चलिए हम आपको विश्वविख्यात तीर्थ बदरीनाथ धाम के बारे में कुछ ऐसी ही रोचक बाते बताते हैं।
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कहा जाता है कि बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई है। यह मूर्ति चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की।
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शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। तब शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। इसके बाद मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
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बदरीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय की उपत्यका में अवस्थित हिन्दुओं का मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।
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आपको जानकार हैरानी होगी कि बद्रीनाथ में जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन रावल साड़ी पहन कर पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके बाद पूजा अर्चना होती है और तभी कपाट खोले जाते हैं।
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इस मान्यता की वजह से ही पहाड़ में रावल को लोग भगवान की तरह पूजते हैं। वे उन्हें पार्वती का रूप भी मानते हैं। पहाड़ में जो लोग रावल को नहीं पूजते हैं उन्हें अच्छा नहीं माना जाता है।
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इसलिए बद्रीनाथ के दो और नाम दिए गए हैं। बदरीनाथ एवं बद्रीविशाल। जानकारों के मुताबिक बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी(बैर) के जंगल थे, इसलिए इस क्षेत्र में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ की संज्ञा प्राप्त हुई।
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बद्रीनाथ धाम में पुजारी केरल के ब्राह्मण होते हैं। मंदिर में पूजा करने का अधिकार सिर्फ़ इन्हें ही होता है। हिमालय के मंदिर में सुदूर दक्षिण के पुजारी को नियुक्त करने की ये परंपरा शंकराचार्य ने डाली थी जो आज तक अबाध रूप से चली आ रही है।
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केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मणों में से रावल का चयन बद्रीनाथ मंदिर समिति ही करती है। इनकी न्यूनतम योग्यता ये है कि इन्हें वहां के वेद-वेदांग विद्यालय का स्नातक और कम से कम शास्त्री की उपाधि होने के साथ ब्रह्मचारी भी होना चाहिए।
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साल के छह महीने जब भारी हिमपात के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं तब रावल वापस अपने घर केरल चले जाते हैं और कपाट खुलने की तिथि आते ही वापस बद्रीनाथ आ जाते हैं।
यहां एक कुंड है जिसमें हमेशा गर्म पानी आता रहता है। देखने में ये पानी खौलता हुआ दिखाई देता है लेकिन छूने पर यह बहुत ही कम गर्म होता है। लोग इसें स्नान करने के बाद ही बदरी नाराण की पूजा करते हैं।