दोस्तों और दोस्ती पर जिस साल बेहतरीन फिल्म 'दिल चाहता है' आई थी, हम सारे दोस्तों के जहाज अपनी मंजिलों पर निकल चुके थे। एक जबरदस्त जोश था नए काम का। नौकरी तो वो थी ही नहीं। ये फिल्म देखने के बाद कुछ दोस्तों ने प्लान बनाया गोवा घूमने का, लेकिन कुछ फाइनल नहीं हो सका। सब अपने नए- नए कामों में व्यस्त थे, मस्त थे। दफ्तर से पांच दिन की छुट्टी लेकर गोवा घूमने से बेहतर विकल्प था कि पांच बेहतरीन खबरें खोज ली जाएं।
एकाद भ्रष्ट इंजीनियर को सस्पेंड करा दिया जाए। फिल्म 'दिल चाहता है' में गोवा का एक छोटा सा सीन था, लेकिन वह यादगार रह गया। वो चापोरा के किले की शूटिंग थी। किले की खंडहर हो चुकी दीवार से पीठ सटा का बैठा आमिर खान कहता है-"यू नोट वॉहट ....हमें हर साल कम से कम एक हफ्ते के लिए गोवा जरूर आना चाहिए" दूर समुद्र के पानी में चल रहे जहाज को देखते हुए अक्षय खन्ना कहता है-... वो जहाज जो जरा देर बाद दिखाई नहीं देगा। जानते हो, हम तीनों उस जहाज की तरह हैं।
आज नहीं तो कल अपनी मंजिलों के लिए निकल जाएंगे। हो सकता है हमारी मंजिलें अलग अलग हों." इस पर आमिर कहता है-"तू ये सब क्यों कह रहा है यार मेरी समझ में नहीं आ रहा.......हम सब दोस्त हैं यार हम दोस्त थे, हैं और रहेंगे हमेशा" लेकिन फिल्म में गोवा से लौटने के बाद वे तीनों दोस्त किसी जहाज की तरह अलग-अलग अपनी मंजिलों पर निकल जाते हैं। गोवा में चापोरा किले के खंडहर की दीवार आज भी है। वह समुद्र और वहां कई जहाज आज भी है।
पिछले बीस सालों में एक अंतर ये आया है कि यहां के लोग अब चापोरा के किले को "दिल चाहता है" किले के नाम से पुकारने लगे हैं। ये किला पुर्तगालियों ने अपनी रक्षा के लिए बनाया था। कोई चार सौ साल पहले। अब ये खंडहर में तब्दील हो चुका है। ये किला समुद्र तट के किनारे एक सांस ले रहा है और एक बार यहां जाने के बाद आपको मंत्रमुग्ध होना तय है। किले की दीवारेें कमजोर हो चुकी हैं, पर आप इस पर आसानी से चढ़ सकते हैं। बारिश में फिसलने का खतरा हमेशा रहता है, पर इस मौसम में नहीं.ये किला वागाटॉर बीच के करीब है।
वागाटॉर बीच गोवा के दूसरे बीच से अलग बेहद साफ सुथरा और शांत है। बीच पर दूर-दूर तक फैली सफेद रेत, काली लावा चट्टानें और नारियल और खजूर के लहलहाते पेड़ हैं। ये झुके हुए लंबे लहराते पेड़ लगता है अभी समुद्र में गिर जाएंगे। हरे पेड़ों के झुरमुठ, सफेद रेत और फिर नीला शांत समुंदर। यहां प्रकृति के रंगों का अदभुत संयोजन देखकर आप दंग रह जाएंगे। धूप बहुत तीखी है और गर्मी भी बहुत है, इसलिए दोपहर में बीच पर फिरना कोई समझदारी वाला आइडिया नहीं दिखता।
अब भूख भी लगने लगी है। आसपास बहुत से रेस्टोरेंट हैं, लेकिन सब दिल्ली टाइप। मैं कहीं भी घूमने जाता हूं तो वहां का स्थानीय ढाबा खोजता हूं। बीच के किनारे झोला लिए एक टैटू बनाने वाली महिला पीछे पड़ जाती है। साहब टैटू बनवा लीजिए। जब से कोरोना आया है तब से काम बंद है। देख रहे हैं कितने कम लोग हैं बीच पर। वर्ना पहले यहां भीड़ लगी रहती थी। किसी से कहना नहीं पड़ता था। एक दूसरे को देखकर लड़कियां टैटू बनवाती थीं।
मैंने कहा- 'हां ये काम लड़कियां जरूर करती होंगी। पर मैं कहां टैटू बनवाऊं?' 'आप हाथ पर बनवा लीजिए।' मुझे हंसी आ जाती है। मेरे साथ गया दोस्त भी हंसता है और इशारा करता है कि बनवा लो यार। मैंने कहा-' ठीक है।' वो कैटलॉग खोल देती है। कुर्सी पर मैं एक उड़ते हुए पंक्षी का चित्र अपने अंगूठे के अंतिम सिरे पर बनवा लेता हूं। वह उसके नीचे एक और छोटी चिड़िया बनाने लगती है। मैंने कहा रहने दो, एक काफी है। वह कहने लगी-" पक्षी हमेशा जोड़े में उड़ते हैं। आप यहां या कहीं भी अकेला उड़ता हुआ पक्षी नहीं पाएंगे।" मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा था।
मैं समुदर की तरफ देखने लगता हूं। वहां नीले आकाश के नीचे और नीले समुंदर के ऊपर कई पक्षी जोड़े में मजे से उड़ान भर रहे हैं। मैंने उसे दो सौ रुपए दिए। उसने बताया कि ये एक महीने तक नहीं मिटेगा, लेकिन आप चाहें तो नीबू से जब चाहे तब मिटा लें। फिर बातों-बातों में वह सामने की सड़क की ओर इशारा करते हुए कहती है- इस रोड़ के किनारे एक रेस्टोरेंट है जहां आप लोगों को अच्छा लोकल खाना मिल जाएगा।