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चैत्र नवरात्रि 2022: जानिए विश्व कैसे इस पर्व को विभिन्न तरीके से मनाता है?

सार

इस वर्ष कश्मीरी हिंदू उत्सव नवरेह की चर्चा जोरों पर है। पहले धारा 370 हटा फिर इनके उत्पीड़न की कहानी आई और अब दुनिया इनके गौरवशाली अतीत से रूबरू हो रहा है। नवरेह कश्मीरी मे संस्कृत के नव संवत्सर के लिए प्रयुक्त शब्द है।

यह पर्व प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ आता है।यह कश्मीरी हिंदू पंडितों के सांस्कृतिक संकल्पना दुहराव और आत्म गौरव स्मरण का उत्सव पर्व है।इस अवसर पर पुरातन पद्धति से पूजा अनुष्ठान  संपन्न किये जाते है।

वहीं उत्सव का समापन महापराक्रमी राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ा के शौर्य स्मरण साथ होता है। ललितादित्य मुक्तापीड़ा तुर्कों को परास्त कर मध्य एशिया तक भारत भूमि का विस्तार करने वाले भारत भक्त काश्मीर पुत्र थे।
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चैत्र नवरात्रि के साथ नववर्ष का आरंभ - फोटो : istock
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विस्तार
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इस वर्ष कश्मीरी हिंदू उत्सव नवरेह की चर्चा जोरों पर है। पहले धारा 370 हटा फिर इनके उत्पीड़न की कहानी आई और अब दुनिया इनके गौरवशाली अतीत से रूबरू हो रही है। नवरेह कश्मीरी में संस्कृत के नव संवत्सर के लिए प्रयुक्त शब्द है। यह पर्व प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ आता है। यह कश्मीरी हिन्दू पंडितों के सांस्कृतिक संकल्पना दुहराव और आत्म गौरव स्मरण का उत्सव पर्व है।

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इस अवसर पर पुरातन पद्धति से पूजा अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। वहीं उत्सव का समापन महापराक्रमी राजा ललितादित्य मुक्तापीडा के शौर्य स्मरण साथ होता है। ललितादित्य मुक्तापीडा तुर्को को परास्त कर मध्य एशिया तक भारत भूमि का विस्तार करने वाले भारत भक्त काश्मीर पुत्र थे।

इन्हीं सम्राट के शौर्य गान दिवस पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कश्मीरी हिंदुओं को संबोधित करने वाले हैं। यह संबोधन नवरेह उत्सव के ठीक दूसरे दिन तीन अप्रैल को होना है। दुनियाभर के संगठन, सरकारें और मीडिया घरानों की इसपर दृष्टि एवं रुचि होगी। वैसे ना तो नवरेह और ना ही ऐसी परंपरा नई है।

ये पुरातन सनातन हिंदू संस्कृति का एक जागृत उत्सव है। जिसे दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के हर हिस्से में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह प्रकृति,ऋतु और मास के परिवर्तन का पौराणिक पर्व है। यह खगोल और भूगोल के आधार पर तय होता है, जिसका निर्धारण गणित की गणना और पञ्चाङ्ग के गुणन द्वारा होता है।

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कश्मीर का अल्पसंख्यक हिन्दू समाज पिछले कई वर्षों से जोर-शोर से इस नव संवत्सर को मना रहा है। धारा 370 के खात्मे बाद वर्ष 2020 में दुनिया भर में कश्मीरी हिंदुओं के बीच इसे मनाया गया। वहीं पिछले वर्ष एक और पहल की गई। कश्मीरी पंडित जत्थों ने भाया दिल्ली श्रीनगर का रुख किया। यहां जुट सामूहिक उत्सव मनाया और अनुकूलता देख कई लोग अपने गाँव भी होकर आए थे।

आखिर ये उत्सव इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सोचें तो ध्यान बसंत का आता है। तब पूरी प्रकृति ही हर्ष, आनंद और प्रेम रस से पुलकित होती है। इस अद्भुत छटा का कारण ऋतु बसंत कई बहुरंगी पर्वों को लेकर आता है। होली जहां शुरू से ही लोकप्रिय है वहीं अब वर्ष प्रतिपदा भी चर्चा और चलन में आ गया है।

दुनिया के अन्य समुदाय और संस्कृति के इतर सनातनी हिंदुओं ने अपनी इन परंपराओं को संजोकर रखा है। जिसका परिणाम है भारत और नेपाल में आज भी वर्ष प्रतिपदा और बैशाख संक्रांति की प्रतीक्षा रहती है। इस वर्ष प्रतिपदा का आगमन 2 अप्रैल को हो रहा है वहीं बैशाख संक्रांति 14 अप्रैल को है।

सनातन नववर्ष

बात अगर वर्ष प्रतिपदा की करें तो यह पुरातन सनातन नववर्ष का प्रथम दिन है। यह विश्व के सबसे पुराने पञ्चाङ्ग सृष्टि संवत्सर के प्रारंभ का भी पावन दिवस है। हिंदू मान्यतानुसार इसी तिथि को सृष्टि में जीवन का सर्वप्रथम संचार हुआ था।

सृष्टा ब्रह्म ने जहां सृष्टि रचना प्रारंभ की वहीं प्रथम अवतार मत्स्य का प्रादुर्भाव भी हुआ था। यह महान भारतीय सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विदेशी शक्तियों पर ऐतिहासिक विजय का भी पर्व है, जिसे हम विक्रम संवत्सर के रूप में याद रखते हैं। इसी को सदियों से गुड़ी पड़वा और युगादि पर्व के नाम से मनाया जाता है।

महाराष्ट्र गोवा में यह गुड़ी पड़वा तो कर्नाटक,तेलंगाना और आंध्रप्रदेश मे युगादि के नाम से जाना जाता है। यह शक्ति और प्रकृति की उपासना का उत्सव पर्व है। चैत्र नवरात्रि का आगमन अनुष्ठान इसी दिन से प्रारंभ होता है। नवधा भक्ति वाले नव द्वीप देश भारत वर्ष में नव दुर्गा की शक्तियों के उपासना का ये पावन पर्व है। इसके साथ हिंदुओं के कई सारे नववर्ष और नव संवत्सरः प्रारंभ होते हैं।

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चैत्र नवरात्रि 2022 - फोटो : istock
अलग समुदाय-अलग परंपरा

पड़ोसी नेपाल के पहाड़ों में विक्रम संवत तो नेपाल के तराई से लेकर बिहार में गंगा गंडक कोसी कमला के किनारों तक प्रचलित प्रकृति पर्व नववर्ष जुड़ शीतल और सतुआनी मनाई जाती है। वहीं हिंदुस्तान से पाकिस्तान तक का पंजाबी समुदाय धूम-धड़ाके के साथ बैशाखी मनाता है।

विश्व भर मे बिखरा सिंधी समाज इसे चेटी चंद के नाम से मनाता है। यह चैत्र महीने के प्रथम दिवस आता है। इस अवसर पर सिंधी समुदाय अपने आराध्य वरुण देव की उपासना करता है। यह तिथि उनके अवतारी संत झूलेलाल के भी आगमन की तिथि है।

अहोम असमिया लोग इसे रंगाली बिहू तो उड़िया समाज बैशाख संक्रांति को महाविशुबा उत्सव के नाम से मनाते हैं। बैशाख संक्रांति के इस आगमन को बंगाल और बांग्लादेश मे पोइला बोइशाख के नाम से मनाया जाता है। यह बंगाली पहचान आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान का मुद्दा है।

वहीं सुदूर दक्षिण में पड़ोसी श्रीलंका के साथ तटीय राज्य तमिलनाडु और केरल भी इसे अपने नए साल के तौर पर मनाता है। जहां लंका का सिंहली समुदाय अलुथ अवुरुद्दा के नाम से नव वर्ष का आगमन स्वागत करता है। वहीं उत्तरी लंका मलेशिया से लेकर भारत में तमिलनाडु तक पुथांडु उत्सव के नाम से यह चलन में है, जबकि मलयाली समुदाय मे इसे विशु नाम से धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

मणिपुर का चंद्र गणना आधारित नव वर्ष चिराओबा भी इन्ही दिनों मे आता है। बात अगर आस-पड़ोस से लेकर दूर सुदूर के देश समुदाय और संस्कृतियों की करे तो यहां भी ऐसे उत्सव चलन प्रचलन में है। बाली द्वीप समूह मुस्लिम इंडोनेशिया का हिस्सा होकर भी भारतीय शक संवत को अपनाए हुए है। यहां शक संवत्सर आधारित नव वर्ष न्येपी नाम से बसंत के इसी ऋतु में मनाया जाता है। इस अवसर पर बाली में पर्यटकों की भीड़ होती है।

विदेशों में भी खास

वहीं जापान इसे शोगात्सु नाम से मनाता है। पुराने समय में यह माघ पूर्णिमा को आता था। किंतु विकास और बदलाव के नाम पर इस पुरातन देश ने अपने पञ्चाङ्ग और परंपरा को ही भुला दिया। अब यहाँ यह उत्सव अंग्रेजी नव वर्ष के आगमन के साथ मनाया जाता है।

बात दक्षिण पूर्व ऐशियाई देशों की करें तो ये हिन्दू विश्वास और भारतीय परंपराओं से भिन्न होकर भी अभिन्न है। यहां आज भी समाज पर भारतीय प्रभाव स्पष्टतः दिखता है। तभी तो ये उत्सव यहां उत्साह के साथ मनाया जाता है। खमेर कम्बोडिया इसे चूल यन्न थमे तो थाईलैंड के लोग सोंगक्रान के नाम से मनाता आ रहा है। लघु मगर मोहक लाओस मे यह पाई माई लाओ या फिर सोनक्रान के नाम से मनाया जा रहा है।
यह बैशाख संक्रांति का पावन दिवस है। जबकि म्यांमार इस पावन पर्व को अपने हिन्दू अतीत गाथा से जोड़ कर थिग्यान के नाम से मनाता है। कोरियाई प्रायद्वीप इसे हंगुल और सियोल के नाम से मनाती है। वहीं वियतनाम, तिब्बत और भूटान इसे चंद्र गणना पञ्चाङ्ग के आधार पर मनाते हैं।कोरिया में यह शीतकालीन संक्रांति उपरांत दूसरे अमावस्या को आता है। जबकि वियतनाम मे यह साप्ताहिक उत्सव जनवरी के अंतिम या फरवरी के पहले सप्ताह में आता है। तिब्बती मे यह लोसर पर्व के नाम से मनाया जाता है जो फाल्गुन मास में आता है।

यह पुरातन बॉन और नवीन बौद्ध धर्म का संगम है। तिब्बत के पठारों से भूटान सिक्किम के पहाड़ों तक इसका जोर होता है। वहीं ईरान से भारत आया पारसी समुदाय अभी भी पुराने ईरानी परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। बसंत के इस ऋतु मे वो नवरोज उत्सव मनाते हैं।

पारसियों के लिए ये नव जीवन का उत्सव है इस बहाने वो अपने पुरातन जीवन शैली को याद करते है। बात इसके तिथि की हो तो इसे बराबर दिन और रात वाले दिन मनाते हैं। क्योंकि पारसी कैलेंडर मे भारतीयों की तरह अधिक मास गणना का प्रावधान नहीं है।

अतिवादी इस्लाम के दबाव एवं प्रभाव के बावजूद अफगान समाज इसे नाँरूज तो कुर्दिश लोग न्यूरोज के नाम से मनाते हैं। अफगानी जहां दब छुप कर जश्न मनाते हैं वही कुर्दों के लिए ये प्रतिकार और पहचान का मसला है। ईराक से लेकर आर्मेनिया तक बसे पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय यजीदी भी अपना नया वर्ष प्रतिपदा के आसपास मनाते हैं।

अपने पुरातन मंदिरों में जुटकर वे साल सेर साल या चारश्मा सेरे निसाना मनाते हैं। किंतु भारत की बात निराली है। हिंदू आध्यात्मिक संस्थाओं से लेकर मंदिर मठों तक इसकी धूम होती है। कोई इसे वानर राज बाली के ऊपर रामजी के विजय से जोड़ कर तो कोई इसे प्रकृति पर्व मानकर मनाता है।

उत्सव और मान्यताओं का समागम

किन्हीं के लिए यह देवी की उपासना का पावन दिवस है तो किन्हीं के लिए आर्य समाज जैसे प्रभावी संस्था की स्थापना का दिवस है। राष्ट्रवादी भारतीयों के लिए ये एक पावन प्रेरक दिन है। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलराम हेडगेवार का जन्म हुआ था।

समय के साथ जन मन में बसा ये उत्सव एक व्यवस्थित व्यापक रूप ले रहा है। भारत के कई राज्यों मे इस अवसर पर अवकाश घोषित किया गया है। वहीं इसने कई पुरातन संस्कृति और समुदाय को अपने अतीत में झांकने और स्वयं को पहचानने का अवसर भी दिया है। 

यूरोप के कई पुरातन धर्म इसी बहाने जीवित हो रहे हैं। ऐसे पंथ अपना उत्सव इन्ही पावन तिथियों के आसपास मना रहे हैं। वास्तव में ये लोकआस्था के उत्सव को जानने और अपना मानने का अवसर है। इसी बहाने प्रकृति और संस्कृति के रंग बिरंगे रूप को जाना बुझा जा सकता है।

यह प्रकृति में आ रहे नव जीवन, ऋतुओं के परिवर्तन और बसंत के आगमन का पुरातन पर्व है। हर पुरातन संस्कृति में इस अवसर को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। इस अवसर पर जल, नवीन फसल, लोकदेव और स्थानीय मंदिरों की महत्ता बढ़ सी जाती है। आवश्यकता है इसे स्वयं मनाये या फिर इन उत्सवों में समय निकाल कर अवश्य जाए। तभी ये लोक परंपरा लोक उत्सव लोकप्रिय बने रहेंगे। अन्यथा सभ्यताओं के संघर्ष और एकेश्वरवादी मजहबी विश्वास वाले दौर में ये रंग बिरंगे उत्सव खो जाएंगे। ये भी हो सकता है पुरातन धर्म और सांस्कृतिक विविधताओं की तरह इन्हें भी मिटा दिया जाए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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