इस वर्ष कश्मीरी हिंदू उत्सव नवरेह की चर्चा जोरों पर है। पहले धारा 370 हटा फिर इनके उत्पीड़न की कहानी आई और अब दुनिया इनके गौरवशाली अतीत से रूबरू हो रही है। नवरेह कश्मीरी में संस्कृत के नव संवत्सर के लिए प्रयुक्त शब्द है। यह पर्व प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ आता है। यह कश्मीरी हिन्दू पंडितों के सांस्कृतिक संकल्पना दुहराव और आत्म गौरव स्मरण का उत्सव पर्व है।
इस अवसर पर पुरातन पद्धति से पूजा अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। वहीं उत्सव का समापन महापराक्रमी राजा ललितादित्य मुक्तापीडा के शौर्य स्मरण साथ होता है। ललितादित्य मुक्तापीडा तुर्को को परास्त कर मध्य एशिया तक भारत भूमि का विस्तार करने वाले भारत भक्त काश्मीर पुत्र थे।
इन्हीं सम्राट के शौर्य गान दिवस पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कश्मीरी हिंदुओं को संबोधित करने वाले हैं। यह संबोधन नवरेह उत्सव के ठीक दूसरे दिन तीन अप्रैल को होना है। दुनियाभर के संगठन, सरकारें और मीडिया घरानों की इसपर दृष्टि एवं रुचि होगी। वैसे ना तो नवरेह और ना ही ऐसी परंपरा नई है।
ये पुरातन सनातन हिंदू संस्कृति का एक जागृत उत्सव है। जिसे दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के हर हिस्से में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह प्रकृति,ऋतु और मास के परिवर्तन का पौराणिक पर्व है। यह खगोल और भूगोल के आधार पर तय होता है, जिसका निर्धारण गणित की गणना और पञ्चाङ्ग के गुणन द्वारा होता है।
कश्मीर का अल्पसंख्यक हिन्दू समाज पिछले कई वर्षों से जोर-शोर से इस नव संवत्सर को मना रहा है। धारा 370 के खात्मे बाद वर्ष 2020 में दुनिया भर में कश्मीरी हिंदुओं के बीच इसे मनाया गया। वहीं पिछले वर्ष एक और पहल की गई। कश्मीरी पंडित जत्थों ने भाया दिल्ली श्रीनगर का रुख किया। यहां जुट सामूहिक उत्सव मनाया और अनुकूलता देख कई लोग अपने गाँव भी होकर आए थे।
आखिर ये उत्सव इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सोचें तो ध्यान बसंत का आता है। तब पूरी प्रकृति ही हर्ष, आनंद और प्रेम रस से पुलकित होती है। इस अद्भुत छटा का कारण ऋतु बसंत कई बहुरंगी पर्वों को लेकर आता है। होली जहां शुरू से ही लोकप्रिय है वहीं अब वर्ष प्रतिपदा भी चर्चा और चलन में आ गया है।
दुनिया के अन्य समुदाय और संस्कृति के इतर सनातनी हिंदुओं ने अपनी इन परंपराओं को संजोकर रखा है। जिसका परिणाम है भारत और नेपाल में आज भी वर्ष प्रतिपदा और बैशाख संक्रांति की प्रतीक्षा रहती है। इस वर्ष प्रतिपदा का आगमन 2 अप्रैल को हो रहा है वहीं बैशाख संक्रांति 14 अप्रैल को है।
सनातन नववर्ष
बात अगर वर्ष प्रतिपदा की करें तो यह पुरातन सनातन नववर्ष का प्रथम दिन है। यह विश्व के सबसे पुराने पञ्चाङ्ग सृष्टि संवत्सर के प्रारंभ का भी पावन दिवस है। हिंदू मान्यतानुसार इसी तिथि को सृष्टि में जीवन का सर्वप्रथम संचार हुआ था।
सृष्टा ब्रह्म ने जहां सृष्टि रचना प्रारंभ की वहीं प्रथम अवतार मत्स्य का प्रादुर्भाव भी हुआ था। यह महान भारतीय सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विदेशी शक्तियों पर ऐतिहासिक विजय का भी पर्व है, जिसे हम विक्रम संवत्सर के रूप में याद रखते हैं। इसी को सदियों से गुड़ी पड़वा और युगादि पर्व के नाम से मनाया जाता है।
महाराष्ट्र गोवा में यह गुड़ी पड़वा तो कर्नाटक,तेलंगाना और आंध्रप्रदेश मे युगादि के नाम से जाना जाता है। यह शक्ति और प्रकृति की उपासना का उत्सव पर्व है। चैत्र नवरात्रि का आगमन अनुष्ठान इसी दिन से प्रारंभ होता है। नवधा भक्ति वाले नव द्वीप देश भारत वर्ष में नव दुर्गा की शक्तियों के उपासना का ये पावन पर्व है। इसके साथ हिंदुओं के कई सारे नववर्ष और नव संवत्सरः प्रारंभ होते हैं।