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इंटरव्यूः डॉक्टर ने कह दिया था छोड़ दो कुश्ती, रोचक है विनेश फौगाट के 'खेल रत्न' बनने की कहानी

Wed, 19 Aug 2020 11:03 AM IST
खुशबू गोयल अंकित चौहान, सोनीपत
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विनेश फौगाट
पहलवान विनेश फौगाट को एक समय डॉक्टरों ने पहलवानी छोड़ने की सलाह दे दी थी। डॉक्टरों का कहना था कि अगर अब दोबारा चोट लगी तो जान पर बन सकती है। उसके बावजूद विनेश ने हिम्मत नहीं हारी और 'खेल रत्न' बन गई।
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विनेश फौगाट
गोल्डन गर्ल पहलवान विनेश फौगाट को खेल रत्न देने की घोषणा के बाद वह काफी खुश हैं और उनका ओलंपिक से पहले इससे हौसला भी बढ़ा है। ओलंपिक में पदक के लिए उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है और अब उन्हें ओलंपिक के लिए ज्यादा मेहनत करनी होगी। विनेश के लिए वर्ष 2018 सबसे अहम रहा है और उस साल कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स में मिले गोल्ड मेडल के अलावा एशियन चैंपियनशिप में मिलने वाले सिल्वर मेडल ने उनके लिए खेल रत्न की राह बनाई। 2018 से विनेश फौगाट का लगातार खेल रत्न के लिए नाम भेजा जा रहा था, लेकिन अब दो साल बाद उन्हें खेल रत्न देने की घोषणा की गई है।
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विनेश फौगाट
कोरोना वायरस के कारण नेशनल कैंप स्थगित चल रहे हैं और इसलिए पहलवान विनेश फौगाट अपने घर खरखौदा में घरेलू काम में हाथ बंटा रही हैं। विनेश फौगाट ने बताया कि खेल रत्न की घोषणा के बारे में उन्हें उस समय पता चला, जब उनके पास परिचितों व साथी पहलवानों के बधाई के लिए फोन आने लगे। विनेश फौगाट ने कहा कि खेल रत्न के लिए उनका नाम पिछले दो साल से भेजा जा रहा था और अब उन्हें खेल रत्न मिलने की घोषणा हुई है। इससे वह काफी खुश हैं।

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विनेश फौगाट
विनेश कहती हैं कि जितनी खुशी उन्हें खेल रत्न मिलने से हुई है, उतनी ही देश के लोगों की उनसे ओलंपिक मेडल की उम्मीद बढ़ गई है। लेकिन यह खेल रत्न ओलंपिक के लिए उनका हौसला बढ़ाएगा और वह अगले महीने से कोरोना के समय में प्रैक्टिस से कुछ दूर रहने की कमी को पूरा करेंगी। जिसके लिए वह ज्यादा मेहनत करेंगी और अपनी हर कमी को दूर करने का प्रयास करेंगी। जिससे ओलंपिक के लिए बढ़ी जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकें। विनेश कहती हैं कि उनके लिए साल 2018 काफी अहम रहा है, जिसमें खेल व निजी जिंदगी दोनों में आगे बढ़ी।
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विनेश फौगाट
विनेश कहती हैं कि उनकी जितनी भी उपलब्धियां हैं, वह मेडल से लेकर खेल रत्न तक परिवार के कारण हैं। क्योंकि परिवार ने कभी बेटियों को बेटों से कम नहीं माना है और उनको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए सहयोग किया है। जबकि बेटियों को पहले कुश्ती जैसे खेल में परिवार वाले नहीं भेजते थे, लेकिन उनके परिवार ने सभी बेटियों को कुश्ती में आगे बढ़ाया और इससे समाज की सोच बदली है। यह सोच बदलने से आज कुश्ती में बेटियां सबसे ज्यादा पदक जीत रही हैं। विनेश ने कहा कि वह लखनऊ में एक सितंबर से शुरू होने वाले कैंप में केवल ओलंपिक को ध्यान में रखकर ही प्रैक्टिस करेंगी, क्योंकि उनका लक्ष्य केवल ओलंपिक में मेडल जीतना है।
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विनेश फौगाट
विनेश ने कहा कि रियो में चोट लगने के बाद एक साल बिस्तर पर रहना पड़ा। डॉक्टर ने कुश्ती छोड़ने की सलाह दी, पर मुझ पर जुनून सवार था। वापसी करने का फैसला लिया और बहनों को बताया। फिर हर दिन पांच से छह घंटे कड़ा अभ्यास कर जबरदस्त वापसी की। इसके पीछे उसकी बहन गीता फौगाट, बबीता फौगाट, रितू, प्रियंका और संगीता की विशेष भूमिका रही। कर्नाटक के विजय नगर में यह छह बहनें वहां कुश्ती हॉल में रहने लगीं। पांचों बहनों ने मिलकर प्रयास करते हुए चोटिल विनेश को कुश्ती के मैट पर वापसी करवाई।
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विनेश फौगाट
शुरू में पसंद थी नहीं कुश्ती
हम सभी बहनों को ताऊ जी ने उस माहौल में कुश्ती सिखाई, जिस समाज में लड़कियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती। हमारे समाज में पुरुषों का ही वर्चस्व है। शुरुआत में मुझे कुश्ती बिल्कुल पसंद नहीं थी। मैं बचपन में दूसरे बच्चों की तरह अन्य खेल खेलती थी। मैं भी दूसरी लड़कियों की तरह पढ़ाई-लिखाई करके नौकरी वगैरह के बारे में सोचती थी। लेकिन हमेशा कुश्ती के माहौल में रहने की वजह से धीरे-धीरे मेरा रुझान भी दांव-पेच की तरफ झुकता गया। जब मैं पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर खेली थी, तो मुझे अपने जूतों के फीते बांधने नहीं आते थे। मेरी बहन प्रियंका ने मेरे फीते बांधे थे। शायद नए जूतों से मिली खुशी के उत्साह में ही मैं वहां जीत गई थी। कुश्ती में शुरुआती सफलता के बाद लोगों के प्यार ने मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। हालांकि कुश्ती से दिल लगाने से पहले मुझे टेनिस से भी लगाव रहा है। उस वक्त सानिया मिर्जा की तस्वीरें मेरी धरोहर में शामिल थीं।
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विनेश फौगाट
बेवजह भी हंसती हूं
सुबह-शाम कड़ी ट्रेनिंग के बाद दिनचर्या में इतना वक्त ही नहीं बचता कि किसी दूसरे काम के बारे में सोचा जा सके। फिर भी खाली वक्त में मैं अपने दोस्तों से फोन पर बातें करना पसंद करती हूं। कभी-कभार ही फिल्में देखने के लिए वक्त निकाल पाती हूं। यहां तक कि मैंने दंगल भी अभी तक पूरी नहीं देखी है। यदि मैं बिना हंसे थोड़ी देर तक वक्त बिता दूं, तो मुझे लगता है कि मुझे कोई तकलीफ है, कोई दुख है, जो मुझे सता रहा है। हंसना मेरी आदतों में शुमार है। इसके लिए मुझे किसी वजह की जरूरत नहीं है। कभी-कभार कोच बेवजह हंसने के लिए मुझे डांटते भी हैं, मगर इतनी प्यारी आदत भला हल्की डांट से कहां जाने वाली है!
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