24 साल की उम्र में देश पर कुर्बान होने वाले शहीद सुखदेव के जन्मदिवस के मौके पर हम आपको बता रहे हैं, उनके निजी जीवन से जुड़ी 10 अनसुनी बातें।
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भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव
कुशल रणनीतिकार
'साइमन कमीशन' के भारत आने पर हर ओर उसका तीव्र विरोध हुआ। पंजाब में इसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। विरोध करने पर हुए लाठीचार्ज में जब लाला जी का देहांत हो गया तो सुखदेव और भगत सिंह ने ही बदला लेने का फैसला किया। इस सारी योजना के सूत्रधार सुखदेव ही थे। सेंट्रल एसेंबली के सभागार में बम और पर्चे फेंकने और फिर गिरफ़्तारी और अन्य योजनाओं को भले ही भगत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों ने अंजाम दिया हो, लेकिन कहते हैं कि सुखदेव इस युवा क्रांतिकारी आंदोलन की नींव और रीढ़ थे।
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सुखदेव
जिद्दी व सनकी स्वभाव के थे
सुखदेव बचपन से ही जिद्दी व सनकी स्वभाव के थे। उन्हें पढ़ने लिखने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। अगर कुछ पढ़ लिया तो ठीक ना पढ़ा तो ठीक लेकिन वह बहुत गहरा सोचते थे। ये बहुत देर तक किसी एकांत जगह पर बैठ जाते और न जाने किस चीज के बारे में सोचते रहते। ये अक्सर चुप रहते और अपने आप में खोये रहते। इनका स्वभाव ऐसा था कि ये दूसरे से सीखने में कम विश्वास करते थे, लेकिन इनके स्वभाव में सनकीपन कुछ ज्यादा ही था। इन्हें जब किसी काम को करने की सनक होती तो यह उसे हर हाल में कर गुजरते थे।
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शहीद सुखदेव
स्वंय ही जांचते कि कहां तक सही है
यह सुखदेव के स्वभाव में था कि जब भी कोई इन्हें सलाह देता या ये स्वंय किसी नये प्रयोग या सलाह के बारे में पढ़ते तो पहले उसे स्वंय ही जाँचते कि यह कहाँ तक सही है। उनके जीवन की एक घटना इस तथ्य को प्रमाणित भी करती है, एक बार इन्होंने किसी किताब से पढ़ा कि यदि झगड़े या मारपीट के समय अपने से बहुत अधिक बलवान किसी व्यक्ति से मुकाबला हो तो अपनी रक्षा के साथ ही प्रतिद्वंदी को हराने के लिये उसकी नाक पर जोर से घूसा मार देना चाहिये।
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शहीद सुखदेव
भगत सिंह को फरार करने में सहायता
लाला लाजपत राय पर लाठी से हमला करने वाले जे. पी. साण्डर्स को गोली मारते समय भगत सिंह को एक दो पुलिसकर्मियों ने देख लिया था, इस कारण उन्हें लाहौर से फरार करने में बड़ी परेशानी हो रही थी। क्योंकि इस बात का भय लगातार बना हुआ था कि एक छोटी सी गलती होने पर भगत सिंह को गिरफ्तार किया जा सकता है। इस समय में सुखदेव ने भगत सिंह को लाहौर से बाहर भेजने में सहायता की। भगत सिंह के भेष को बदलने के लिये उनके बाल काट दिये और उनकी दाड़ी भी साफ करा दी गयी।
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शहीद सुखदेव
नाई की मंडी में बम बनाना सीखना
फरारी के जीवन के दौरान कलकत्ता में भगत सिंह की मुलाकात यतीन्द्र नाथ से हुई, जो बम बनाने की कला को जानते थे। उनके साथ रहकर भगत सिंह ने गनकाटन बनाना सीखा साथ ही अन्य साथियों को यह कला सिखाने के लिये आगरा में दल को दो भागों में बाँटा गया और बम बनाने का कार्य सिखाया गया। नाई की मंडी में बम बनाने का तरीका सिखाने के लिये पंजाब से सुखदेव व राजपूताना से कुंदनलाल को बुलाया गया। यहीं रहकर सुखदेव ने बम बनाना सीखा। इसी समय उन बमों का भी निर्माण किया गया था जिनका प्रयोग असेंम्बली बम धमाके के लिये किया गया था।
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शहीद सुखदेव
मित्र के लिये कर्तव्य का निर्वहन
जिस समय असेंम्बली में बम फेंकने का निर्णय किया गया तो भगत सिंह के स्थान पर विजयकुमार सिन्हा और बटुकेश्वर दत्त का नाम निश्चित किय गया। जब यह निर्णय लिया गया उस समय सुखदेव केन्द्रीय समिति की बैठक में शामिल नहीं हो पाये थे। किन्तु इस निर्णय की सूचना उन तक पहुँचा दी गयी थी। इस सूचना को सुनते ही सुखदेव तुरन्त दिल्ली आ गये। भगत सिंह और सुखदेव में गहरी मित्रता थी। दोनों एक दूसरे पर अपनी जान न्यौछावर करने के लिये तत्पर रहते थे।
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शहीद सुखदेव
स्पष्टवादिता
सुखदेव स्पष्टवादी थे। उनका मानना था कि चाहे जो भी कार्य किया जाये उसका उद्देश्य सभी के सामने स्पष्ट होना चाहिये। ये वहीं करते थे जो इन्हें उचित (ठीक) लगता था। यही कारण है कि जब साण्डर्स की हत्या की गयी तो इस हत्या के पीछे के उद्देश्यों को पर्चें लगा कर लोगों तक पहुँचाया गया। इनकी स्पष्टवादिता का प्रमाण इनके द्वारा गाँधी को लिखे गये खुले पत्र के द्वारा प्राप्त होता है। इन्होंने मार्च 1931 में गाँधी को एक पत्र लिखकर उनसे से उनकी नीतियों को जनता के सामने स्पष्ट करने के लिये कहा।
पुलिस थक गई पर मुंह नहीं खोला
सुखदेव को लाहौर षड़यंत्र केस में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद इन पर मुकदमा चला इस मुकदमें का नाम “ब्रिटिश राज बनाम सुखदेव व उनके साथी” था क्योंकि उस समय ये क्रान्तिकारी दल की पंजाब प्रान्त की गतिविधियों का नेतृत्व कर रहे थे। इन तीनों क्रान्तिकारियों (भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु) को एक साथ रखा गया और मुकदमा चलाया गया। जेल यात्रा के दौरान इनके दल के भेदों और साथियों के बारे में जानने के लिये पुलिस न इन पर बहुत अत्याचार किये, किन्तु उन्होंने अपना मुँह नहीं खोला।