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एक मजार, जहां चढ़ाई जाती हैं घड़ियां और खाली नहीं जाती कोई मुराद

Mon, 07 Nov 2016 09:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शाहबाद(हरियाणा)
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नौगजा पीर बाबा की मजार
क्या आप जाते हैं कि देश में एक ऐसी मजार है, जिस पर घड़ियां चढ़ाई जाती हैं और यहां आकर मांगी गई कोई भी मुराद खाली नहीं जाती।
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नौगजा पीर बाबा की मजार
ये है बाबा सैयद इब्राहिम की नौ गज की मजार। यह 34 इंच लंबी और 15 इंच चौड़ी है। पंजाब हरियाणा बॉर्डर पर शाहबाद के नजदीक बनी इस मजार पर हाइवे से गुजरने वाला हर व्यक्ति मत्था टेककर जाता है। मन्नतें मांगता है और चढ़ावे में घड़ी चढ़ा कर जाता है।
 
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नौगजा पीर बाबा की मजार
स्थानीय लोगों का मानना है कि आज से 1500 साल पहले हरियाणा के शाहबाद जिले में नौगजा पीर बाबा रहते थे। वे चमत्कारी इंसान थे। इराक से आए थे और शाहबाद मारकंडा के कल्याण गांव में रहते थे। वे एक संत थे और उनका कद 8 गज था, जो भारतीय माप के अनुसार, 8 मीटर 36 इंच या 27 फीट है। हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों ने उनके चमत्कार देखे।

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नौगजा पीर बाबा की मजार
इन्हीं चमत्कारों के चलते मौत के बाद नौदारा पुल के नीचे उनकी मजार बना दी गई, जिसे हरियाणा सरकार दर्शनीय स्थल का दर्जा दे चुकी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस जगह को नौगजा पीर और नौदारा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, नौदारा नाम नौ देवता के नाम पर पड़ा और इसके बिल्कुल सामने शिव मंदिर है। पीर के साथ-साथ लोग वहां पर भी दर्शन के लिए जाते हैं। पंजाब में नौगजा पीर की कई शाखाएं हैं।
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नौगजा पीर बाबा की मजार
मजार पर घड़ियां चढ़ाने की यह परम्परा कब व कैसे शुरू हुई, इसके बारे में कुछ पक्की जानकारी नहीं है। पर इसके पीछे दो मान्यताएं प्रचलित हैं, एक वर्ग तो ये मानता है कि जिन पीर बाबा की ये मजार है, वह समय के बहुत पाबंद थे। वहीं, एक वर्ग ये कहता है कि हाईवे पर वाहन चालकों को समय पर और सुरक्षित पहुचने की चिंता होती है। ऐसे में यहां घड़ी चढ़ा कर दुआ मांगते हैं कि वे समय पर अपनी मंजिल में पहुंच जाए।
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नौगजा पीर बाबा की मजार
इस पीर की देखरेख का जिम्मा रेडक्रॉस के पास है। यहां पर इतनी अधिक घड़िया चढ़ती हैं कि रेडक्रॉस को उन्हें बेचना पड़ता है। इस पैसे से ही मजार की देखभाल की जाती है और सेवादारों को वेतन दिया जाता है। सप्ताह में गुरुवार और रविवार के दिन मजार पर मेला भी लगता है। इस दिन यहां सैंकड़ों की तादाद में लोग इकट्ठा होते हैं। इस दौरान यहां घड़ियों के भी ढेर लग जाते हैं। श्रद्धालु सरसों का तेल, फूलों की माला भी चढ़ाते हैं।
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