पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ऑपरेशन ब्लू स्टार के छह प्रमुख किरदारों में से एक थीं। 6 जून को हुए इस कांड में उनकी भूमिका अहम रही। ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। जनवरी 1980 में पार्टी को मिली जीत के बाद इंदिरा गांधी बतौर पीएम अपनी तीसरी पारी खेल रही थीं। उस वक्त पंजाब में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। इंदिरा का भिंडरावाले से सियासी टकराव नहीं था, उनकी समस्या सियासी थी।
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indira gandhi
शिरोमणि अकाली दल पंजाब में कांग्रेस के मजबूत विकल्प के तौर पर उभर रहा था, लेकिन भिंडरावाले के दमदमी टकसाल पर हिंसा फैलाने के कई आरोप लगे। देश का सबसे समृद्ध राज्य सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसने लगा था। 5 अक्टूबर 1983 को हथियारबंद लोगों ने एक बस को अगवा कर लिया और उसमें सवार सभी हिंदुओं की हत्या कर दी। इंदिरा गांधी इस घटना से आगबबूला हो उठीं।
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इसके बाद उन्होंने पंजाब में इमरजेंसी लगा दी। घटना के अगले ही दिन उन्होंने पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह की सरकार को भंग करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भिंडरवाले और उसके साथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मूड बना लिया। भिंडरावाले को गिरफ्तार करने की योजना थी, जिसकी भनक लगते ही वह अकाल तख्त में रहने लगा था।
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इंदिरा गांधी ने रॉ के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव और अपने सहयोगी आरके धवन से इस संबंध में चर्चा की। इस अलावा कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के साथ चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी कि स्वर्ण मंदिर को भिंडरवाला समर्थकों से खाली कराने के लिए सेना की कार्रवाई की जाए। इस बीच, सरकार ने स्वर्ण मंदिर की घेरेबंदी की योजना बनाई।
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इंदिरा गांधी
- फोटो : amar ujala
शुरूआत में इंदिरा गांधी ने जानी नुकसान की आशंका से ऑपरेशन के लिए ना-नुकुर की, लेकिन मई 1984 में इंदिरा को यकीन होने लगा था कि पंजाब में आतंक का सफाया करने के लिए अब टकराव ही सीधा रास्ता है. जिसके बाद उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दी। इसके लिए आधी रात में ऑपरेशन चलाया जाए। शुरूआती ना नुकुर के बाद इंदिरा भी इस ऑपरेशन के लिए मान गई, जिसका नाम रखा गया 'ऑपरेशन सन डाउन'।
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
लगभग डेढ़ दिन तक चले देश के इस पहले असैनिक युद्ध में जमकर खून बहा था और स्वर्ण मंदिर के पवित्र चबूतरे लोगों के खून से लाल हो गए थे। इस युद्ध में भिंडरवाला तो मारा गया। 83 के करीब सैनिक, जिनमें तीन अफसर भी थे और 492 आम नागरिक मारे गए। ऑपरेशन खत्म हुआ तो स्वर्ण मंदिर के हर गलियारे में लाशों के ढेर पड़े थे मंदिर की दीवारें टैंकों के गोलों से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी।
जान देकर चुकाई कीमतः ऑपरेशन ब्लू स्टार से पैदा हुई सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ की कीमत इंदिरा गांधी ने जान देकर चुकाई। 31 अक्टूबर 1984 को अपने घर से निकल रहीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके दो सिख सुरक्षा गार्डों सतवंत और बेअंत सिंह ने गोलियों की बौछार कर दी। उसके बाद देश भर में गुस्साई भीड़ ने 8,000 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतार दिया। उनमें से तीन हजार सिर्फ दिल्ली में मारे गए।