साक्षी मलिक को तराश कर हीरे का आकार देने के पीछे पांच किरदार हैं, जिन्होंने उसे रियो में इतिहास रचने के काबिल बनाया। इन किरदारों में से किसी ने उसे कच्चे घड़े की तरह तराशा तो किसी ने कदम-कदम पर साथ दिया। इन्हीं के अमूल्य सहयोग से आज साक्षी ने जो कर दिखाया वह एक मिशाल है।
विज्ञापन
2 of 6
साक्षी को तैयार करने वाले हाथ
साक्षी की मां सुदेश ही उसे पहली बार छोटूराम स्टेडियम लेकर गई। यहां साक्षी ने पहलवानी खेल चुना तो मां ने भारी विरोध के बीच डटकर उसका साथ दिया। पुरुषों के परंपरागत खेल में खुद को साबित करना टेढ़ी खीर था लेकिन साक्षी ने यह चुनौती कबूल की। बेटी को खान-पान में किसी प्रकार की दिक्कत न हो इसके लिए मां सुदेश दिन-रात लगी रही। प्रोटीन हो या अन्य जरूरी पोषक तत्व, समय पर उपलब्ध करवाए। बेटी की समस्या कोई भी, वह हमेशा साथ खड़ी मिलीं।
विज्ञापन
3 of 6
साक्षी को तैयार करने वाले हाथ
मोखरा के रहने वाले बदलूराम को पहलवानी का शौक था। वे लगातार अखाड़े में जाते और पहलवानी में दमखम दिखाते। उनके साथ रहकर ही साक्षी का लगाव कुश्ती से हुआ। दादा को देखकर ही साक्षी ने पहलवान बनने की ठानी। परिवार शहर के शिवाजी कॉलोनी में शिफ्ट हुआ तो साक्षी के मन से दोबारा पहलवानी के प्रति उमंग जगी। साक्षी की जिद पर ही मां उसे छोटूराम स्टेडियम लेकर पहुंची, जहां से उसने पहलवानी के दमखम दिखाने की ठानी।
4 of 6
साक्षी को तैयार करने वाले हाथ
साक्षी को शिखर तक पहुंचाने में भाई सचिन का खासा सहयोग रहा। बकौल सचिन, साक्षी रोजाना शिवाजी कॉलोनी से छोटूराम स्टेडियम तक प्रेक्टिस के लिए आती थी। यह दूरी कोई सात-आठ किलोमीटर की थी। ऐसे में वह उसे लेकर स्टेडियम आता और प्रेक्टिस के बाद वापस घर ले जाता। वे कहते हैं बहन साक्षी ने जब भी कोई चीज मांगी, मैंने उसे किसी भी कीमत पर उपलब्ध करवाई। साक्षी के हर कदम पर भाई सचिन का साथ मिला।
विज्ञापन
5 of 6
sakshi coach
साक्षी ने रेसलिंग का ककहरा कोच ईश्वर दहिया से ही सीखा। छोटूराम स्टेडियम में कोच ईश्वर दहिया कुश्ती के गुर सिखाते थे, इसी दौरान उनकी मुलाकात साक्षी से हुई। साक्षी की लगन और रेसलिंग में लगाव को देखते हुए ईश्वर दहिया ने उन्हें एक कच्चे घड़े की तरह तराशा। आगे चलकर कोच ईश्वर दहिया तो बदल गए लेकिन उनके सिखाए गुर साक्षी को रियो में काम आए। इस तरह देश को पहला मेडल रोहतक की धरती से मिला।
साक्षी के प्रदेश की माटी से रियो तक छाने के पीछे कोच मनदीप सिंह के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। प्रतिभा की तराशने का जो काम मनदीप सिंह ने किया, वह साक्षी के लिए अमोल साबित हुआ। कोच ईश्वर दहिया के बाद साक्षी को कोच मनदीप का सानिध्य प्राप्त हुआ। इसके बाद तो साक्षी के खेल में जबरदस्त सुधार आया। कोच के अनुभव और साक्षी की मेहनत ने मिलकर रियो में भारत का झंडा फहरा दिया।