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जय जवान: 1857 में अंग्रेजों ने की थी 282 भारतीयों की हत्या, 2014 में मिले थे कंकाल, अब डीएनए टेस्ट में बड़ा खुलासा

Fri, 29 Apr 2022 12:06 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़/वाराणसी
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कालियांवाला खूह (अजनाला) - फोटो : फाइल फोटो
अजनाला (पंजाब) के गुरुद्वारा स्थित एक पुराने कुएं से 28 फरवरी 2014 में जो 282 मानव कंकाल बरामद हुए थे, वो गंगा घाटी (यूपी, बिहार, बंगाल) में रहने वाले शहीदों के थे। पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) हैदराबाद समेत अन्य विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों की दो टीमों ने कंकालों के डीएनए और आइसोटोप अध्ययन के बाद इस बात की पुष्टि हुई है। 
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खोदाई में मिला सामान। - फोटो : फाइल
अध्ययन पूरा होने के बाद 28 अप्रैल को फ्रंटियर्स इन जेनेटिक्स पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ है। दरअसल, कुछ इतिहासकारों का मत था कि अजनाला के कुएं से मिले मानव कंकाल भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान दंगों में मारे गए लोगों के थे जबकि विभिन्न स्रोतों से यह पता चला कि ये कंकाल उन भारतीय सैनिकों के हैं, जिनकी हत्या 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने की थी। हालांकि, वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी के कारण इन सैनिकों की पहचान और भौगोलिक उत्पत्ति पर गहन बहस चल रही है। इसकी सत्यता के लिए ही पंजाब विश्वविद्यालय के एन्थ्रोपोलाजिस्ट डॉ. जेएस सेहरावत ने इन कंकालों का डीएनए और आइसोटोप अध्ययन, सीसीएमबी हैदराबाद, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट लखनऊ और बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के साथ ही मिलकर किया।
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इसी कुएं में मिले मानव कंकाल। - फोटो : फाइल फोटो
डीएनए के 50 सैंपल, आइसोटोप एनालिसिस के 85 सैंपल पर अध्ययन
सीसीएमबी के मुख्य वैज्ञानिक और सेंटर फार डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स हैदराबाद के निदेशक डॉ. के थंगराज का कहना है कि इस शोध में 50 सैंपल डीएनए एनालिसिस और 85 सैंपल आइसोटोप एनालिसिस के लिए इस्तेमाल किए गए। शोध में शामिल बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि डीएनए विश्लेषण लोगों के अनुवांशिक संबंध को समझने में मदद करता है, जबकि आइसोटोप विश्लेषण भोजन की आदतों पर प्रकाश डालता है। दोनों शोध विधियों ने इस बात का समर्थन किया कि कुएं में मिले मानव कंकाल पंजाब या पाकिस्तान में रहने वाले लोगों के नहीं बल्कि, डीएनए सीक्वेंस यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मेल खाते हैं।

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कालियांवाला खूह (अजनाला) - फोटो : फाइल
गुमनाम नायकों के इतिहास में जुड़ेगा प्रमुख अध्याय
बीएचयू में जंतु विज्ञान के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि इस अध्ययन के निष्कर्ष भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों के इतिहास में एक प्रमुख अध्याय जोड़ देंगे। टीम के प्रमुख शोधकर्ता और प्राचीन डीएनए के एक्सपर्ट डॉ. नीरज राय ने कहा कि टीम द्वारा किया गया वैज्ञानिक शोध इतिहास को साक्ष्य-आधारित तरीके स्थापित करने में मदद करता है।

बंगाल इन्फेंट्री बटालियन के सैनिक पाकिस्तान के मियां-मीर में थे तैनात
शोध के पहले लेखक डॉ. जेएस सेहरावत का कहना है कि इस शोध से मिले परिणाम ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुरूप हैं, इसमें कहा गया है कि 26वीं मूल बंगाल इन्फेंट्री बटालियन के सैनिक पाकिस्तान के मियां-मीर में तैनात थे और विद्रोह के बाद उन्हें अजनाला के पास ब्रिटिश सेना ने पकड़ लिया और मार डाला। बीएचयू विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. एके त्रिपाठी ने कहा कि यह अध्ययन ऐतिहासिक मिथकों की जांच में प्राचीन डीएनए आधारित तकनीक की उपयोगिता को दर्शाता है।
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डॉ. जेएस सहरावत - फोटो : फाइल फोटो
ऐसे शुरू हुई सैनिकों के अवशेषों की जांच
1857 में पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर ने अपनी किताब द क्राइसिस ऑफ पंजाब में 1857 में पंजाब में हुए इस नरसंहार का वर्णन किया है। पंजाब की एक शोधार्थी जब इंग्लैंड गईं तो उन्होंने इस किताब को पढ़ा। पुस्तक में कई चौंकाने वाली बातें लिखी थीं। लिखा था कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था। साथ ही लिखा था कि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी लेकिन यह असली देशभक्त थे जो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रहे थे। इस कुएं को काफी प्रयास के बाद खोजा गया और तमाम सैनिकों के अवशेष मिले। इनकी जांच डॉ. जेएस सेहरावत को सौंपी गई। वर्ष 2014 से वह लगातार इन अवशेषों पर जांच कर रहे हैं और चौंकाने वाले खुलासे कर रहे हैं। इन सैनिकों की पहचान करके उनके परिजनों को अवशेष देना उनका उद्देश्य है ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके।
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