सरहदों की रक्षा करते हुए उन्होंने अपनी जान तक दाव पर लगा दी थी। इस दौरान कुछ ने तो अपने सीने पर गोलियां तक भी खाईं थीं, लेकिन इसके बावजूद भी उनका हौसला कम नहीं हुआ है। वे आज भी देश की सेवा के लिए तत्पर हैं। ऐसे ही दास्तां है पंजाब के मोहाली फेज-6 स्थित पैराप्लेजिक पुनर्वास होम में जीवन की कला सीख रहे 24 निशक्त फौजी।
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तस्वीरें: बुलंद हौसले लिए ऐसे फौजियों को सलाम
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अमर उजाला ने शनिवार को इन्हीं फौजियों से मुलाकात की और साथ ही उनके बारे में जाना। वेस्टर्नकमांड हेडक्वार्टर से आए मेजर जनरल आरएस राठोड़ ने बताया कि आर्मी में विभिन्न ऑपरेशनों में घायल हुए जवानों को यहां बेहतरीन इलाज दिया जाता है, लेकिन चलने में जवान पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाता है। इसलिए इन्हें व्हीलचेयर दी जाती है।
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दिन में एक से दो घंटे इनको मैदान में बॉस्केटबॉल के अलावा अन्य खेले भी खिलाई जाती है। अपनी सेहत पर कंट्रोल रख सके। उन्होंने बताया बॉस्केटबॉल में जिस प्रकार आम आदमी के लिए जो नियम बनाए गए हैं। वो ही इन पर भी लागू होते हैं। व्हीलचेयर पर खेलना बहुत कठिन है, लेकिन इसके बावजूद जवान कड़ी मेहनत के बाद नियमों को बरकार रखते हैं।
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वर्ष 2000 में जम्मू-कश्मीर में तैनाती के दौरान उत्तराखंड निवासी फौजी बलबीर सिंह उग्रवादियों की गुप्त सूचना मिलने पर अपने जवानों सहित जा रहे थे। रास्ते में माइनिंग बिछाई हुई थी। रास्ता क्रॉस करते ही उग्रवादियों ने ब्लास्ट किया। इससे गाड़ी सौ फुट की ऊंचाई तक जाकर नीचे गिरी। जिसके बाद उन्हें गंभीर अवस्था में उद्यमपुर अस्पताल ले जाया। जहां इलाज के दौरान ही उन्हें चंडी मंदिर कमांड अस्पताल शिफ्ट किया गया। इसके बाद वर्ष 2002 में पुनर्निवास में भेज दिया गया।
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बिहार निवासी एके शुक्ला ने बताया कि उनके सीने पर दुश्मनों ने दो गोलियां मारी थी, इसके बावजूद गिरते हुए उन्हें फायरिंग जारी रखी। इसके बाद उग्रवादियों को मार गिराया। वह जम्मू जिला वर्ष 2005 में तैनात थे। इसके बाद राजौरी में उन्हें पता लगा कि कुछ उग्रवादी छिपे हुए है। जिसके बाद वह उग्रवादियों वाली जगह पर पहुंचे। फायरिंग हुई जिससे उनके सीने में दो गोलिया जा लगी थी। घायल फौजी को अस्पताल ले जाया गया।
वर्ष 2001 में माइनिंग ब्लास्ट में हुए घायल मोहम्मद लातीफ ने बताया कि हादसे के दो साल बाद उन्हें पुनर्निवास ले जाया गया था। जिसके बाद व्हीलचेयर पर होने पर भी उन्होंने बास्केटबॉल, व्हीलचेयर रेस में मलेशिया जाकर हिस्सा लिया और अपने देश के साथ आर्मी का भी नाम रोशन किया।