पंजाब में 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव जीतने की जंग शुरू हो चुकी है। 19 मई को मतदान होना है, इससे पहले प्रत्याशियों के बारे में जानिए और फिर सोचिए, किसे चुनना है सांसद...
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हरदीप सिंह पुरी, केंद्रीय मंत्री
अमृतसरः करीब दो दशक तक भाजपा का गढ़ रहे अमृतसर पर 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की जीत के साथ कब्जा किया। 2017 के उपचुनाव में कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला विजयी रहे। अब कांग्रेस ने यहां से औजला को ही प्रत्याशी बनाया है, जिन्हें भाजपा के नए प्रत्याशी हरदीप सिंह पुरी से मुकाबला करना है।
हरदीप पुरी(भाजपा)-- केंद्रीय मंत्री हैं और अमृतसर में शहरी सिखों के वोटों का लाभ मिल सकता है, लेकिन हेलीकॉप्टर प्रत्याशी हैं। इनका कोई जमीनी आधार भी नहीं है और देरी से उम्मीदवार घोषित होने से बैकफुट पर भी हैं।
गुरजीत औजला(कांग्रेस)-- मौजूद सांसद हैं और उपुचनाव भी जीत चुके हैं। आठ विधायक इनके साथ हैं। लेकिन गुरजीत गुरुनगरी में कोई बड़ा विकास का प्रोजेक्ट नहीं ला पाए हैं और पार्षद स्तर की राजनीति तक ही सिमटे हुए हैं।
कुलदीप धालीवाल(आप)-- इनकी नजर जट सिखों के वोटों पर हैं। एनआरआई हैं और पहली बार राजनीति में कदम रखा है। वहीं शहरी सिखों में इनका कोई आधार नहीं है और अमृतसर में पार्टी का जनाधार भी बिख चुका है।
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Harsimrat Kaur Badal
बठिंडा : यहां से अकाली दल की वर्तमान सांसद हरसिमरत कौर चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस ने विधायक राजा वडिंग को और आम आदमी पार्टी ने विधायक बलजिंदर कौर को मैदान में उतारा है। इनके अलावा पंजाब डेमोक्रेटिक अलाइंस के प्रत्याशी के रूप में सुखपाल सिंह खैरा भी मुकाबले में शामिल हैं। अकाली दल के लिए यह सीट सबसे अहम है। खैरा को फायर ब्रांड माना जाता है और उन्होंने भुलत्थ सीट से अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को भेज दिया है, लेकिन वह मंजूर नहीं हुआ है।
हरसिमरत कौर(अकाली दल)-- दो बार इस सीट से सांसद रह चुकी हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में इन्होंने हलके में कई काम करवाए हैं। लेकिन अकाली दल पर लगे बेअदबी के आरोपों की आंच इन तक भी पहुंची। वहीं इन पर कोई बड़ा प्रोजेक्ट न ला पाने के आरोप भी लगे हैं।
राजा वड़िंग(कांग्रेस)-- मौजूद विधायक हैं और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी माने जाते हैं। बाहरी प्रत्याशी हैं और अकसर अपने बयानों को लेकर विवादों में रहते हैं। इन पर आप वर्करों को पैसे बांटने के आरोप भी लगे हैं।
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Sukhbir Badal
- फोटो : File Photo
फिरोजपुर : अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल के यहां से चुनाव मैदान में उतरने के कारण इस सीट पर भी सबकी नजरें टिकी रहेंगी। यहां सुखबीर बादल का मुकाबला कांग्रेस के शेर सिंह घुबाया से है, जो इसी सीट पर लगातार दो बार अकाली दल की टिकट पर ही सांसद हैं। इस साल घुबाया अकाली दल को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। मुख्य मुकाबला इन दोनों के बीच माना जा रहा है। हालांकि आम आदमी पार्टी हरजिंद सिंह और पीडीए हंसराज गोल्डन को मैदान में उतारा है।
सुखबीर बादल(अकाली दल)-- दो बार डिप्टी सीएम रह चुके हैं। मोदी नाम का सहारा लेकर मैदान में उतरे हैं। वहीं इन्होंने प्रदेश में विकास का दावा ठोका है। लेकिन बेअदबी कांड और बहिबल गोलीकांड के कारण सिख समाज इनसे नाराज है।
शेर सिंह घुबाया(कांग्रेस)-- दो बार इस सीट से सांसद रह चुके हैं। राय सिख बिरादरी में अच्छी पकड़ रखते हैं। लेकिन ठीक चुनाव से पहले अकाली दल छोड़कर कांग्रेस में आने से वोटरों का एक वर्ग इनसे नाराज है।
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सुनील जाखड़
गुरदासपुर : कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ इस सीट से सांसद हैं और पार्टी ने उन्हें ही लोकसभा चुनाव के लिए टिकट दिया है। यह सीट अकाली-भाजपा गठबंधन के तहत भाजपा के हिस्से में आती है और भाजपा की ओर से सन्नी देओल को चुनाव में उतारा गया है। ऐसे में उनके मैदान में आने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। हलके में सनी के रोड शो भीड़ जुटाने में कामयाब हुए हैं। अब देखना यह है कि जुट रही भीड़ वोटों में कितनी तब्दील होती है। वैसे भाजपा इस सीट पर विनोद खन्ना के रूप में बॉलीवुड अभिनेता को आजमा चुकी है, जो दो बार यहां से सांसद रहे। विनोद खन्ना के निधन के बाद हुए उपचुनाव में सुनील जाखड़ यहां से जीते थे। इस सीट पर आप ने पीटर मसीह को चुनाव में उतारा है। पीडीए ने लालचंद कटारुचक्क को प्रत्याशी बनाया है।
सुनील जाखड़(कांग्रेस)-- मौजूदा सांसद हैं और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं। लेकिन सांसद के तौर पर हलके के लिए काम करने का मौका इन्हें ज्यादा नहीं मिला। पार्टी अध्यक्ष होने के कारण व्यस्तता ज्यादा है।
सनी देओल(भाजपा)-- पीएम मोदी के नाम और स्टारडम के सहारे चुनावी दंगल में उतरे हैं। भाजपा की पूरी लीडरशिप का साथ इन्हें मिल रहा है। लेकिन राजनीति में पहली बार आए हैं। पैराशूट प्रत्याशी का ठप्पा इनके नाम पर लगा है और स्थानीय भाजपाइयों को रास भी नहीं आ रहे हैं।
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Bhagwant Mann
संगरूर : आम आदमी पार्टी के राज्य प्रधान भगवंत मान इस सीट से मौजूदा सांसद हैं और 2019 के लिए भी चुनाव मैदान में हैं। उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस के केवल सिंह ढिल्लों और अकाली दल के परमिंदर सिंह ढींढसा से है। इनके अलावा पीडीए ने जस्सी जसराज को इस सीट से टिकट दिया है। अकाली दल अमृतसर के प्रधान सिमरनजीत सिंह मान भी खुद इस सीट से चुनाव मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी ने भगवंत मान को टिकट दिया है। इस इलाके में भगवंत मान की छवि अच्छी मानी जाती है। संगरूर पूरे पंजाब में आम आदमी पार्टी की सबसे मजबूत सीट है, वहीं ढींढसा को इस बार पिता का साथ नहीं मिल रहा है।
भगवंत मान(आप)-- मौजूदा सांसद हैं और बोलने की शैली से काफी प्रभावित करते हैं। संसद में काफी मुद्दे उठा चुके हैं। संगरूर में इनकी छवि काफी अच्छी मानी जाती है। लेकिन भगवंत क्षेत्र के लिए कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला पाए हैं। वहीं लोगों की कई मांगें अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं।
केवल ढिल्लों(कांग्रेस)-- सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के काफी करीबी माने जाते हैं। बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं। लेकिन पिछला लोकसभा चुनाव हार गए थे और ज्यादातर बरनाला की राजनीति तक ही सीमित रहते हैं।
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parneet kaur
पटियाला : पटियाला से मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। गृह क्षेत्र होने के नाते यह सीट कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। वैसे 2014 में परनीत कौर पर आप प्रत्याशी धर्मवीर गांधी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इस बार स्थिति कुछ अलग है। धर्मवीर गांधी आप से अलग होकर अपनी पार्टी बनाकर चुनाव में उतरे हैं जबकि आप ने भी अपना प्रत्याशी उतारा है। इनके साथ ही, अकाली दल ने पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा को इस सीट पर टिकट दिया है।
परनीत कौर(कांग्रेस)-- पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। मुख्यमंत्री खुद इनके लिए पूरी ताकत के साथ प्रचार कर रहे हैं। लेकिन पिछला लोकसभा चुनाव हार गई थीं। वहीं कैप्टन सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी भी इन्हें महंगी पड़ सकती है।
धर्मवीर गांधी(आप)-- इन्होंने पहली बार में कैप्टन के गढ़ में सेंध लगाई थी। इनकी साफ सुथरी छवि भी मददगार साबित होगी। लेकिन आम आदमी पार्टी से विवादों के कारण लगातार चर्चा में रहे। वहीं इनका कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है।
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विजय सांपला
- फोटो : अमर उजाला
होशियारपुर : यह सीट इस समय भाजपा के पास है और विजय सांपला सांसद हैं। लेकिन भाजपा ने इस बार प्रत्याशी बदलते हुए विधायक सोमप्रकाश को मैदान में उतारा है। परिणामस्वरूप इस सीट पर भाजपा कमजोर हुई है, हालांकि कांग्रेस की ओर घोषित किए गए प्रत्याशी विधायक राजकुमार चब्बेवाल का पार्टी में ही विरोध शुरु हो गया है। आप ने इस बार डॉ. रावजोत सिंह को टिकट दिया है, जो विधानसभा चुनाव में शामचौरासी सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी से 5000 वोट के अंतर से हारकर दूसरे स्थान पर रहे थे।
सोमप्रकाश(भाजपा)--- मोदी सरकार के काम के नाम पर जीत की आस लगाए बैठे हैं। इनके पास होशियारपुर का प्रशासनिक अनुभव भी है। इनके नाम पर बाहरी प्रत्याशी का ठप्पा लगा है। इन्हें पार्टी में गुटबाजी से भी जूझना पड़ रहा है।
डॉ. राजकुमार (कांग्रेस)--- डॉक्टरी पेशे के कारण इनकी लोगों में गहरी पैठ है। इन्होंने कई विकास कार्य करवाए हैं। पंजाब सरकार के प्रति नाराजगी महंगी पड़ सकती हैं। इनसे पूर्व सांसद भी नाराज हैं।
खुशी राम (बसपा-पीडीए)--- ये दसूहा में एसडीएम रह चुके हैं और विकास के मुद्दों पर ही इनका प्रचार केंद्रित है। पंजाब में इनकी पार्टी आधार खो चुकी है। ये राजनीति में नए भी हैं और बाहरी प्रत्याशी का ठप्पा भी लगा है।
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दरबारा सिंह गुरु
फतेहगढ़ साहिब: इस सीट पर मुकाबला दो पूर्व आईएएस अधिकारियों के बीच है। अकाली दल ने जहां दरबारा सिंह गुरु को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस ने भी डॉ. अमर सिंह को मैदान में उतारा है। यहां वाल्मीकि समाज ने कांग्रेस प्रत्याशी को विरोध शुरु कर दिया था, जिसे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आखिरकार मना लिया है।
दरबारा गुरु(शिअद) पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रमुख सचिव रह चुके हैं। दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, नकोदर कांड में नाम आने से विवादों में रहे।
डॉ. अमर सिंह(कांग्रेस) प्रशासन का लंबा अनुभव रखते हैं। नौ हलकों में से सात कांग्रेस विधायक इनके साथ हैं। बाहरी प्रत्याशी हैं और इन्हें राजनीति का कोई अनुभव नहीं है। ये कांग्रेस के भीतर विरोध भी झेल रहे हैं।
बनदीप सिंह दूलो(आप) खन्ना, बसी पठाना, अमलोह, पायल में इनका अच्छा वोट बैंक है। पिता के नाम का सहारा लेकर मैदान में उतरे हैं। नया चेहरा हैं और नामांकन से एक दिन पहले ही पार्टी में आए हैं। इसलिए पार्टी में अंदरूनी विरोध भी झेल रहे हैं।
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सांसद चंदूमाजरा
- फोटो : File Photo
आनंदपुर साहिब: इस सीट पर मनीष तिवारी कांग्रेस के प्रत्याशी हैं, जिन्हें कैप्टन की पसंद पर टिकट दिया गया है। धार्मिक नगरी और सिख बहुल इलाके में तिवारी का मुकाबला अकाली दल के प्रो, प्रेम सिंह चंदूमाजरा से है। आम आदमी पार्टी ने यहां नरेंद्र सिंह शेरगिल को उतारा है। अकाली दल टकसाली ने सीनियर नेता बीर दविंदर सिंह को टिकट दिया है।
प्रेम सिंह चंदूमाजरा(शिअद) अकाली दल के सीनियर नेता हैं। मौजूदा सांसद हैं और विकास करवाने के आधार पर वोट मांग रहे हैं। लेकिन बेअदबी कांड की आंच इन तक भी पहुंची। वहीं प्रेम सिंह अपने बयानों को लेकर अकसर विवादों में भी रहते हैं।
मनीष तिवारी (कांग्रेस) कैप्टन के करीबी माने जाते हैं। उन्हीं की सिफारिश पर इन्हें टिकट मिला था। मनीष केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। बाहरी प्रत्याशी हैं और स्थानीय नेताओें की गुटबाजी से जूझ रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं से भी इनका कोई संपर्क नहीं हो पाया है।
नरिंदर शेरगिल (आप) अरविंद केजरीवाल के नाम का सहारा लेकर चुनावी रण में उतरे हैं। ये पहली बार लोकसभा चुनाव में लड़ रहे हैं। पिछला विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और इनके एक साथी संदोआ कांग्रेस में चले गए हैं।
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साधु सिंह
फरीदकोट : इस सीट पर कांग्रेस ने मोहम्मद सदीक को टिकट दिया है, जिसे लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी उभर गई है। अकाली दल ने पूर्व मंत्री गुलजार सिंह रणिके के मैदान में उतारा है। जाट सिख बहुल इस सीट पर अकाली दल का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। आम आदमी पार्टी के ओर से प्रो. साधू सिंह मैदान में हैं।
गुलजार सिंह रणिके (शिअद) अकाली दल में राजनीति का बड़ा चेहरा हैं और सियासत का लंबा अनुभव रखते हैं। बरगाड़ी कांड को लेकर सिखों में इनके प्रति काफी निराशा हैं। बाहरी प्रत्याशी होने का ठप्पा भी इनके माथे पर लगा है।
प्रो. साधू सिंह (आप) मौजूदा सांसद हैं और अपनी पूरी सांसद निधि हलके के विकास के लिए बांट चुके हैं। इन पर लोगों से संपर्क में न रहने का आरोप हैं। वहीं पार्टी के भीतर ही इन्हें चुनौती मिल रही है।
मोहम्मद सदीक (कांग्रेस)गायकी का बड़ा चेहरा हैं और कैप्टन अमरिंदर सिंह के नजदीकी हैं। छह विधायक इनके साथ हैं। ये पिछला चुनाव हार चुके हैं और मजहबी सिख वर्ग में भी इनकी पैठ नहीं है।
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jagir kaur
- फोटो : PTI
खडूर साहिब : इस पंथक सीट पर कांग्रेस के जसबीर सिंह गिल डिम्पा अकाली दल की बीबी जागीर कौर को चुनौती देंगे। इस सीट से आप ने मनजिंदर सिद्धू को प्रत्याशी बनाया है। मनजिंदर 2013 के बहुचर्चित उसमां कांड के मुख्य आरोपियों में हैं और छह माह जेल में भी रहे हैं। इसके अलावा पीडीए की परमजीत खालड़ा को अकाली दल (टकसाली) का समर्थन मिल गया है
बीबी जागीर कौर(शिअद) दो बार एसजीपीसी की प्रधान रह चुकी हैं और शिअद की सबसे सक्रिय महिला नेता हैं। बेटी की हत्या के आरोप से बरी होने के बावजूद लोगों को समझाना मुश्किल इनके लिए मुश्किल हो रहा है।
परमजीत खालड़ा(पीडीए) बीबी खालड़ा के पति उग्रवाद के काले दौर के दौरान मारे गए थे। राजनीति में बीबी खालड़ा नई हैं। साथ ही कई विवादों में घिरी हैं।
जसबीर डिंपा (कांग्रेस) पूर्व विधायक रह चुके हैं और माझा में रसूखदार परिवार से संबंधित हैं। पंथक वोट काटना इनके लिए बड़ी चुनौती है। लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी में गुटबाजी का सामना इन्हें करना पड़ रहा है।
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संतोख सिंह
जालंधर : कांग्रेस ने इस सीट पर संतोष सिंह चौधरी को टिकट दिया है, लेकिन इस फैसले से पार्टी के भीतर विरोध हो गया है। सीनियर नेता मोहिंदर सिंह केपी निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने की चेतावनी दे चुके हैं। दलित बहुल और आरक्षित सीट पर अकाली दल ने चरणजीत सिंह अटवाल को टिकट दिया है, जबकि आम आदमी पार्टी ने रिटायर्ड जस्टिस जोरा सिंह, जिन्होंने बादल सरकार के समय बेअदबी और बरगाड़ी कांड की जांच की थी, को मैदान में उतारा है।
चौ. संतोख सिंह (कांग्रेस) मौजूदा सांसद हैं और अनुभवी राजनीतिक विरासत रखते हैं। इन्होंने एमपी लैंड फंड का पूरा इस्तेमाल किया है। इन्हें पार्टी की गुटबाजी झेलनी पड़ रही है। वहीं सरकार के प्रति नाराजगी भारी पड़ सकती है।
जस्टिस जोरा सिंह (आप) ने बेअदबी कांड की जांच की है। ये पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जज हैं। इनकी पार्टी पंजाब में बिखर चुकी है। वहीं प्रदेश में पार्टी का जनाधार भी छिटक चुका है।
चरणजीत अटवाल (शिअद)राजनीति का लंबा अनुभव रखते हैं और पंजाब विस स्पीकर रह चुके हैं। अकाली दल के खिलाफ बेअदबी को लेकर लोगों में नाराजगी इन पर भारती पड़ सकती है।
लुधियाना : कांग्रेस के मौजूदा सांसद रवनीत सिंह बिट्टू को चुनौती देने के लिए लोक इंसाफ पार्टी के प्रधान सिमरजीत सिंह बैंस मैदान में हैं, जबकि अकाली दल ने भी महेशइंदर सिंह गुजराल को टिकट दिया है। इस सीट पर आप की ओर से प्रो. तेजपाल सिंह को प्रत्याशी बनाया है, जो लुधियाना के ही कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
रवनीत बिट्टू (कांग्रेस) मौजूदा सांसद हैं और कैप्टन खेमे के माने जाते हैं। ये राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। लेकिन लुधियाना में कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला पाए हैं।
महेशइंद्र ग्रेवाल (शिअद) बड़े बादल के करीबी माने जाते हैं। उन्हें की सिफारिश पर इन्हें टिकट मिला है। लेकिन ये राजनीति में सक्रियता नहीं दिखाते। वहीं अंदरखाते गुटबाजी से भी जूझना पड़ेगा।
सिमरजीत बैंस (लिप) वन मैन आर्मी की तरह लोगों के मुद्दे जोर शोर से उठाते रहे हैं। पुराने सहयोगी इन्हें छोड़ते जा रहे हैं और अपने हलके में भी इन्होंने कोई विकास नहीं करवाया है।