पिता ने घोड़ागाड़ी हांक-हांक कर पाला और बेटी ने टीम इंडिया की कैप्टन बनकर सिर फक्र से ऊंचा कर दिया। अब उन्होंने एशियन गेम्स में थाइलैंड के खिलाफ 3 गोल दागे हैं, बहादुर बेटी को सलाम।
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hockey player rani rampal
- फोटो : amarujala
बात हो रही है, भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल की, जो हरियाणा के शाहबाद की रहने वाली हैं। इंडोनेशिया के जकार्ता-पालेमबांग में चल रहे 18वें एशियाई खेलों में सोमवार को भारतीय महिला हॉकी टीम ने पूल बी के मैच में थाईलैंड को 5-0 से करारी शिकस्त दी। भारत के लिए इस मैच में कप्तान रानी रामपाल ने गोल की हैट्रिक लगाई, जबकि मोनिका और नवजोत कौर ने एक-एक गोल किया। बता दें कि 18वें एशियाई खेलों में जीत के रथ पर सवार भारतीय महिला हॉकी टीम ने अपना विजयी अभियान जारी रखा। शनिवार को महिला हॉकी के एक मुकाबले में कोरिया को 4-1 से हराते हुए भारतीय टीम ने पूल बी में टॉप किया था।
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hockey player rani rampal
- फोटो : amarujala
हरियाणा में अंबाला के एक छोटे गांव की बेटी रानी रामपाल की जिंदगी बचपन से ही दुश्वारियों से गुजरी। पिता ठेला चलाते थे और आज जब बेटी एक मुकाम पर पहुंच गई है, दुनिया में नाम रोशन कर रही है, पिता आज भी घोड़ागाड़ी ही हांकते हैं। वहीं रानी को इस बात की जरा भी हिचक नहीं है कि उसके पिता आज भी मजदूरी करते हैं, बल्कि उसे अपने पिता पर गर्व है और इसलिए अपने नाम के साथ पिता का भी नाम लगा रखा है।
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rani rampal father
- फोटो : amarujala
रानी रामपाल को अर्जुन व भीम अवार्ड से नवाजा जा चुका है। रानी रामपाल खुद बताती हैं कि घर में इतने पैसे भी नहीं थे कि वे मेरे लिए हॉकी भी खरीद सकें, लेकिन मेरे सपनों में उड़ान थी और उन्हीं सपनों और इच्छाओं को देखते हुए पिता ने मुझे गांव की एकेडमी में डाल दिया। भाई कारपेंटर था तो पिता और भाई दोनों के साथ की वजह से मेरी प्रैक्टिस किसी तरह चलती रही। एकेडमी को द्रोणाचार्य अवॉर्ड विजेता बलदेव सिंह चलाते थे।
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rani rampal father
- फोटो : amarujala
रानी कहती हैं कि मैं अपनी हर उपलब्धि के लिए कोच बलदेव सिंह की ऋणी हूं। मेरा परिवार जिस समय पैसे नहीं जुटा पाया था, मेरे कोच ने मेरे हाथ में हॉकी स्टिक थमा दी थी। मै उनकी शुक्रगुजार हूं। कोच बलदेव सिंह भी कहते हैं कि रानी को हमेशा जीत दिखती थी, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसके सामने कौन सी टीम खेल रही है।
चौदह साल की उम्र में रानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेब्यू करने वाली सबसे छोटी उमर की खिलाड़ी बनी। जब वह 15 साल की थी, 2010 में वह विश्व महिला कप की सबसे छोटी खिलाड़ी थी। उसने क्वाड्रिनियल टूर्नामेंट में सात गोल भी मारे थे। रानी ने इंग्लैंड के खिलाफ निर्णायक गोल दागा था, जिसकी बदौलत भारत ने हॉकी जूनियर विश्व कप में कांस्य पदक जीता था। अपने प्रदर्शन की बदौलत ही रानी ने रेलवे में क्लर्क की नौकरी हासिल की थी।