जानिए क्या है वो निरंकारी मिशन, जिसके समागम में आतंकी हमला हुआ और तीन लोगों की जान चली गई। इसके दुनिया भर में करोड़ों अनुयायी हैं...
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nirankari bhawan amritsar
पंजाब के अमृतसर में राजासांसी स्थित निरंकारी भवन में 18 नवंबर रविवार को आतंकी हमला हुआ। सवेरे सत्संग के दौरान, जब करीब 200 लोग भवन में मौजूद थे, दो बाइक सवार नौजवान पिस्तौर लहराते हुए भवन में घुसे। उन्होंने हवाई फायर किया और भवन परिसर में ग्रेनेड फेंक दिया। जोर का धमाका हुआ, फिर भगदड़ मच गई। लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे। विस्फोट से तीन लोगों की जान चली गई, 20 लोग घायल हो गए।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला
27 देशों में 3000 शाखाएं, करोड़ों अनुयायी
बाबा हरदेव सिंह के निरंकारी मिशन की 27 देशों में 3000 शाखाएं हैं और एक करोड़ से ज्यादा अनुयायी हैं। मिशन का नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है। निरंकारी मिशन की स्थापना 1929 में बाबा बूटा सिंह ने रावलपिंडी में की थी। 1947 में बंटवारे के बाद मिशन का मुख्यालय दिल्ली में बनाया गया। बाबा हरदेव सिंह रक्तदान किया करते थे। उनसे प्रेरित होकर ही निरंकारी कैंपों में एक दिन में 70 हजार लोगों ने रक्तदान किया। इसके लिए मिशन का नाम गिनीज बुक अॉफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला
बाबा हरदेव सिंह 27 अप्रैल 1980 में अपने पिता के देहांत के बाद गद्दी पर बैठे थे। तब से लेकर अब तक बाबा हरदेव सिंह ने देश व विदेशों में मिशन का प्रचार किया व समाज सेवा के जुड़े कई कार्य किए। वे बहुत मिलनसार और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। कभी भी इनका कोई विवाद सामने नहीं आया। बाबा साफ-सफाई के काम में भी कभी पीछे नहीं रहे। वे खुद भी गंदगी साफ किया करते थे। अपने कार्यकाल के दौरान कई सामूहिक विवाह भी करवाए।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला
1954 में 23 फरवरी को बाबा हरदेव का जन्म दिल्ली में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई पटियाला में वाईपीएस से हुई। बाद में दिल्ली के संत निरंकारी कॉलोनी में रोसरी स्कूल और ग्रेजुएशन दिल्ली यूनिवर्सिटी से की। 1929 में रावलपिंडी से हुई थी मिशन की शुरुआत। इसे सहजधारी सिख बाबा दयाल सिंह ने शुरू किया था। 1971 में उन्होंने निरंकारी सेवा दल ज्वाइन किया। 1975 में फर्रुखाबाद की सविंदर कौर से शादी की थी।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला
मई 2016 में एक हादसे में बाबा हरदेव की मौत के बाद उनकी पत्नी सविंदर हरदेव मिशन की पांचवीं और पहली महिला प्रमुख बनीं। 25 महीने बाद उन्होंने गद्दी त्यागने का एलान कर दिया। फिर माता सविंदर हरदेव ब्रह्मलीन हो गई हैं। 5 अगस्त 2018 को दिल्ली में बुराड़ी स्थित निरंकारी भवन में उन्होंने आखिरी सांस ली। वे पिछले काफी समय से बीमार थीं, इसलिए 17 जुलाई को उन्होंने गद्दी छोड़ दी और अपनी बेटी सुदीक्षा को छठा प्रमुख बना दिया।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला
मनोविज्ञान में ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन कर चुकीं माता सुदीक्षा मिशन के कार्यों से लगातार जुड़ी हुई हैं। दिसंबर 2016 से वह विदेश विभाग की बतौर इंचार्ज रहीं। तब से वह 60 से अधिक देशों में मिशन की गतिविधियों का मार्गदर्शन करती आ रही हैं। इनकी बहनें समता और रेणुका भी मिशन में कार्यरत हैं। बता दें कि संत निरंकारी मिशन कोई प्रचलित धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विचारधारा है।
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निरंकारी मिशन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
निरंकारी मंडल की ओर से दिल्ली में बुराड़ी स्थित मैदान में हर साल नवंबर में वार्षिक समागम का आयोजन किया जाता है, जिसमें भारत समेत दुनिया भर के लाखों भक्त भाग लेते हैं। निरंकारी मिशन के अब तक 6 गुरु हुए हैं। इनके नाम हैं- संत बाबा बूटा सिंह, अवतार सिंह, बाबा गुरबचन सिंह, बाबा हरदेव सिंह, माता सविंदर हरदेव और माता सुदीक्षा। वर्तमान में बाबा हरदेव सिंह की छोटी बेटी सुदीक्षा इस संगठन की प्रमुख हैं।
इससे जुड़े लोगों का कहना है कि यह मिशन खुद को न तो धर्म मानता है और न ही किसी धर्म से जुड़ा कोई समुदाय। दरअसल, सिख धर्म में गुरुवाणी यानी गुरुग्रंथ साहिब को सर्वोच्च गुरु माना जाता है। लेकिन, इसकी मुख्य धारा से अलग होकर 19वीं सदी की शुरुआत में जीवित गुरु को भी सर्वोच्च दर्जा दिलाने के लिए निरंकारी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इसी आंदोलन से संत निरंकारी मिशन का जन्म हुआ।