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दुनिया का वो सबसे चालाक कौवा, जो इंसानों की तरह बना लेता था औजार

Mon, 20 Jul 2020 08:43 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बचपन में आपने चालाक कौवे की कहानी पढ़ी होगी, जिसमें एक प्यासा कौवा घड़े में कंकड़ डाल-डाल कर पानी को ऊपर लाता है। फिर अपनी प्यास बुझाता है। इसी तरह, ब्रिटेन में बेट्टी नाम का एक कौवा बहुत मशहूर हुआ था। ये कौवा किसी तार को ले कर उसे मोड़ कर हुक बना लेता था। फिर वो उसकी मदद से अपने लिए खाना जुटाता था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बेट्टी का किस्सा 2002 का है। तब उसने अपने करतब से बहुत से लोगों को चौंकाया था। वैज्ञानिकों के जहन में सवाल उठा था कि एक कौवा कैसे एक पेचीदा समस्या को खुद-ब-खुद हल कर रहा था। उस का दिमाग तो इंसानों की तरह पेचीदा सवालों के जवाब तलाश पा रहा था। ये भी उसी चालाक कौवे की तरह था, जिस का किस्सा हम ने बचपन में पढ़ा था।

लेकिन, आप ये जान कर हैरान होंगे कि बेट्टी या उस कहानी वाले कौवे से इतर भी ज्यादातर कौवे चतुर होते हैं। बाद की रिसर्च में पता चला कि बेट्टी जिस नस्ल का कौवा था, उसे न्यू कैलेडोनियन क्रो कहा जाता है। उस प्रजाति के कौवों को छोटी चीजों को औजार बना कर इस्तेमाल करने में महारत हासिल है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कौवों पर अपनी रिसर्च के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि ये चतुराई तो उनमें कुदरती तौर पर होती है। ब्रिटेन की सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक क्रिस्चियन रट्ज कहते हैं, ''बेट्टी का बर्ताव देख कर हम कौवों के बारे में अपनी राय बदलने पर मजबूर हुए।''

पिछले कुछ बरसों में वैज्ञानिकों ने कौवों की तमाम नस्लों के दिमाग पर काफी रिसर्च की है। उनके अंदर ज्ञान संबंधी चौंकाने वाली क्षमताएं पाई गई हैं। मगर, क्या कौवा वाकई बुद्धिमान होता है?

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या है बुद्धिमत्ता
इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें ये पता लगाना होगा कि बुद्धिमत्ता होती क्या है? और, जीवों में ये किस तरह विकसित हुई है? इन सवालों के जवाब तलाशने में कौवे हमारी काफी मदद कर रहे हैं।

बुद्धिमानी की जड़ दिमाग में है। इंसानों समेत तमाम प्राइमेट्स यानी वानर प्रजाति के जीवों के दिमाग के भीतर एक खास संरचना होती है, जिसे नियोकॉर्टेक्स कहते हैं। माना जाता है कि हमारे जहन का ये हिस्सा, ज्ञान संबंधी नई संभावनाओं को जन्म देता है। मजे की बात ये है कि कौवों के दिमाग के भीतर नियोकॉर्टेक्स नहीं पाया जाता है। इसकी जगह उन के जहन में तंत्रिकाओं का जाल होता है। जो उन्हें ज्ञान संबंधी क्षमता देता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भले ही कौवों और इंसान के दिमाग अलग-अलग होते हों। दोनों में किसी समस्या के समाधान की क्षमता एक जैसी होती है। वो नई जानकारियों और अनुभवों के आधार पर अपने इस हुनर को बेहतर बनाते हैं। क्रिस्चियन रट्ज ने कौवों और दूसरे परिदों पर जो रिसर्च की है, उसके मुताबिक, कौवे एक खास नस्ल के पौधे की जड़ें तलाशते हैं। जिससे वो एक हुक जैसा औजार बना लेते हैं।

प्रयोगों के दौरान देखा गया कि अगर इस पौधे की जड़ को पत्तियों के बीच में छुपा भी दिया गया, तो भी कौवे उसे तलाश लेते थे। इस का मतलब ये हुआ कि ये परिंदे एक खास तरह की चीज तलाश रहे थे, जिससे वो मन मुताबिक औजार बना सकते हैं। ठीक इंसानों की तरह। जैसे हम कोई नाखून उखाड़ने के लिए हथौड़ी का इस्तेमाल तो नहीं करेंगे। उसके लिए जो खास औजार चाहिए, वो ही तलाशेंगे। इस औजार की मदद से जंगली कौवे कीड़ों को उनके बिलों से निकाल कर अपना शिकार बनाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
किसमें ज्यादा दिमाग
आप को लग सकता है कि कुछ जानवर, दूसरों से ज्यादा चतुर होते हैं और इंसान सबसे चतुर जीव होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इंसान बुद्धिमत्ता के मामले में काफी आगे निकल चुका है। पर, इसका ये मतलब नहीं है कि हम हर जहनी कसरत में अव्वल हैं। मसलन, चिंपैंजी में छोटे दौर की याददाश्त की ताकत, इंसानों से ज्यादा होती है। इसकी मदद से वो जंगल में पहले से छुपाया खाना तलाश लेते हैं।

ऐसे में जानवरों की बुद्धिमत्ता की रैंकिंग बनाना फिजूल है। क्योंकि हर जीव अपने काम के हिसाब से ही बुद्धिमानी की जरूरत महसूस करता है। तो, हम ये कह सकते हैं कि बुद्धिमत्ता का मतलब है किसी खास काम में विशेषज्ञ होना।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्रिश्चियन रट्ज कहते हैं कि कौवों की बुद्धिमानी को इंसान के जैविक इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। और सिर्फ कौवे ही अक्लमंद होते हों, ऐसा भी नहीं। चिंपैंजी, तोते, घड़ियाल और यहां तक कि केकड़ों को भी कई चीजों को औजार की तरह इस्तेमाल करते देखा गया है। और हर इंसान अपनी जरूरत के हिसाब से शरीर या अक्ल का प्रयोग करता है। कौवे को अपने शिकार तक पहुंचने के लिए औजार चाहिए। तो किसी दूर के चारे तक पहुंचने के लिए जिराफ की लंबी गर्दन काम आती है।

वैसे कई चालाक जानवर अपनी जरूरत के अलावा भी कुछ मुश्किल काम कर लेते हैं। बीबीसी की टीवी सिरीज 'इनसाइड द एनिमल माइंड' में क्रिस पैखम नाम के वैज्ञानिक ने दिखाया था कि एक कौवा किस तरह एक मुश्किल पहेली हल कर रहा था। जब कि इस पहेली से कौवे के खान पान या जिंदगी को खतरे का कोई ताल्लुक नहीं था। इन मिसालों के बाद कहानी वाले चतुर कौवे और बेट्टी के हुनर बड़े मामूली लगते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
007 नाम वाले कौवे ने जो पहेली हल की, वो कई पायदानों की है और हर कदम पर नई चाल की सोच तलब करती है। इसमें कामयाब होने वाला कौवा कहीं ज्यादा बुद्धिमत्ता होने का परिचय देता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डकोटा मैक्कॉय कहती हैं कि ज्ञान कभी-कभी बहुत मजेदार होता है। इससे ऐसे बर्ताव के दरवाजे खुलते हैं, जिसकी हमें अपना अस्तित्व बचाने के लिए जरूरत नहीं होती। जैसे हम अपने मजे के लिए पहेलियां हल करते हैं, ताकि दिमागी कसरत हो जाए। उसी तरह कौवे भी कई बार ऐसी पहेलियां हल कर के मस्ती और दिमागी कसरत करते हैं।

डकोटा मैक्कॉय के मुताबिक कौवों में कुदरती तौर पर जिज्ञासा होती है। वो चुपके से कोई औजार उठा कर उड़ जाते हैं और फिर उससे अपने प्रयोग करते हैं। खास तौर से नौजवान परिंदे ऐसे काम करते देखे गए हैं। ठीक इंसानों की तरह। डकोटा कहती हैं कि, "हमारे पास इतना बड़ा दिमाग होता है। फिर भी हम क्रॉसवर्ड्स सुलझाते हैं। हमारे दिमाग का विकास इसके लिए तो नहीं हुआ था।"

सिर्फ अपने उपयोग के लिए दिमाग का प्रयोग करना ही बुद्धिमत्ता नहीं है। मस्ती के लिए जहन को काम पर लगाने से दिमाग तेज होता है। ये बात इंसानों के साथ-साथ दूसरे जीवों पर भी लागू होती है। तभी तो, कोई कौवा पहेलियां सुलझाता है, तो कोई तोता चुटकुले सुनाता है या आवाजों की नकल करता है। बात अक्लमंदी की आती है, तो इसकी कोई सीमा नहीं है।
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