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मलयेशिया का वो खास समुदाय, जो भगवान को खुश करने के लिए शरीर में करते हैं सैकड़ों छेद

Sun, 30 Aug 2020 06:30 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : सोशल मीडिया
मलयेशिया के थईपुसम त्योहार में लाखों तमिल श्रद्धालु शरीक होते हैं। भगवान मुरुगन को प्रसन्न करने के लिए वे अपना शरीर सैकड़ों खूंटियों से छेदते हैं। भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) के भक्तों के लिए थईपुसम साल का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। वैसे तो यह पूरे दक्षिण भारत, श्रीलंका और सिंगापुर में मनाया जाता है, लेकिन मलयेशिया में कुआलालंपुर के पास बातू गुफाओं में सबसे जोरदार उत्सव होता है। यहां यह त्योहार 1892 से मनाया जा रहा है। हर साल की शुरुआत में लगभग 15 लाख लोग कई दिनों के लिए यहां आते हैं।

उत्सव के दौरान हजारों लोगों को ढोल-नगाड़ों के साथ नाचते-गाते हुए गुफा की ओर बढ़ते हुए देखा जा सकता है। वे गुफा के नीचे बने मुख्य द्वार से गुजरते हैं, भगवान मुरुगन की विशाल प्रतिमा के दर्शन करते हैं और 272 सतरंगी सीढ़ियां चढ़कर गुफा के अंदर बने मंदिर में जाते हैं।
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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : सोशल मीडिया
प्रसन्न रहें भगवान
कई तमिलों के लिए और कुछ अन्य हिंदुओं के लिए भी थईपुसम भगवान मुरुगन को प्रसन्न करने का मौका होता है। इसके लिए वे 48 दिनों तक उपवास और पूजा-पाठ करते हैं। कई श्रद्धालु कांवड़ लेकर चलते हैं जो अलग-अलग आकार-प्रकार की होती है। आम तौर पर यह गोलाकार फ्रेम की होती है, जिसे मोरपंखों और फूल-मालाओं से सजाया जाता है। इसके फ्रेम से हुक और सैकड़ों खूंटियां लटकी होती हैं जिनको श्रद्धालु अपने शरीर में घुसा लेते हैं। यह दर्दनाक लगता है, लेकिन कुछ भक्तों के लिए यह उत्सव का मुख्य हिस्सा है।
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भगवान मुरुगुन - फोटो : सोशल मीडिया
एक ईश्वर, अनेक देवता
इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी धर्म में एक ही ईश्वर है। उनका संस्थापक एक है और मूल धर्मग्रंथ भी एक है। हिंदू धर्म इससे अलग है। इसका कोई एक संस्थापक नहीं है। धर्मग्रंथ कई हैं, लेकिन बाइबल या कुरान की तरह हिंदुओं का कोई एक सर्वमान्य ग्रंथ नहीं है। हिंदू धर्म में देवता भी कई हैं, जिनको एक ही परमात्मा के कई रूप माना जा सकता है। इस विश्वास को मानने के रास्ते भी कई हैं। अधिकांश हिंदू थईपुसम नहीं मनाते या भगवान मुरुगन को नहीं पूजते। यह एक स्थानीय त्योहार है जिसे मलयेशिया का तमिल समुदाय मनाता है।

थईपुसम में भी पूजा के कई रूप हैं। बातू गुफाओं में पूजा के लिए आए चौधरी कन्नन कहते हैं, "यह उन (श्रद्धालुओं) के ऊपर है कि वे कैसे अपनी श्रद्धा दिखाते हैं।" कुछ श्रद्धालु अपने माथे पर दूध का बर्तन लेकर चलते हैं। कुछ लोग सिर मुंडवाते हैं। कुछ लोग प्रार्थना करते हैं। कुछ श्रद्धालु घुटनों के बल चलकर परिक्रमा पूरी करते हैं। बच्चे की मन्नत पूरी होने पर भगवान मुरुगन का धन्यवाद करने के लिए कई लोग बच्चे को गन्ने से बंधे झूले में रखकर मंदिर पहुंचते हैं।

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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : BBC
शरीर को छेदना
कई लोग खुद को छेदते हैं। कुछ लोग हुक का इस्तेमाल करते हैं। कुछ अन्य लोग अपने शरीर में धातु की पतली नुकीली खूंटियां घुसाते हैं। इन खूंटियों में धातु के छोटे बर्तन या नींबू भी टंगे होते हैं। किशन कुमार के पेट में खूंटियां घुसाने पर उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। उनके शरीर और बांहों में 130 से ज्यादा हुक और खूंटियां घुसाई गई हैं। भाले जैसी दिखने वाली एक छोटी खूंटी उनके दोनों गालों के आर-पार की जाएगी। वह दर्द कम करने की कोई दवा नहीं खाते। उनके लिए यह भगवान मुरुगन के प्रति उनकी भक्ति है।
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भगवान मुरुगुन - फोटो : सोशल मीडिया
मुरुगन की कहानी
किंवदंतियों के मुताबिक दानव इदुंबन के कंधे पर रखे लकड़ी के टुकड़े में दो पहाड़ियों को बांधा गया था। उसमें रस्सी की जगह सांप थे। एक ऋषि ने इदुंबन को वह कांवड़ उठाने को कहा था। वह आराम करने के लिए रुका तो एक युवक एक पहाड़ी पर बैठ गया। इदुंबन उसे फिर नहीं उठा पाया। दानव उस युवक से लड़ने लगा और फिर भयानक युद्ध शुरू हो गया। इदुंबन मारा गया, फिर उसे जीवित कर दिया गया। इदुंबन को पता चला कि युवक और कोई नहीं, बल्कि भगवान मुरुगन हैं। वह असुर भगवान मुरुगन का भक्त बन गया और उसे मुरुगन के मंदिर का द्वारपाल बना दिया गया। भगवान मुरुगन ने घोषणा की कि जो भी भक्त कांवड़ उठाएगा उसे पुण्य मिलेगा।
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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : सोशल मीडिया
मुरुगन का भाला
थईपुसम में भाले का बड़ा महत्व है, क्योंकि यह उस पल का उत्सव है जब शिव की पत्नी पार्वती ने अपने बेटे भगवान मुरुगन को भाला दिया था। बातू गुफाओं की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए भी श्रद्धालु भाले की जय-जयकार करते हैं। किंवदंतियों के मुताबिक भगवान मुरुगन ने भाले से ही असुरों का संहार किया था। यह लड़ाई आंतरिक संघर्ष के बारे में भी है। असुर अज्ञानता, अहंकार और भय जैसे मानवीय अवगुणों के भी प्रतीक हैं।

कहते हैं कि भगवान मुरुगन ने राक्षसों के राजा का वध किया तो वह आम के एक पेड़ में बदल गया था। उन्होंने आम के पेड़ पर बरछी चलाई तो वह एक मोर और मुर्गे में बदल गया। मुर्गे को उन्होंने अपने ध्वज में जगह दी और मोर उनका पसंदीदा वाहन बन गया। थईपुसम में मुर्गा कम ही दिखता है, लेकिन मोर हर जगह दिखता है। कांवड़ियों को मोर पंख से सजाया जाता है। मंदिरों में मोर की मूर्तियां लगी हैं।
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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : सोशल मीडिया
महिलाओं की पूजा
थईपुसम पुरुष-प्रधान त्योहार लग सकता है। कांवड़ को पुरुष उठाते हैं। ढोल बजाने वाले समूह भी पुरुषों के होते हैं। गुरु भी पुरुष होते हैं। लेकिन श्रद्धालुओं में महिलाएं भी हैं। आम तौर पर वे दूध के बर्तन लेकर मंदिर पहुंचती हैं। वैसे यह भी आसान काम नहीं है।

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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : BBC
उत्सव का संगीत
बातू गुफाओं के पास ढोल-नगाड़ों की आवाज लगातार गूंजती रहती है। कांवड़ उठाए लोग और उनके साथी संगीत की धुन के साथ मंदिर के रास्ते पर बढ़ते हैं। संगीत इस जुलूस का अनिवार्य हिस्सा है। यह याद दिलाता रहता है कि कांवड़ उठाना भले ही भक्ति का काम है, लेकिन यह एक उत्सव भी है। कांवड़ उठाने वालों के उलट ढोल-नगाड़े बजाने वाले समूह किसी मंदिर या समुदाय से जुड़े नहीं होते। श्रद्धालु उनको पैसे देते हैं। उनको मंदिर की सीढ़ियों के नीचे ही रुकना पड़ता है, क्योंकि ऊपर जाते हुए नाचना बहुत खतरनाक है।

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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : BBC
सतरंगी सीढ़ियां
बातू गुफा परिसर के मुख्य दरवाजे पर श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है। यह किसी व्यस्त एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर जैसा लगता है।कांवड़ लेकर चलने वाले और उनके साथी थोड़ी देर के लिए यहां ठहरते हैं, जब तक कि सीढ़ियों और मंदिर की तरफ जाने की उनकी बारी नहीं आ जाती। अंदर गर्मी, शोरगुल और भीड़भाड़ होती है। वहां से बाहर निकलने में भारी परेशानी हो सकती है।

श्रद्धालु जब भीड़ के बीच से निकलकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हैं तो जोश बढ़ जाता है। वहां वे रुकते हैं, नाचते हैं और रास्ता साफ होने का इंतजार करते हैं। सीढ़ियां जहां से शुरू होती हैं, वहां वे आखिरी बार नाचते हैं और फिर मंदिर की तरफ बढ़ जाते हैं। मंदिर में वे अपनी कांवड़ों को अलग कर देंगे और वेदी पर दूध से अभिषेक करके भगवान मुरुगन से मांगी गई मन्नत पूरी करेंगे।
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मलयेशिया का थईपुसम त्योहार - फोटो : सोशल मीडिया
गहरे जख्म नहीं
बाहर से देखें तो थईपुसम एक कठिन परीक्षा लगती है, लेकिन श्रद्धालु इस पूरे अनुभव के प्रति बहुत उत्साही रहते हैं। असल में, उनके शरीर में होने वाली छेद बहुत छोटी होती है और उससे गहरे जख्म नहीं होते। किशन कुमार के मुताबिक ये जख्म एक हफ्ते के अंदर भर जाते हैं।
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